अलवर कपास खेती समाचार 2026 | Cotton Farming Tips Alwar Khairthal Rajasthan

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अलवर के किसान अब कपास से कमाएंगे तगड़ा मुनाफा, बुवाई से पहले अपनाएं ये तरीके
Last Updated:April 20, 2026, 08:57 IST
Agriculture News: अलवर और खैरथल-तिजारा में कपास की खेती की तैयारियां जोरों पर हैं. किसान सरसों-गेहूं की कटाई के बाद अब देसी कपास की बुवाई में जुट गए हैं. कृषि वैज्ञानिकों ने जड़ गलन रोग से बचाव के लिए बीज उपचार और जिंक सल्फेट के उपयोग की सलाह दी है. उन्नत किस्मों जैसे आरजी-18 और एच.डी. 123 के साथ वैज्ञानिक पद्धति अपनाने से किसानों को इस बार बम्पर मुनाफे की उम्मीद है. खेती में देसी खाद और पलेवा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है.
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Cotton Farming Tips: राजस्थान के अलवर और नवगठित खैरथल-तिजारा जिले के किसानों ने अब पारंपरिक फसलों के साथ-साथ प्याज और कपास की खेती की ओर तेजी से रुख करना शुरू कर दिया है. स्थानीय किसानों का मानना है कि कपास की फसल कम लागत और सही प्रबंधन के साथ बेहतरीन मुनाफा प्रदान करती है. इसी के चलते वर्तमान में खेतों को तैयार करने का काम युद्धस्तर पर चल रहा है. कृषि जानकारों के अनुसार खैरथल-तिजारा जिले में कपास की मुख्य बुवाई अप्रैल के आखिरी सप्ताह और मई के पहले सप्ताह के दौरान शुरू हो जाएगी. किसानों ने अपनी सरसों और गेहूं की रबी फसलों की कटाई पूरी करने के बाद अब जमीन को ‘सफेद सोने’ की बुवाई के लिए तैयार करना प्राथमिकता पर रखा है.
अच्छी पैदावार सुनिश्चित करने के लिए किसान सबसे पहले अपने खेतों की गहरी जुताई कर रहे हैं. कपास की खेती के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है वह है ‘पलेवा’ करना, जिससे खेत की मिट्टी में गहराई तक पर्याप्त नमी पहुँच सके. नमी की अच्छी मात्रा पौधों के अंकुरण और उनकी शुरुआती वृद्धि के लिए बेहद आवश्यक होती है. इसके साथ ही किसान रसायनों के बजाय देसी खाद के उपयोग पर अधिक जोर दे रहे हैं ताकि मिट्टी की उर्वरक शक्ति बनी रहे और उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार हो. देसी कपास की बुवाई का उपयुक्त समय अब शुरू हो चुका है और प्रगतिशील किसान वैज्ञानिक विधियों को अपनाकर खेती को लाभ का सौदा बनाने में जुटे हैं.
वैज्ञानिक तकनीक और रोगों से बचावकृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि जिन क्षेत्रों में जड़ गलन (रूट रॉट) की समस्या अधिक रहती है वहाँ बुवाई से पहले विशेष प्रबंधन करें. ऐसे खेतों में 6 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति बीघा की दर से मिट्टी में मिलाने से पौधों की प्रारंभिक जड़ें मजबूत होती हैं. बीजों की मात्रा के लिए 3 किलोग्राम प्रति बीघा का पैमाना तय किया गया है. जड़ गलन के जैविक नियंत्रण के लिए 2.5 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा हरजेनियम को सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर मिट्टी में डालना लाभदायक रहता है. इसके अलावा 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज उपचार करना अनिवार्य बताया गया है ताकि फसल को रोगों से सुरक्षित रखा जा सके.
उन्नत किस्में और फसल अवशेष प्रबंधनबेहतर उपज के लिए वैज्ञानिकों ने उन्नत और प्रमाणित किस्मों के चयन पर जोर दिया है जिनमें आरजी-8, आरजी-18, एच.डी. 123 और राज जैसी किस्में शामिल हैं. ये किस्में न केवल कीटों के प्रति सहनशील हैं बल्कि इनकी पैदावार क्षमता भी पारंपरिक बीजों से कहीं अधिक है. किसानों को यह भी हिदायत दी गई है कि वे फसल अवशेषों या पराली को जलाने के बजाय रोटावेटर या कल्टीवेटर की मदद से उन्हें मिट्टी में ही दबा दें. ऐसा करने से मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है और जमीन की जलधारण क्षमता में भी सुधार होता है. आधुनिक उपकरणों और वैज्ञानिक परामर्श के मेल से अलवर क्षेत्र के किसान इस बार कपास की रिकॉर्ड पैदावार की उम्मीद कर रहे हैं.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content…और पढ़ें
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Location :
Alwar,Alwar,Rajasthan
First Published :
April 20, 2026, 08:57 IST



