Swarnagiri Durg Jalore | जालोर दुर्ग और स्वतंत्रता सेनानियों की कहानी

Last Updated:April 25, 2026, 05:37 IST
Swarnagiri Durg Jalore History: जालोर का ऐतिहासिक स्वर्णगिरी दुर्ग केवल अपनी वीरता और वास्तुकला के लिए ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में भी जाना जाता है. 1930 के दशक में मारवाड़ क्षेत्र में जब राजनीतिक चेतना बढ़ी, तब मारवाड़ लोक परिषद के नेतृत्व में कई बड़े आंदोलन हुए. इन आंदोलनों को दबाने के लिए शासन ने मथुरादास माथुर और गणेश लाल व्यास जैसे प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों को स्वर्णगिरी दुर्ग की कठिन भूलभुलैया में कैद कर दिया था. ऊँची पहाड़ी पर स्थित यह किला क्रांतिकारियों के लिए एक दुर्गम कैदगाह बन गया था, जहाँ उन्हें भारी यातनाएं दी गईं.
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जालोर. राजस्थान का ऐतिहासिक स्वर्णगिरी दुर्ग जिसे दुनिया इसकी अभेद्य वास्तुकला, वीरता और पर्यटन के लिए जानती है, वास्तव में भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक दर्दनाक और गौरवशाली इतिहास को खुद में समेटे हुए है. जालोर की ऊँची पहाड़ी पर स्थित यह किला कभी उन क्रांतिकारियों की कैदगाह बना था, जिन्होंने मातृभूमि की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था. 1930 के दशक में जब समूचे देश में क्रांति की मशाल जल रही थी, तब मारवाड़ का यह क्षेत्र भी राजनीतिक चेतना का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा था.
मारवाड़ लोक परिषद और हितकारिणी सभा के नेतृत्व में नागरिक अधिकारों की माँग को लेकर जनता सड़कों पर उतर आई थी. स्वदेशी आंदोलन, प्रेस एक्ट को हटाने, बोलने की आज़ादी और बढ़ती महंगाई के विरुद्ध लोग लामबंद हो रहे थे. जैसे-जैसे यह आंदोलन उग्र हुआ, तत्कालीन शासन ने दमनकारी नीतियां अपनानी शुरू कर दीं. जब साधारण जेलों और जुल्मों से क्रांतिकारियों के हौसले नहीं टूटे, तो उन्हें स्वर्णगिरी जैसे दुर्गम किलों में कैद करने की योजना बनाई गई, जहाँ बाहरी दुनिया से संपर्क करना लगभग नामुमकिन था.
भूलभुलैया में कैद रहे देश के नायकइतिहासकार संदीप जोशी ने जानकारी देते हुए बताया कि स्वर्णगिरी दुर्ग अपनी जटिल भूलभुलैया और ऊँचाई के कारण कैदियों को रखने के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता था. यहाँ मथुरादास माथुर, गणेश लाल व्यास, फतहराज जोशी और तुलसीदास राठी जैसे दिग्गज स्वतंत्रता सेनानियों को कठिन परिस्थितियों में रखा गया था. इन सेनानियों को किले के एकांत कमरों और भूलभुलैया में बंद किया गया ताकि आंदोलन की आवाज़ को कुचला जा सके. लेकिन दीवारों के पीछे कैद होने के बावजूद इन वीरों के इरादे कमजोर नहीं हुए और उनके संघर्ष की खबर जनता तक पहुँचती रही.
आज़ादी की गूँज आज भी है जीवंतआज स्वर्णगिरी दुर्ग की ये खामोश दीवारें भले ही शांत नजर आती हों, लेकिन इनके पत्थरों में आज भी उस दौर का संघर्ष और बलिदान रसा-बसा है. यह किला केवल एक स्थापत्य कला का नमूना नहीं, बल्कि उन बलिदानों का प्रतीक है जिन्होंने भारतीय लोकतंत्र की नींव रखने में मदद की. यहाँ बंद रहे सैकड़ों सेनानियों की यादें आज भी जालोर के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हैं. पर्यटन के लिए यहाँ आने वाले लोगों को यह किला आज भी याद दिलाता है कि आज़ादी की कीमत कितनी बड़ी थी.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें
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Location :
Jalor,Jalor,Rajasthan
First Published :
April 25, 2026, 05:37 IST



