Rajasthan

चारमीनार की गलियों में छिपा राज… इत्र नहीं, शीशियों में कैद है हैदराबाद की असली कहानी

Last Updated:May 01, 2026, 17:38 IST

Hyderabad Attar Bottle Design: हैदराबाद के लाड बाजार और पत्थरगट्टी में निजामकालीन नक्काशीदार इत्र की शीशियां आज भी विरासत की तरह सहेजी जाती हैं, पारखी लोग इन्हें खोजने यहां आते हैं. स्थानीय दुकान निजाम अत्तर के मोहम्मदी बताते हैं कि मिट्टी के इत्र के लिए गहरे और भारी कांच का इस्तेमाल किया जाता था, ताकि उसकी सोंधी खुशबू सूरज की रोशनी से प्रभावित न हो. वहीं शमामा जैसी खास खुशबुओं के लिए सोने और चांदी की मीनाकारी वाली शीशियां तैयार की जाती थीं.

हैदराबाद. चारमीनार की छाया में बसी तंग गलियां सिर्फ बिरयानी या चूड़ियों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी रूहानी खुशबू के लिए भी जानी जाती हैं. लेकिन इस बार चर्चा इत्र की नहीं, बल्कि उन नक्काशीदार और पुरानी शीशियों की है, जो अपने आप में एक चलता-फिरता संग्रहालय नजर आती हैं. पुराने शहर के लाड बाजार और पत्थरगट्टी में मौजूद कुछ पुश्तैनी दुकानें आज भी कांच पर उकेरी गई उस कला को सहेजे हुए हैं, जो निजामकालीन वैभव की याद दिलाती है.

पुरानी शीशियों में छिपी कला और विज्ञानहैदराबाद के पुराने शहर की इत्र मंडियों में कदम रखते ही नजर अलमारियों में सजी उन बारीक शीशियों पर ठहर जाती है, जो बेल्जियम ग्लास, कट-ग्लास और बोहेमियन क्रिस्टल से बनी होती हैं. इन शीशियों की बनावट सिर्फ सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि इसके पीछे एक खास समझ भी होती थी. स्थानीय दुकान निजाम अत्तर के मोहम्मदी बताते हैं कि मिट्टी के इत्र के लिए गहरे और भारी कांच का इस्तेमाल किया जाता था, ताकि उसकी सोंधी खुशबू सूरज की रोशनी से प्रभावित न हो. वहीं शमामा जैसी खास खुशबुओं के लिए सोने और चांदी की मीनाकारी वाली शीशियां तैयार की जाती थीं. उन्होंने यह भी बताया कि उनकी दुकान उस्मान अली बादशाह के दौर से चली आ रही है और उससे पहले महबूब अली बादशाह के समय में उनके परदादा इत्र सप्लाई करते थे, जिनकी शीशियां बोहेमियन क्रिस्टल की बनी होती थीं.

विरासत बन चुकी हैं ये दुर्लभ बोतलेंनिजाम अत्तर और विठ्ठल दास जैसी सदी पुरानी दुकानों के मालिक इन शीशियों को बेहद कीमती मानते हैं. कई दुकानदारों के पास ऐसी दुर्लभ बोतलें मौजूद हैं, जो 19वीं सदी की हैं. ये बोतलें बिक्री के लिए नहीं होतीं, बल्कि इन्हें विरासत के रूप में संभालकर रखा जाता है. स्थानीय संग्रहकर्ताओं का मानना है कि इन शीशियों की नक्काशी में मुगल और दक्कनी कला का जो मेल दिखाई देता है, वह आज के मशीन युग में दोबारा बनाना बेहद मुश्किल है.

आज भी नक्काशीदार शीशियों की तलाश करते हैं लोगआज भले ही स्प्रे और प्लास्टिक की बोतलों ने बाजार में अपनी जगह बना ली हो, लेकिन पारखी लोग आज भी इन पुरानी नक्काशीदार शीशियों की तलाश में यहां पहुंचते हैं. एक पुरानी कहावत है कि इत्र तो उड़ जाता है, लेकिन उसकी शीशी उसकी कहानी को संभालकर रखती है. हैदराबाद की ये दुकानें इसी परंपरा को आज भी जीवित रखे हुए हैं.

अगर आप इन गलियों से गुजरें, तो केवल इत्र खरीदने तक सीमित न रहें. उन कांच की शीशियों को भी ध्यान से देखें. उनके हर कट और हर नक्काशी में हैदराबाद की उस तहजीब की झलक मिलती है, जो समय के साथ भले ही हल्की पड़ी हो, लेकिन उसकी चमक आज भी बरकरार है.

About the AuthorAnand Pandey

आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें

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