Rajasthan

Big Event Tent | लंदन-अमेरिका में राजस्थानी टेंट, अयोध्या-प्रयागराज में लगा, जानें खासियत

Last Updated:May 06, 2026, 17:35 IST

Big Event And Rally Tent: जब भी हम कोई बड़ा कार्यक्रम देखते हैं तो वहां बड़े-बड़े टेंट जरूरर होते हैं. आमतौर पर आपने देखा होगा कि प्रयागराज का कुंभ मेला हो. अयोध्या का भव्य आयोजन हो. या किसी भी नेता का कार्यक्रम. टेंट जरूर भव्य और बड़े होते हैं. ये टेंट कहां के होते हैं. दरअसल, पाली जोधपुर रोड के सालावास दरी उद्योग के दिनेश प्रजापत परिवार यही काम करते हैं. वे बताते हैं कि वे अयोध्या राम मंदिर, प्रयागराज महाकुंभ, रण, यूको, फ्रांस, लंदन तक में ऐसा टेंट लगा चुके हैं.

पाली. आज हम आपको लिए चलते हैं मारवाड़ की उस सरजमीं पर, जहां आज भी राजा-महाराजाओं के दौर की विरासत जिंदा है. पाली-जोधपुर रोड पर एक ऐसा परिवार है, जिसके हाथों का हुनर सात समंदर पार तक मशहूर है. क्या आप जानते हैं कि अयोध्या में राम मंदिर का उत्सव हो या प्रयागराज का महाकुंभ, वहां लगे खास टेंट कहां से आए?

ये टेंट उसी ‘शिकार’ परंपरा के हैं, जिन्हें कभी राजा-महाराजा शिकार पर जाते वक्त इस्तेमाल करते थे. हाथ की बारीक कारीगरी और ऐसी मजबूती कि विदेशों में भी इनकी भारी डिमांड है. हालांकि बदले समय के साथ शिकार के बाद हंटिंग और अब स्विस टेंट के रूप में यह अपनी पहचान बना चुके है. पीढ़ियों से चल रहे इस ‘शाही टेंट’ के कारोबार की क्या है पूरी कहानी? आइए देखते हैं इस खास रिपोर्ट में…

अयोध्या और प्रयागराज महाकुंभ भेज चुके टेंटप्रयागराज के महाकुंभ के बाद अब अयोध्या में प्रभु राम के लिए जोधपुर-पाली रोड पर स्थित सालावास दरी उद्योग से जुडे मारवाड़ के जाने-माने कलाकार दिनेश प्रजापत और उनके परिवार द्वारा तैयार विशेष टेंट तैयार कर भेजे जा चुके है. विश्व प्रसिद्ध दरी उद्योग की बारीकियों को समेटे हुए पाली और जोधपुर की यह कला आज पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान दिखा रही है, जो न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश के लिए गौरव का विषय है.

शिकार टेंट से स्विस टेंट तक का सफर दिनेश प्रजापत बताते है कि टेंट का यह काम 1985 में हमारे पिताजी द्वारा शुरू किया गया था उस वक्त बात करे तो राजा महाराजाओं के समय भी जब हंटिंग करने या फिर शिकार करने के लिए जाते थे तो यही टेंट जो लग्जरी सेगमेट देने के लिए यही टेंट ले जाया जाता था. उस वक्त इस टेंट का नाम होता था शिकार टेंट क्योकि शिकार के लिए काम लिया जाता था. उसके बाद इसको हंटिंग फिर स्विस कोटेज इसका नाम पडा. अब चलन ऐसा है कि रिसॉर्ट्स से लेकर होटल्स में यही टेंट जो स्विस टैंट के रूप में काम लिए जाते है.

हर मौसम की मार झेल लेते है यह टेंट चाहे रेगिस्तान की भीषण आंधी हो, तटीय इलाकों की मूसलाधार बारिश या फिर तेज तूफान, ये टेंट हर विपरीत परिस्थिति को झेलने के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए हैं. इनके निर्माण में इस्तेमाल होने वाला उच्च गुणवत्ता वाला मटेरियल और मजबूत ढांचा यह सुनिश्चित करता है कि मौसम का कोई भी मिजाज इन्हें रत्ती भर भी नुकसान न पहुँचा सके.

साउथ से लेकर गुजरात के रण तक यही स्विस टेंट दिनेश प्रजापत कहते है कि साउथ से लेकर गुजरात के अलावा गुजरात में टेंट सिटी के रूप में पहचान रखने वाले रण में भी हमारे ही टेंट लगे है. बडे धार्मिक स्थल जिसमें महाकुंभ में ही हमारे ही 200 टेंट लगे थे. इंडिया लेवल पर सर्च किया तो हमारे ही टेंट अच्छे लगे थे. अयोध्या में भी हमने टैंट दिए थे आज भी वहां हमारा प्रोजेक्ट चल रहा है. 100 से अधिक टैंट हमने दिए है.

यूको, फ्रांस और लंदन तक होटलो में यही टेंट टेंट को इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि एसी वाले घरों में लोग रह चुके हैं, मगर यह टेंट एक नया अनुभव होता है. इसलिए लोग इसको काफी पसंद करते है. राजा महाराजाओं के समय यह इस्तेमाल होते थे. विदेश से भी विदेशी पर्यटक आते थे इसको देखने के लिए ही. इसके बाद धीरे-धीरे जैसलमेर के बाद इनका प्रचलन बढने लगा. यूको में तीन से चार रेस्टोरेंट है जो हमारे यहां के बने टेंट का ही इस्तेमाल करते है. फ्रांस में भी हमारे 40 टेंट लगे है. साथ ही विदेशो से लंदन इत्यादि काफी जगहो से लोग आते है जो खुद भी यहां से टेंट लेकर जाते है.

About the AuthorAnand Pandey

आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें

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