Rajasthan

विदेशों में छाया रेगिस्तान का जायका! मारवाड़ की कैर और सांगरी की बढ़ी मांग, लेकिन बारिश बनी चुनौती

Last Updated:May 13, 2026, 16:27 IST

Marwadi Desert Food: राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र के पारंपरिक रेगिस्तानी जायकों कैर और सुखी सांगरी की मांग अब विदेशों तक पहुंच चुकी है. अमेरिका, कनाडा समेत कई देशों में रहने वाले भारतीयों और विदेशी लोगों के बीच इन पारंपरिक खाद्य पदार्थों की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है. मारवाड़ी व्यंजनों में इस्तेमाल होने वाली कैर-सांगरी को स्वाद और पोषण के कारण खास पसंद किया जा रहा है. हालांकि इस बार बैमौसम बारिश ने उत्पादन पर बड़ा असर डाला है, जिससे किसानों और व्यापारियों की चिंता बढ़ गई है. कम उत्पादन के कारण बाजार में कीमतें बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है. निर्यात कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में डिमांड लगातार बढ़ रही है, लेकिन उत्पादन घटने से सप्लाई प्रभावित हो सकती है.

केर-सांगरी अपने पोषण और स्वास्थ्य लाभों के लिए जानी जाती है. इसकी मांग देश के साथ-साथ खाड़ी देशों, यूरोप और अमेरिका तक है. राजस्थान के पाली जिले में भी लोग इसको खूब पसंद करते है. नागौर, बाड़मेर और जैसलमेर से इसका निर्यात होता है, लेकिन इस बार उत्पादन में भारी कमी आने से निर्यात भी प्रभावित होने की आशंका है.

नेचुरल और ऑर्गेनिक: ये बिना किसी खाद या कीटनाशक के, पूर्णतः प्राकृतिक रूप से उगते हैं. लंबे समय तक सुरक्षित: सुखाने के बाद इन्हें सालों तक खराब हुए बिना रखा जा सकता है.<br />सेहत का राज: सांगरी में भरपूर मात्रा में प्रोटीन, फाइबर और मैग्नीशियम पाया जाता है. आयुर्वेद के अनुसार, कैर पेट की बीमारियों और इम्युनिटी बढ़ाने के लिए रामबाण है.<br />राजसी व्यंजन: मारवाड़ की प्रसिद्ध ‘पंचकुटा’ सब्जी का यह मुख्य हिस्सा है, जो बड़े-बड़े होटलों और रॉयल शादियों की शान मानी जाती है.

ऑर्गेनिक खेती के प्रति बढते रूझान का नतीजा है कि यहां से काफी कुछ एक्सपोर्ट होता है. राजस्थान से हर साल टनों की मात्रा में सूखी सांगरी और कैर का निर्यात अमेरिका, कनाडा, और खाड़ी देशों में किया जा रहा है. प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ अब विदेशी लोग भी इसके औषधीय गुणो और स्वाद के मुरीद हो गए हैं. विशेष रूप से सूखी सांगरी की कीमत बाजार में 1000 से 2000 रुपये प्रति किलो तक पहुँच जाती है, जिसके कारण इसे ‘कौड़ियों के भाव’ मिलने वाला फल नहीं, बल्कि ‘काजू-बादाम के समान समझा जाता है.

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मारवाड़ के मरुस्थलीय क्षेत्र की प्रमुख फसल केर-सांगरी इस बार बेमौसम बारिश और बढ़ी नमी से प्रभावित हुई है. आमतौर पर शुष्क और गर्म वातावरण में पनपने वाली यह पारंपरिक फसल प्रतिकूल मौसम के कारण संकट में है.पर्यावरण प्रेमियों की माने तो इस बार सांगरी के पौधों पर पर्याप्त फूल आए थे, जिससे अच्छी पैदावार की उम्मीद थी. हालांकि, मौसम बदलने से फूल झड़ गए और कई स्थानों पर फली बनने के बजाय ‘गिलडु’ बन गए, जो अनुपयोगी माने जाते हैं. केर की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है, जिससे इसके स्वाद और बाजार में मांग पर असर पड़ा है.

अक्सर मारवाड के रेतिले स्थानो पर खेजड़ी’ के पेड़ की फलियां यानी सांगरी और ‘कैर’ के झाड़ पर लगने वाले छोटे-छोटे दाने (कैर) को सुखाकर तैयार किया जाता है. स्थानीय लोग बताते हैं कि पुराने समय में जब अकाल पड़ता था, तब यही फलियां जीवन रक्षक बनी थीं. लेकिन आज इनका स्वाद और औषधीय गुण इन्हें प्रीमियम फूड की श्रेणी में ले आए हैं. आज ‘मारवाड़ के काजू-बादाम’ के नाम से पूरी दुनिया में मशहूर हो रहे हैं. ताज्जुब की बात यह है कि यह देसी स्वाद अब सात समंदर पार अमेरिका और यूरोप के डाइनिंग टेबल तक पहुँच गया है.

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