न एसी, न कूलर… फिर भी ठंडा रहता है गर्भगृह, करौली मंदिर की यह परंपरा लोगों को कर रही है हैरान

Last Updated:May 14, 2026, 17:05 IST
आधुनिक दौर में जहां हर जगह एसी और इलेक्ट्रिक पंखों का इस्तेमाल हो रहा है, वहीं करौली का मदन मोहन जी मंदिर आज भी अपनी सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए है. यहां गर्मियों में कपड़े से बने विशेष पंखे को पुजारी हाथों से चलाकर ठाकुर जी की सेवा करते हैं, जिसे देखकर श्रद्धालु पुराने राजसी और धार्मिक दौर की झलक महसूस करते हैं.
करौली. आधुनिक दौर में जहां हर घर, मंदिर और भवन में बिजली से चलने वाले पंखे और एसी लग चुके हैं, वहीं करौली का प्रसिद्ध मदन मोहन जी मंदिर आज भी सदियों पुरानी परंपरा को संजोए हुए है. यहां गर्मी के मौसम में गर्भगृह के भीतर आज भी कपड़े से बना विशेष पंखा लगाया जाता है, जिसे पुजारी अपने हाथों से चलाकर ठाकुर जी को ठंडी हवा देते हैं. यह परंपरा श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण का केंद्र बनी हुई है और करौली की धार्मिक विरासत को जीवंत बनाए रखती है.
पुराने समय में जब बिजली और आधुनिक पंखों की सुविधा नहीं थी, तब महलों, मंदिरों और राजदरबारों में इसी तरह के कपड़े के पंखों का इस्तेमाल किया जाता था. इन्हें रस्सियों के सहारे हाथ से चलाया जाता था, जिससे पूरे कक्ष में ठंडी हवा फैलती थी. करौली के मदन मोहन जी मंदिर में आज भी उसी परंपरा को पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ निभाया जा रहा है.
अक्षय तृतीया से शुरू होती है परंपराकेशोराय मंदिर के पुजारी प्रदीप गोस्वामी बताते हैं कि यह विशेष पंखा हर साल अक्षय तृतीया से मंदिर के गर्भगृह में लगाया जाता है. इसके बाद यह पंखा जगन्नाथ जी की रथ यात्रा तक लगातार चलता रहता है. गर्मी के दिनों में ठाकुर जी की सेवा के लिए इसे बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. उनका कहना है कि यह केवल एक पंखा नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी भक्ति और सेवा की परंपरा का प्रतीक है.
हाथ से चलाकर दी जाती है ठंडी हवाउन्होंने बताया कि यह पंखा सूती कपड़े, मजबूत रस्सियों और लकड़ी की सहायता से तैयार किया जाता है. इसकी बनावट इस तरह की होती है कि हाथ से चलाने पर भी गर्भगृह में अच्छी ठंडी हवा पहुंचती रहती है. मंदिर के पुजारी समय-समय पर इसे चलाते हैं, ताकि ठाकुर जी को गर्मी का अहसास न हो.
परंपरा को देखकर श्रद्धालु भी होते हैं प्रभावितआज जब दुनिया पूरी तरह तकनीक पर निर्भर हो चुकी है, तब करौली का यह मंदिर अपनी पुरानी संस्कृति और परंपराओं को सहेजने का अनोखा उदाहरण बना हुआ है. मंदिर में आने वाले श्रद्धालु भी इस व्यवस्था को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं. लोगों का कहना है कि यह दृश्य उन्हें पुराने राजसी दौर और भारतीय संस्कृति की याद दिला देता है.
About the AuthorAnand Pandey
आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें
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