LemonGrass Farming Business Idea | लेमन ग्रास की खेती कैसे करें | Lemon Grass Farming Profit and Benefits India

Last Updated:May 15, 2026, 06:55 IST
Lemon Grass Farming Profit and Benefits: सिरोही के किसानों ने लेमन ग्रास की खेती को मुनाफे का बड़ा जरिया बनाया है. इस घास की पत्तियों से निकलने वाला तेल दवाओं, कॉस्मेटिक्स और लेमन टी में उपयोग होता है. एक बार लगाने पर यह 6 साल तक पैदावार देती है और इसके लिए बहुत अधिक पानी या खाद की जरूरत नहीं होती. बंजर जमीन पर भी उगने वाली यह घास जंगली जानवरों से सुरक्षित है, जिससे तारबंदी का खर्च बचता है. किसान फसल चक्र में इसे शामिल कर अपनी जमीन की उर्वरता बढ़ा सकते हैं और साल भर आय प्राप्त कर सकते हैं.
लेमनग्रास (या संबंधित फसल) की खेती के लिए इसकी रोपाई बीजों के स्थान पर पुरानी फसल से तैयार छोटे पौधों यानी ‘स्लिप्स’ के माध्यम से की जाती है. एक हेक्टेयर भूमि में सफल रोपण के लिए लगभग 55,000 से 60,000 स्लिप्स की आवश्यकता होती है. रोपाई के दौरान कतार से कतार और पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखना अनिवार्य है. ऐसा करने से पौधों को पर्याप्त हवा और धूप प्राप्त होती है, जो न केवल पत्तियों की बेहतर ग्रोथ में सहायक है, बल्कि तेल की गुणवत्ता को भी उन्नत बनाती है.
इसे ‘नींबू घास’ (लेमनग्रास) के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इसकी पत्तियों से नींबू जैसी ताजी सुगंध आती है. इस खेती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक बार रोपण करने के बाद इससे लगातार 5-6 वर्षों तक फसल प्राप्त की जा सकती है. इससे किसानों को बार-बार बुवाई करने की मेहनत और खर्च से मुक्ति मिल जाती है. साथ ही, बेहतर परिणाम और शुद्धता के लिए किसान इसमें आर्गेनिक खाद का उपयोग कर जैविक तरीके से भी इसकी खेती कर सकते हैं.
सिरोही जिले के आमथला स्थित आरोग्यवन में इन दिनों लेमन ग्रास की ऑर्गेनिक खेती की जा रही है. यहाँ इस प्रोजेक्ट की देखरेख कर रहे बीके चंद्रेश भाई के अनुसार, लेमन ग्रास का उपयोग न केवल स्वादिष्ट लेमन टी बनाने में होता है, बल्कि यह एक प्रभावी औषधि के रूप में भी पहचानी जाती है. किसानों के लिए लेमन ग्रास की खेती एक अत्यंत लाभकारी विकल्प है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ जमीन कम उपजाऊ या बंजर है. ऐसी अनुपयोगी भूमि पर भी इसकी खेती कर किसान बेहतरीन मुनाफा कमा सकते हैं.
Add as Preferred Source on Google
लेमन ग्रास से निकलने वाले तेल का बहुआयामी उपयोग इसे बेहद खास बनाता है. इसका इस्तेमाल साबुन, परफ्यूम और ब्यूटी प्रोडक्ट्स से लेकर मच्छर भगाने वाली दवाओं और ग्रीन टी या लेमन टी के निर्माण में व्यापक स्तर पर किया जाता है. इसी बहुमुखी उपयोगिता के कारण बाजार में इसकी मांग पूरे साल बनी रहती है. पर्यावरण की दृष्टि से भी लेमन ग्रास अत्यंत लाभकारी है; इसकी गहरी जड़ें न केवल मिट्टी के कटाव (Soil erosion) को प्रभावी ढंग से रोकती हैं, बल्कि भूमि की उर्वरता बढ़ाने में भी सहायक होती हैं. ऐसे में किसान अपनी मिट्टी को फिर से उपजाऊ बनाने और प्राकृतिक रूप से ‘रिचार्ज’ करने के लिए फसल चक्र में इस घास की खेती को एक बेहतरीन विकल्प के रूप में अपना सकते हैं.
लेमन ग्रास की खेती की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसकी देखभाल में अधिक समय और श्रम की आवश्यकता नहीं होती. इसमें न तो बहुत अधिक पानी की जरूरत पड़ती है और न ही महंगे रासायनिक उर्वरकों की. सिंचाई के लिहाज से देखें तो गर्मियों में 10-15 दिन और सर्दियों में 15-20 दिनों के अंतराल पर पानी देना पर्याप्त रहता है. खाद के लिए गोबर की खाद या वर्मी कंपोस्ट का उपयोग सबसे बेहतर माना जाता है. एक और राहत की बात यह है कि इसकी विशेष गंध के कारण जंगली जानवर जैसे सुअर या बंदर इसे नहीं खाते, जिससे फसल पूरी तरह सुरक्षित रहती है. यही वजह है कि किसानों को इसके लिए तारबंदी (Fencing) पर अतिरिक्त पैसा खर्च करने की जरूरत भी नहीं पड़ती.
लेमन ग्रास की पहली कटाई रोपाई के लगभग 4 से 6 महीने बाद की जा सकती है. इसके बाद, हर 60 से 70 दिनों के अंतराल पर साल में 3 से 4 बार इसकी पुनः कटाई संभव है. कटाई करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि पौधे को जमीन से लगभग 15 सेंटीमीटर ऊपर छोड़कर ही काटा जाए. ऐसा करने से घास दोबारा तेजी से अंकुरित होती है और बढ़ती है. इस व्यवस्थित कटाई चक्र के कारण किसानों को अपनी फसल से साल भर निरंतर आय प्राप्त होती रहती है.
लेमन ग्रास की सफल पैदावार के लिए गर्म जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है, जिसमें 30 से 35 डिग्री सेल्सियस का तापमान आदर्श होता है. हालांकि इसकी ग्रोथ रेतीली या दोमट मिट्टी में अधिक तेजी से होती है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे कम उपजाऊ या खराब गुणवत्ता वाली मिट्टी में भी आसानी से उगाया जा सकता है. इस घास की रोपाई के लिए मार्च से जुलाई तक का समय सबसे बेहतर है. विशेषकर मानसून की शुरुआत में रोपण करने से पौधों की जड़ों को प्राकृतिक नमी मिलती है, जिससे वे जमीन में मजबूती से स्थापित हो जाते हैं.



