रजवाड़ों से निकली थेवा ज्वेलरी, दुनिया में बनाई पहचान, सोने-चांदी पर उकेरी जा रही राजस्थान की अनोखी विरासत

Last Updated:June 19, 2026, 12:07 IST
Thewa Jewelry Art of Rajasthan: राजस्थान की प्रसिद्ध थेवा कला एक पारंपरिक हस्तशिल्प है, जो रजवाड़ों के समय से चली आ रही है और आज भी अपनी बारीक कारीगरी के लिए जानी जाती है. यह कला सोने और चांदी पर हाथों से उकेरी जाने वाली अनोखी तकनीक पर आधारित है, जिसमें लोक संस्कृति, राजसी जीवनशैली और प्राकृतिक आकृतियों को दर्शाया जाता है. पहले यह कला शाही परिवारों तक सीमित थी, लेकिन अब यह आम लोगों तक भी पहुंच रही है. बदलते समय के साथ चांदी में भी थेवा ज्वेलरी बनाई जा रही है, जिससे इसकी लोकप्रियता और मांग लगातार बढ़ रही है.
राजस्थान अपनी समृद्ध कला, संस्कृति और हस्तशिल्प के लिए दुनिया भर में पहचान रखता है. इन्हीं पारंपरिक कलाओं में एक खास नाम है थेवा कला का, जो रजवाड़ों के समय से चली आ रही है और आज भी लोगों को अपनी बारीक कारीगरी से आकर्षित कर रही है. सोने और चांदी पर की जाने वाली यह अनूठी कला राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है. बदलते समय के बावजूद थेवा कला से बने गहनों की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है और इनकी मांग देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक पहुंच चुकी है.
थेवा कला की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बारीक और बेहद नाजुक कारीगरी है. इस कला में सोने की पतली परत को विशेष तकनीक से तैयार किया जाता है और फिर उस पर हाथों से विभिन्न पारंपरिक आकृतियां उकेरी जाती हैं. इन डिजाइनों में राजस्थान की लोक संस्कृति, राजसी जीवनशैली और प्रकृति की झलक देखने को मिलती है. यही कारण है कि थेवा ज्वेलरी अन्य आभूषणों से अलग पहचान रखती है.
उदयपुर के भूपालपुरा स्थित हाउस ऑफ गहना के संचालक ने बताया कि थेवा कला सदियों पुरानी परंपरा है. पहले इस कला का उपयोग मुख्य रूप से शाही परिवारों के लिए आभूषण तैयार करने में किया जाता था. उस समय सोने की पतली चादर पर बेहद बारीक नक्काशी कर अलग-अलग आकृतियां बनाई जाती थीं. आज भी कारीगर उसी पारंपरिक तकनीक को अपनाकर इन गहनों का निर्माण कर रहे हैं.
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उन्होंने बताया कि थेवा ज्वेलरी में विशेष रूप से दूल्हा-दुल्हन, मोर, हाथी, राजसी झांकियां, पारंपरिक मांडने और लोक संस्कृति से जुड़े आकर्षक चित्र बनाए जाते हैं. इन डिजाइनों की खासियत उनकी बारीक कारीगरी और पारंपरिक शैली होती है, जो इसे और भी अनोखा बनाती है. इसे तैयार करने में काफी समय, मेहनत और धैर्य की जरूरत होती है, क्योंकि हर पैटर्न पूरी तरह हाथों से बनाया जाता है. कारीगरों की महीन कारीगरी के कारण एक छोटे से ज्वेलरी पीस को तैयार करने में भी कई दिन लग जाते हैं. यही वजह है कि थेवा ज्वेलरी को कला और परंपरा का बेहतरीन संगम माना जाता है.
समय के साथ थेवा कला में कुछ बदलाव भी देखने को मिले हैं. पहले यह कला केवल सोने के आभूषणों तक सीमित थी, लेकिन अब ग्राहकों की मांग को देखते हुए चांदी में भी थेवा ज्वेलरी तैयार की जा रही है. इससे यह कला अधिक लोगों तक पहुंच रही है और बजट के अनुसार भी ग्राहकों को विकल्प मिल रहे हैं. हालांकि, कारीगरी और डिजाइन की गुणवत्ता में कोई समझौता नहीं किया जाता.
थेवा कला सिर्फ एक आभूषण निर्माण तकनीक नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक है. यह कला अपनी पारंपरिक बारीकी और अनोखी डिजाइन शैली के लिए जानी जाती है. आधुनिक मशीनों के दौर में भी थेवा ज्वेलरी पूरी तरह हाथों से तैयार की जाती है, जिससे इसकी खूबसूरती और मूल्य दोनों बढ़ जाते हैं. इसमें कारीगर अपनी कला और धैर्य का अद्भुत प्रदर्शन करते हैं. यही कारण है कि यह आभूषण न केवल पारंपरिक परिधान के साथ, बल्कि आधुनिक फैशन के साथ भी खूब पसंद किया जा रहा है. आज युवा वर्ग भी इसे स्टाइल स्टेटमेंट के रूप में अपनाने लगा है.
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