अशोक गहलोत की साढ़े 3 साल बाद 10 जनपथ में ‘एंट्री’, क्या फिर बदलेगा कांग्रेस का सियासी गणित?

Last Updated:June 26, 2026, 15:36 IST
Ashok Gehlot and Sonia Gandhi Meeting : राजस्थान के पूर्व सीएम अशोक गहलोत की दिल्ली में 10 जनपथ पर सोनिया गांधी के साथ ही हुई बैठक ने राजस्थान में जोरदार सियासी हलचल पैदा कर दी है. गहलोत की करीब साढ़े तीन साल बाद 10 जनपथ में एंट्री हुई है. हालांकि इस एंट्री का कारण अलग है लेकिन राजस्थान में इसके कई तरह के मायने निकाले जा रहे हैं. इसे भविष्य की राजनीति के नए संकेत माना जा रहा है. इससे कई समीकरण बन और बिगड़ सकते हैं.अशोक गहलोत की सोनिया गांधी के साथ हुई बैठक के बाद राजस्थान कांग्रेस में हलचल मची हुई है.
जयपुर. कांग्रेस के दिग्गज नेता और राजस्थान के तीन बार सीएम रह चुके अशोक गहलोत की करीब साढ़े साल के बाद एक बार फिर से कांग्रेस के सबसे बड़े दिल्ली दरबार 10 जनपथ पर ‘एंट्री’ हो गई है. यह एंट्री भले ही संकट से घिरे गांधी परिवार के ट्रस्टों को सुरक्षित रखने के मद्देनजर हुई हो लेकिन इसे राजस्थान के सियासी हलकों में अलग नजरिये से देखा जा रहा है. गहलोत की 10 जनपथ में सोनिया दरबार में मौजूदगी को सूबे में कांग्रेस के सियासी गणित को बनाने और बिगड़ने की चर्चाओं को तेज कर दिया है. राजनीति के जानकार इसके कई मायने निकाल रहे हैं.
पार्टी सूत्रों के मुताबिक राजीव गांधी ट्रस्ट और गांधी परिवार के अन्य ट्रस्टों को विदेशी अंशदान विनियमन कानून (एफसीआरए) के नए नियमों में घिरते देखकर सोनिया गांधी ने इससे निपटने की रणनीति बनाने के लिए अपने पुराने वफादारों को कॉल कर दिल्ली जमा किया था. गुरुवार को 10 जनपथ पर हुई इस मिटिंग में पार्टी के पुराने वफादार अशोक गहलोत के अलावा मुकुल वासनिक, पवन बंसल, जर्नादन द्विवेदी और सलमान खुर्शीद शामिल हुए थे. गांधी परिवार के ट्रस्टों में से एक मामला राजस्थान से भी जुड़ा हुआ बताया जा रहा है.
गहलोत इंदिरा और राजीव गांधी के साथ भी काम कर चुके हैं
गुरुवार को दोपहर में हुई बैठक में गहलोत की भले ही सोनिया गांधी से वन-टू-वन मुलाकात नहीं हुई हो लेकिन 10 जनपथ पर ‘क्लोज डोर मिटिंग’ में उनकी उपस्थिति कई सियासी संकेत दे गई. राजस्थान में विधानसभा चुनाव से करीब ढाई साल पहले हुए इस घटनाक्रम ने सचिन पायलट समर्थकों की चिंता को बढ़ा दिया है. अशोक गहलोत की गिनती देश में गांधी के परिवार से सबसे पुराने वफादारों में होती है. अशोक गहलोत इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के साथ लंबे समय तक काम कर चुके हैं. अशोक गहलोत को पार्टी का ‘संकटमोचक’ माना जाता है. वे अपने राजनीतिक अनुभव के बूते कई बार पार्टी को बड़े संकटों से बाहर निकाल चुके हैं.
राहुल की ‘हां-ना’ के बीच गहलोत ने सभी समीकरण अपने फेवर में कर लिए थेगहलोत के इसी वफादारी और भरोसे के बूते पार्टी आलाकमान ने तीन बार उनको सूबे की बतौर मुख्यमंत्री कमान सौंपी थी. वे पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव समेत राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष और अन्य अहम पदों पर पार्टी के लिए काम कर चुके हैं. साल 2018 में राजस्थान में कांग्रेस की जीत के बाद सीएम की कुर्सी के लिए उलझे तमाम सियासी समीकरणों के बावजूद गहलोत आलाकमान के भरोसे के बूते उस पर काबिज होने में कामयाब हो गए थे. माना जाता है कि राहुल की ‘हां-ना’ के बीच गहलोत ने जिस तरह से सभी समीकरण अपने फेवर में किए थे उनमें 10 जनपथ का बड़ा सपोर्ट था. यही वजह थी कि वे अपना सियासी जादू चलाने में सफल हो गए थे. लेकिन बाद में राजस्थान में सीएम की कुर्सी को लेकर बवाल मचा उसमें गहलोत की वफादारी को थोड़ी चोट पहुंची थी.
कुर्सी के हस्तातंरण’ के प्रयास के बाद बिगड़ गया था खेलयह चोट पहुंची थी 25 सितंबर 2022 को जब पार्टी आलाकमान सोनिया ने ‘कुर्सी के हस्तातंरण’ और सचिन को सत्तासीन करने के लिए अपने दो खास दूत मल्लिकार्जुन खड़गे और अजय माकन को विधायकों की रायशुमारी करने के लिए भेजा था. लेकिन ‘पॉवर ट्रांसफर’ की यह प्रक्रिया पूरी तरह से संपन्न नहीं हो पाई. रायशुमारी के लिए बुलाए गए पार्टी के विधायक बैठक में गए ही नहीं और पूरा गणित उलझ गया. सोनिया के दोनों दूत विधायकों का इंतजार करते रह गए. राजस्थान कांग्रेस में हुए इस सियासी स्यापा को पूरे देश ने देखा. नतीजा यह हुआ कि सचिन को कुर्सी दिलाने आए खड़गे और माकन खाली हाथ लौट गए. इससे 10 जनपथ नाराज हो गया. इसे कथित तौर पर कुर्सी के लिए गहलोत की वफादारी में ‘बगावत’ माना गया.
गहलोत मुसीबत से तो पार तो पा गए लेकिन…हालांकि अंदरखाने गहलोत और उनके समर्थकों ने इसे सोनिया या पार्टी के खिलाफ बगावत नहीं बल्कि विधायकों का बतौर सीएम सचिन पायलट को अस्वीकार करना बताया था. यह बात दीगर है कि सार्वजनिक तौर पर पार्टी स्तर पर जुबानी जंग नहीं हुई लेकिन अंदरखाने राजनीति के जानकार गहलोत की जादूगरी के आगे ‘नत मस्तक’ हो गए. इस मुसीबत से गहलोत पार तो पा गए लेकिन उनकी 10 जनपथ से ‘तनाव’ कम ‘दूरियां’ हो गई. उसके बाद आपसी खींचतान के चलते कांग्रेस 2023 के विधानसभा चुनाव में सत्ता से बाहर हो गई थी. तब से गहलोत की 10 जनपथ में एंट्री थम गई. राजनीति के जानकार बताते हैं कि बीते करीब साढ़े तीन साल में यह पहला मौका है जब गहलोत की 10 जनपथ पहुंचे हैं.
गहलोत की सियासी जादूगिरी की थाह लेना आसान नहीं हैगहलोत की दस जनपथ पर एंट्री के बाद राजस्थान की सियासत में हलचल शुरू हो गई. अब कयास इस बात के लगाए जा रहे हैं कि क्या आने वाले दिनों में गहलोत 10 जनपथ के बूते फिर से अपना रुतबा कायम करेंगे? राजस्थान में करीब ढाई साल बाद विधानसभा चुनाव होने हैं. क्या इस बार फिर से गहलोत की 10 जनपथ की मुलाकात पार्टी में तेजी से आगे बढ़ रहे उनके खास प्रतिद्वंदी सचिन पायलट के ‘मिशन’ में आड़े आ सकती है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हालांकि गहलोत की सियासी जादूगिरी की थाह लेना आसान नहीं है. लेकिन पार्टी में इन दिनों जिस तरह से पायलट आगे बढ़ रहे हैं और पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा तथा नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली की भूमिका बढ़ती जा रही है उसमें यह आसान नहीं होगा.
यह गहलोत के लिए खतरे की घंटी हो सकती हैराहुल गांधी के राजस्थान में बीते दो दौरों में जिस तरह से डोटासरा और जूली को तवज्जो मिली है वह गहलोत के लिए खतरे की घंटी हो सकती है. वहीं पायलट की लोकप्रियता और ‘क्राउड पुलर’ लीडर की इमेज के चलते यह उतना आसान नहीं है. राजस्थान में कांग्रेस में जिस तरह के हालात चल रहे हैं और पायलट को पार्टी ने जिस तरह के अवसर दे रखे हैं उन सबसे सचिन के ‘फेस वेल्यू’ काफी हाई है. पिछले दिनों पांच राज्यों में हुई चुनाव में केरल में सचिन पायलट अपना जलवा दिखा चुके हैं. वहां कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ (संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा) ने जिस तरह का शानदार प्रदर्शन किया था उसमें सचिन की भी बड़ी भूमिका मानी गई. लिहाजा गहलोत की डगर आसान नहीं है. यह अलग बात है कि वे समय आने पर कोई .तुरुप’ का पत्ता चल दें.
About the AuthorSandeep Rathore
संदीप राठौड़ वर्तमान में न्यूज18 इंडिया में क्लस्टर हेड राजस्थान (डिजिटल) पद पर कार्यरत हैं। राजनीति, क्राइम और सामाजिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग में रूचि रखने वाले संदीप को पत्रकारिता का ढाई दशक से ज्यादा का अनुभव…और पढ़ें
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