क्या वाकई बनाई जा सकती है घास की रोटी, जो महाराणा प्रताप खाते थे

भारत में महाराणा प्रताप को लेकर ये बात हमेशा से कही जाती रही है कि अपने संघर्ष के दिनों में उन्होंने घास की रोटियां खाईं. ये बात भारतीय इतिहास और लोक-कथाओं में बहुत प्रसिद्ध है. – क्या सच में घास की रोटियां खाई जा सकती हैं. साइंस और व्यावहारिक पहलू इस बारे में क्या कहते हैं.
तो इसका जवाब है – हां, घास की रोटी खाई जा सकती है, लेकिन ये वो घास नहीं होती, जो हम देखते हैं. यानि वो आम हरी घास नहीं होती. वैज्ञानिक रूप से गेहूं, चावल, मक्का, बाजरा और जौ जैसी फसलें भी ‘घास परिवार’ हम इनके बीजों को खाते हैं.
क्या कहते हैं इस जंगली घास को
हालांकि महाराणा प्रताप जिस घास और उसके बीज को खाते थे, वो जंगली घास और उसके बीज थे. भारत में प्राचीन समय और मध्य काल में ये जिक्र मिलता है कि संकट के समय या अकाल के दौरान लोग जंगली घास के बीजों को इकट्ठा करके उन्हें पीसकर आटा बनाते थे. राजस्थान के थार और अरावली क्षेत्रों में ‘भभूट’ या ‘करड़’ जैसी जंगली घास होती हैं, जिनके बीजों में पोषक तत्व होते हैं.
मनुष्य का पेट गाय या भैंस की तरह सेल्युलोज़ यानि हरी घास में पाये जाने वाले फाइबर को पूरी तरह नहीं पचा सकता. इसलिए सीधे हरी घास चबाकर पेट भरना नामुमकिन है, उससे पेट खराब हो सकता है. अलबत्ता संकट के समय इन जंगली घासों के बीजों का आटा बनाकर रोटियां बिल्कुल खाई जा सकती हैं और इतिहास में अकाल के दौरान लोगों ने ऐसा किया भी है.
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क्या महाराणा प्रताप ने घास की रोटी खाई थी?
इतिहासकारों के बीच इस बात को लेकर दो अलग-अलग मत हैं, राजस्थानी साहित्य के महान कवि कन्हैयालाल सेठिया की प्रसिद्ध कविता “पीथल और पाथल” में इस घटना का बहुत भावुक वर्णन है. जिसमें कविता की पंक्तियों के जरिए जाहिर किया गया है कि जब एक जंगली बिल्ली महाराणा प्रताप की बेटी के हाथ से घास की रोटी छीनकर भाग जाती है, तो बच्चों की यह दशा देखकर प्रताप का दिल पसीज जाता है. वे अकबर को संधि पत्र लिखने की सोचते हैं.
आधुनिक और तत्कालीन इतिहासकार इस घटना को पूरी तरह सच नहीं मानते. इसके पीछे कुछ मुख्य कारण हैं-– अरावली की पहाड़ियों में रहने वाले स्थानीय भील आदिवासी महाराणा प्रताप के पक्के सहयोगी थे. वे कंद-मूल, फल, शहद और शिकार की व्यवस्था करने में माहिर थे. उनके रहते प्रताप के परिवार को घास की रोटी खाने की नौबत आना मुश्किल लगता है.
– महाराणा प्रताप गुरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) लड़ रहे थे. पहाड़ों में उनके पास रसद और भोजन सामग्री पहुंचाने के गुप्त रास्ते थे. भामाशाह जैसे दानवीरों ने भी उन्हें इतनी बड़ी आर्थिक सहायता दी थी कि सेना का खर्च और भोजन आसानी से चल सके.
इतिहास के अनुसार, उस कठिन संघर्ष के समय महाराणा प्रताप की कोई छोटी बेटी नहीं थी जो रोई हो. उनके पुत्र अमर सिंह उस समय काफी बड़े हो चुके थे.
बुंदेलखंड में अब भी लोग फिकर जंगली घास के बीजों को पीसकर रोटी बनाते हैं और खाते हैं. (AI Photo)
बुंदेलखंड में लोग अब भी खाते हैं ऐसी रोटियां
व्यावहारिक रूप से जंगली घास के बीजों को पीसकर रोटी बनाना और खाना बिल्कुल संभव है. राजस्थान के इतिहास में अकाल के समय गरीबों ने ऐसा किया भी है. वनस्पति शास्त्रियों का मानना है कि बहुत सारे अनाज हजारों साल पहले जंगली घास ही थे. बुंदेलखंड के गरीब लोग अब भी भूखमरी के कारण फिकर घास के दानों की रोटी खाने को मजबूर रहते हैं.
फिकर घास जंगली अनाज ज्यादा है, जो बुंदेलखंड व मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में आज भी होता है. ये भी कहा जाता है कि महाराणा प्रताप प्रताप चिरचिटा वनस्पति के बीज की रोटियां भी खाते थे, जो भी एक घास से होने वाला अनाज कहा जाता है, इसको खाने से लंबे समय तक भूख नहीं लगती.
अब ये सुपरफूड
फिकर अनाज को जंगली गेहूं भी कहते हैं. आज के समय में उच्च पोषण और स्वास्थ्य संबंधी महत्व है, खासकर कुपोषण व डायबिटीज से निपटने में. आज के समय में बुंदेलखंड में फिकार की खेती भी की जाने लगी है. इसमें फाइबर, प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन और एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में मिलते हैं. ये पाचन दुरुस्त रखता है.
वजन घटाने में सहायक होता है. इसको खाने से हड्डियां मजबूत रहती हैं और कैल्शियम कमी से बचाव होता है. एनीमिया का खतरा कम होता है. ग्लूटन-फ्री लोगों के लिए ये वाकई बहुत फायदेमंद है. ये इम्यूनिटी बढ़ाता है और शरीर को एनर्जी देता है. कुल मिलाकर इस घास के बीज को अब सुपरफूड कहा जाने लगा है. बुंदेलखंड में इसकी खेती बढ़ रही है.



