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Last Updated:June 24, 2026, 11:11 IST
Bikaner News : बीकानेर के गजनेर में वैज्ञानिकों ने छिपकली की नई प्रजाति मेसालिना बिश्नोई खोजी है. यह भारत में मेसालिना जीनस का पहला प्रमाणित रिकॉर्ड माना गया है. राजकीय डूंगर महाविद्यालय के जूलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रताप सिंह ने बताया कि वर्ष 1935 में ब्रिटिश जीवविज्ञानी मैल्कम ए. स्मिथ ने जैसलमेर क्षेत्र में मेसालिना जीनस की एक प्रजाति का उल्लेख किया था, लेकिन उसके कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं थे.
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बीकानेर. राजस्थान के बीकानेर जिले ने एक बार फिर जैव विविधता के क्षेत्र में देशभर का ध्यान अपनी ओर खींचा है. गजनेर क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने छिपकली की एक नई प्रजाति की खोज की है, जिसका नाम ‘मेसालिना बिश्नोई’ रखा गया है. यह भारत में मेसालिना जीनस का पहला प्रमाणित रिकॉर्ड माना जा रहा है. इस खोज से न केवल थार मरुस्थल की समृद्ध जैव विविधता सामने आई है, बल्कि वन्यजीव संरक्षण में बिश्नोई समाज के योगदान को भी वैश्विक स्तर पर सम्मान मिला है.
यह खोज जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI) के वैज्ञानिकों और अन्य शोधकर्ताओं द्वारा अगस्त 2025 में गजनेर के निकट अर्ध-रेगिस्तानी क्षेत्र में किए गए फील्ड सर्वे के दौरान हुई. शोधकर्ताओं ने बताया कि गजनेर वन क्षेत्र की ओर जाते समय वे रास्ते में एक चाय की दुकान पर रुके थे. वहीं एक छोटी-सी छिपकली ने उनका ध्यान आकर्षित किया. बाद में उसकी शारीरिक संरचना और डीएनए का गहन अध्ययन किया गया, जिससे पता चला कि यह विज्ञान के लिए पूरी तरह नई प्रजाति है. अध्ययन के सह-लेखक धर्मेंद्र खंडाल ने बताया कि इस नई प्रजाति का नाम ‘मेसालिना बिश्नोई’ इसलिए रखा गया है, ताकि बिश्नोई समुदाय की वन्यजीवों और प्रकृति संरक्षण के प्रति सदियों पुरानी प्रतिबद्धता को सम्मान दिया जा सके.
वैज्ञानिकों के लिए क्यों है खासराजकीय डूंगर महाविद्यालय के जूलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रताप सिंह ने बताया कि वर्ष 1935 में ब्रिटिश जीवविज्ञानी मैल्कम ए. स्मिथ ने जैसलमेर क्षेत्र में मेसालिना जीनस की एक प्रजाति का उल्लेख किया था, लेकिन उसके कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं थे. अब बीकानेर के गजनेर से मिले नमूनों के डीएनए और मॉर्फोलॉजिकल कैरेक्टर के आधार पर वैज्ञानिक सुमित रॉय और उनकी टीम ने इसे नई प्रजाति घोषित किया है. यह पूरे भारत के लिए नई प्रजाति है और देश की जैव विविधता में एक महत्वपूर्ण नया अध्याय जोड़ती है. वैज्ञानिकों के अनुसार यह छिपकली आकार में बेहद छोटी होती है. इसकी लंबाई लगभग 39.2 मिलीमीटर होती है. इसका रंग स्लेटी से ऑलिव-भूरा होता है तथा गर्दन से पूंछ तक दो स्पष्ट धारियां दिखाई देती हैं. आंखों के पीछे काले निशान, शरीर पर गहरे धब्बे और उनके बीच सफेद बिंदु इसे अन्य प्रजातियों से अलग पहचान देते हैं. शरीर का निचला हिस्सा हल्के स्लेटी या मटमैले सफेद रंग का होता है.
थार की जैव विविधता का नया अध्यायशोधकर्ताओं ने इसे ऐसे क्षेत्र में पाया, जहां जमीन कठोर और पथरीली थी तथा रेगिस्तानी वनस्पति बहुत कम थी. यह प्रजाति शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में रहना पसंद करती है और विशेष रूप से पत्थरीले इलाकों में अधिक पाई जाती है. सर्वे के दौरान इसके साथ सहगल गेको, स्पॉटेड डेजर्ट रेसर और सॉ-स्केल्ड वाइपर जैसे अन्य सरीसृप भी दर्ज किए गए. डॉ. प्रताप सिंह ने बताया कि फिलहाल इस प्रजाति की जानकारी केवल बीकानेर के गजनेर क्षेत्र से ही मिली है. इसकी वास्तविक आबादी का पता व्यापक सर्वे के बाद ही चल सकेगा. उन्होंने कहा कि यह खोज इस बात का संकेत है कि थार मरुस्थल में अभी भी कई ऐसी जीव प्रजातियां मौजूद हैं, जिनकी वैज्ञानिक पहचान होना बाकी है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज पश्चिमी भारत के शुष्क क्षेत्रों में और अधिक टैक्सोनॉमिक सर्वे की आवश्यकता को रेखांकित करती है. साथ ही यह साबित करती है कि थार का मरुस्थल केवल कठोर जलवायु वाला क्षेत्र ही नहीं, बल्कि अद्भुत और अब तक अनजानी जैव विविधता का भी महत्वपूर्ण केंद्र है.
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आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें
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