40 हजार किलो घी की नींव पर बना है बीकानेर का भांडाशाह जैन मंदिर, जानिए रहस्य

Last Updated:July 03, 2026, 05:16 IST
Bikaner Bhandashah Jain Temple: बीकानेर का 500 साल पुराना भांडाशाह जैन मंदिर अपनी अनूठी निर्माण शैली के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है. लाल और पीले पत्थरों से बने इस तीन मंजिला मंदिर की नींव में करीब 40 हजार किलो देशी घी और बजरी का उपयोग किया गया है. मंदिर के गर्भगृह में भगवान सुमतिनाथ की दिव्य प्रतिमा विराजमान है. दीवारों और गुंबदों पर प्राकृतिक रंगों से बनी बारीक चित्रकारी और सोने की मीनाकारी कला प्रेमियों तथा पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है.
भांडाशाह जैन मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भव्य और जीवंत चित्रकारी है. मंदिर की दीवारों, स्तंभों और विशाल गुंबदों पर प्राकृतिक रंगों (Natural Pigments) से बनाई गई इन पेंटिंग्स में जैन धार्मिक कथाओं, तीर्थंकरों के जीवन चरित्र, प्राचीन समृद्ध नगरों, राजदरबारों के वैभव और तत्कालीन सामाजिक जीवन का अद्भुत व बारीक चित्रण किया गया है. लगभग 500 वर्ष पुरानी होने के बावजूद ये ऐतिहासिक चित्रकलाएं आज भी अपनी अनूठी चमक, ताज़गी और अद्वितीय सुंदरता को सहेजे हुए हैं. यहाँ का हर एक चित्र उस दौर की समृद्ध संस्कृति, उत्कृष्ट कला और बेजोड़ शिल्प कौशल की जीवंत कहानी बयां करता है. मंदिर की यह पच्चीकारी और चित्रकारी भारतीय पारंपरिक भित्ति कला (Traditional Indian Fresco Art) का एक सर्वोत्कृष्ट और अनुपम उदाहरण मानी जाती है.
भांडाशाह जैन मंदिर का विशाल गुंबद अपनी अनूठी बनावट और बेहद बारीक चित्रकारी के लिए विशेष पहचान रखता है. गुंबद के मध्य (केंद्र) भाग में एक अत्यंत सुंदर और कलात्मक कमल की आकृति उकेरी गई है, जिसके चारों ओर जैन धर्म के विभिन्न पवित्र तीर्थों, ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों और प्राचीन भव्य इमारतों के मनमोहक चित्र अंकित हैं. इतनी सूक्ष्म और महीन कारीगरी उस मध्यकालीन युग के कलाकारों की अद्भुत प्रतिभा, धैर्य और अद्वितीय कल्पनाशीलता को दर्शाती है. मंदिर के भीतर खड़े होकर जब कोई ऊपर छत की ओर देखता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरा इतिहास एक विशाल गोलाकार कैनवास पर जीवंत हो उठा हो. यही कारण है कि मंदिर की यह कलात्मक छत और गुंबद यहाँ आने वाले देश-विदेश के पर्यटकों और कला प्रेमियों के आकर्षण का सबसे प्रमुख केंद्र हैं.
भांडाशाह जैन मंदिर की छत और ऊपरी दीवारों पर की गई चित्रकारी वास्तुकला और कला के बेजोड़ संगम को प्रदर्शित करती है. यहाँ के चित्रों में न केवल धार्मिक आस्था को पिरोया गया है, बल्कि तत्कालीन समृद्ध नगरों, अभेद्य किलों, विभिन्न जैन तीर्थों और पावन धार्मिक स्थलों को भी अकल्पनीय खूबसूरती के साथ दीवारों पर उतारा गया है. इन ऐतिहासिक भित्ति चित्रों (Frescos) में मध्यकालीन भारत की वास्तुकला, उस दौर के यातायात व परिवहन के साधनों और आम जनजीवन की बेहद जीवंत झलक देखने को मिलती है. सदियों पहले बिना किसी रासायनिक मिलावट के, केवल जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक रंगों (Natural Pigments) से तैयार की गई यह अनूठी कला आज भी उतनी ही तरोताज़ा और आकर्षक लगती है. यही वजह है कि कला प्रेमियों, इतिहासकारों और शोधकर्ताओं (Researchers) के लिए यह मंदिर किसी जीवंत और समृद्ध संग्रहालय (Living Museum) के समान है, जहाँ हर दीवार इतिहास का एक पन्ना खोलती है.
Add as Preferred Source on Google
भांडाशाह जैन मंदिर का गर्भगृह (Sanctum Sanctorum) अत्यंत भव्य, अलौकिक और कलात्मकता से परिपूर्ण है. यहाँ पाँचवें जैन तीर्थंकर भगवान श्री सुमतिनाथ जी की अत्यंत शांत, सौम्य और दिव्य प्रतिमा वेदी पर विराजमान है, जिनके दर्शन मात्र से ही मन भक्तिभाव से भर जाता है. गर्भगृह के भीतर और उसके चारों ओर की गई सोने के वर्क जैसी चमकदार सुनहरी सजावट, जटिल रंगीन मीनाकारी (Enamelwork) और पत्थरों पर की गई बारीक कलात्मक नक्काशी श्रद्धालुओं को एक अनूठी आध्यात्मिक अनुभूति कराती है. इस अद्भुत शिल्प को निहारने और प्रभु के दर्शन के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में स्थानीय और दूर-दराज से श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं. मंदिर परिसर का अत्यंत शांत वातावरण और वहाँ प्रवाहित होने वाली सकारात्मक आध्यात्मिक ऊर्जा हर आगंतुक और दर्शनार्थी को असीम आत्मिक शांति और सुकून का अनुभव कराती है.
भांडाशाह जैन मंदिर के विशाल गुंबद के आंतरिक भाग में अलग-अलग गोलाकार फ्रेम (Circular Panels) बने हुए हैं, जिनमें भारत के अनेक प्रसिद्ध जैन तीर्थों, पवित्र शिखरों और ऐतिहासिक स्थलों का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है. स्थापत्य कला की दृष्टि से प्रत्येक चित्र को ज्यामितीय संतुलन (Geometric Balance) और अकल्पनीय सूक्ष्मता के साथ उकेरा गया है. मंदिर की छत पर फैली यह अनूठी चित्रकारी न केवल गहरे धार्मिक विस्वास और अगाध आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह उस कालखंड की उन्नत चित्रकला, बेजोड़ स्थापत्य कला (Architecture) और कलात्मक सोच का भी एक नायाब दस्तावेज है. यहाँ आने वाले देश-विदेश के पर्यटक और कला प्रेमी गुंबद की इस अद्भुत पच्चीकारी और नक्काशी को देखकर विस्मित रह जाते हैं और अक्सर इस मंत्रमुग्ध कर देने वाली कलाकृति को अपने कैमरे में कैद किए बिना नहीं रह पाते.
भांडाशाह जैन मंदिर के फर्श और खंभों पर कई स्थानों पर आज भी जो हल्की चिकनाहट या तैलीय अंश महसूस होता है, वह इस ऐतिहासिक इमारत को और भी कौतुकपूर्ण बनाता है. स्थानीय जनश्रुतियों और मान्यताओं के अनुसार, यह उसी 40,000 किलोग्राम (40 टन) देसी घी का असर माना जाता है, जिसे 15वीं शताब्दी में मंदिर के निर्माण के समय इसकी मजबूत नींव में पानी की जगह इस्तेमाल किया गया था. मंदिर प्रबंधन और ट्रस्ट के अनुसार, साल भर देश-विदेश से आने वाले हजारों पर्यटक और श्रद्धालु विशेष रूप से इस अनोखी विशेषता को देखने और महसूस करने यहाँ आते हैं. हालांकि, इस चिकनाहट के पीछे की वैज्ञानिक पुष्टि एक अलग शोध का विषय हो सकती है (जैसे कि पत्थरों की विशेष पॉलिश, मौसम का प्रभाव या रखरखाव में प्रयुक्त सामग्री), लेकिन यह पारंपरिक मान्यता मंदिर के इतिहास को और भी रहस्यमयी व दिलचस्प बना देती है. यही कारण है कि भांडाशाह मंदिर न केवल अपनी स्थापत्य कला, बल्कि इस ‘घी से बनी नींव’ वाली लोककथा के कारण आज भी दुनिया भर के लोगों के लिए गहरी जिज्ञासा और आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.
भांडाशाह जैन मंदिर का महामंडप और सभा मंडप अपनी अद्भुत स्थापत्य कला और बेजोड़ नक्काशीदार खंभों (Pillars) के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है. यहाँ संगमरमर और लाल बलुआ पत्थरों के स्तंभों पर की गई बारीक कारीगरी, पारंपरिक राजस्थानी व जैन शैली के अलंकरण और आकर्षक रंगीन चित्रकारी मंदिर के आंतरिक सौंदर्य को कई गुना बढ़ा देती है. मंडप में मौजूद हर एक स्तंभ अपने आप में वास्तुकला का अनूठा दस्तावेज है; इन पर देवी-देवताओं, अप्सराओं, द्वारपालों, बेल-बूटों और विभिन्न मांगलिक प्रतीकों की आकृतियां इतनी सूक्ष्मता से उकेरी गई हैं कि देखने वाले दंग रह जाते हैं. हर खंभे का डिज़ाइन और उसकी पच्चीकारी दूसरे से अलग है, जो तत्कालीन शिल्पकारों की अद्वितीय कल्पनाशीलता और उनकी असाधारण प्रतिभा का जीवंत प्रमाण है. मंदिर का यह हिस्सा जहाँ आम श्रद्धालुओं को भक्तिभाव और शांति से सराबोर करता है, वहीं कला प्रेमियों, वास्तुशिल्पियों और पर्यटकों को अपनी बेजोड़ कारीगरी से मंत्रमुग्ध कर विशेष रूप से आकर्षित करता है.
भांडाशाह जैन मंदिर में स्थापित प्राचीन प्रतिमाएं जैन धर्म की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक हैं। मंदिर के विभिन्न कक्षों में सुंदर ढंग से स्थापित तीर्थंकरों की प्रतिमाएं श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। इन प्रतिमाओं के चारों ओर की गई रंगीन सजावट, नक्काशी और कलात्मक डिजाइनों से मंदिर की भव्यता और बढ़ जाती है। सदियों पुरानी यह धरोहर आज भी अपने मूल स्वरूप में सुरक्षित है और बीकानेर की ऐतिहासिक पहचान को देश-विदेश तक पहुंचा रही है।
न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें। राजस्थान की ताजा खबरें पढ़ने के लिए क्लिक करें|



