खामेनेई की सुपुर्द-ए-खाक की रस्में आज शुरू, जानिए इस्लाम में कैसे होता है आखिरी सफर

होमताजा खबरनॉलेज
खामेनेई की सुपुर्द-ए-खाक की रस्में आज शुरू, इस्लाम में कैसे होता है आखिर सफर
Last Updated:July 03, 2026, 05:57 IST
ईरान के मरहूम रहबर-ए-आला आयतुल्ला अली खामेनेई की सुपुर्द-ए-खाक की रस्में आज से शुरू हो रही हैं. तेहरान से मशहद तक कई दिनों तक चलने वाले मरासिम पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं. लेकिन आखिर ‘सुपुर्द-ए-खाक’ क्या होता है? गुस्ल, कफन, जनाजे की नमाज और दफ्न की रस्म कैसे पूरी की जाती है? कब्र में कौन उतर सकता है, क्या रात में भी दफ्न किया जा सकता है और फूलों को लेकर क्या रिवायत है? पढ़िए इस्लाम में आखिरी सफर की पूरी प्रक्रिया.इस्लाम में कैसे पूरा होता है आखिरी सफर, जानें क्या-क्या होता है.
Islamic Funeral: ईरान के रहबर-ए-आला कहे जाने वाले मरहूम आयतुल्ला अली खामेनेई की आखिरी रस्में आज से शुरू हो रही हैं. पूरी दुनिया की निगाहें तेहरान पर टिकी हैं, जहां लाखों लोगों के जमा होने की उम्मीद है. ईरानी हुकूमत ने कई दिनों तक चलने वाले जनाजे के प्रोग्राम का ऐलान किया है. सबसे पहले तेहरान में जनाजे की नमाज और आखिरी दीदार की रस्में अदा की जाएंगी. इसके बाद कुम में मजहबी मरासिम होंगे और फिर 9 जुलाई को मशहद में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा. आयतुल्ला खामेनेई की रुख्सती सिर्फ ईरान ही नहीं, बल्कि पूरी मुस्लिम दुनिया के लिए एक अहम वाकिया बन चुकी है. ऐसे में बहुत से लोगों के जेहन में यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर ‘सुपुर्द-ए-खाक’ क्या होता है और इस रस्म को किस तरह अंजाम दिया जाता है.
क्या होता है ‘सुपुर्द-ए-खाक’? ‘सुपुर्द-ए-खाक’ फारसी और उर्दू का लफ्ज है. इसका मतलब है ‘मिट्टी के हवाले करना’. इस्लाम में किसी शख्स के इंतकाल के बाद उसके जिस्म को पूरे एहतराम के साथ दफ्न करने की रस्म को सुपुर्द-ए-खाक कहा जाता है. इसे सिर्फ आखिरी रस्म नहीं, बल्कि एक मजहबी फर्ज भी माना जाता है.
सबसे पहले होता है गुस्लकिसी मुसलमान के इंतकाल के बाद सबसे पहले उसके जिस्म को शरीअत के मुताबिक पाक किया जाता है. इस अमल को ‘गुस्ल’ कहा जाता है. साफ पानी से पूरे जिस्म को धोया जाता है, ताकि मरहूम को पाक हालत में अल्लाह के हुजूर पेश किया जा सके. यह जिम्मेदारी आमतौर पर घर के लोग या इस काम का तजुर्बा रखने वाले लोग निभाते हैं.
पहनाया जाता है सफेद कफनगुस्ल के बाद मरहूम को सादे सफेद कपड़े में लपेटा जाता है, जिसे ‘कफन’ कहा जाता है. इस्लाम में सादगी पर बहुत जोर दिया गया है. इसलिए कफन में किसी तरह की सजावट या दिखावा नहीं किया जाता. अमीर और गरीब दोनों के लिए यही उसूल लागू होता है.
पढ़ी जाती है जनाजे की नमाज?कफन के बाद मरहूम को मस्जिद, ईदगाह या किसी खुले मैदान में ले जाया जाता है, जहां ‘सलात-उल-जनाजा’ अदा की जाती है. इस नमाज में मरहूम की मगफिरत (गुनाहों की माफी), रहमत और जन्नत में आला मकाम के लिए दुआ की जाती है. जनाजे की नमाज दूसरी नमाजों से अलग होती है. इस नमाज में रुकू और सज्दा नहीं होता है.
इसके बाद दफ्न की रस्मजनाजे की नमाज के बाद मरहूम को कब्रिस्तान ले जाया जाता है. इस्लाम में कोशिश की जाती है कि इंतकाल के बाद जल्द से जल्द दफ्न की रस्म पूरी कर ली जाए. कब्र पहले से तैयार रहती है. मरहूम को आमतौर पर दाहिनी करवट इस तरह लिटाया जाता है कि उनका चेहरा किबला यानी मक्का शरीफ की तरफ रहे. इसके बाद कब्र को मिट्टी से भर दिया जाता है. कई जगह मौजूद लोग भी तीन मुट्ठी मिट्टी कब्र में डालते हैं और मरहूम के लिए दुआ-ए-मगफिरत करते हैं. इस्लाम में कब्र को सादा रखना बेहतर माना गया है.
दफ्न के बाद क्या होता है?सुपुर्द-ए-खाक के बाद घर वाले, रिश्तेदार और अहबाब मरहूम के लिए दुआ करते हैं. ताजियत का सिलसिला शुरू होता है, जिसमें लोग घर पहुंचकर अहल-ए-खाना (परिवार के सदस्य) को सब्र की तालीम देते हैं और मरहूम की मगफिरत की दुआ करते हैं. आम तौर पर तीन दिन तक ताजियत (सांत्वना) का सिलसिला चलता है.
सुपुर्द-ए-खाक में फूलों को लेकर क्या रिवायत है?इस्लाम में सुपुर्द-ए-खाक की बुनियादी रस्मों में फूल चढ़ाना शामिल नहीं है. हालांकि कई मुस्लिम मुल्कों और इलाकों में लोग मरहूम के लिए मोहब्बत, एहतराम और याद के तौर पर कब्र पर फूल या गुलाब की पंखुड़ियां बिछाते हैं. इसे ज्यादातर स्थानीय रिवायत माना जाता है. इसीलिए, अलग-अलग जगहों में इसका तरीका भी अलग हो सकता है.
सुपुर्द-ए-खाक के दौरान कब्र में कौन उतर सकता है?आम तौर पर कब्र में मरहूम के बेटा, भाई, पिता या दूसरे महरम रिश्तेदार उतरते हैं. अगर ऐसा मुमकिन न हो, तो कब्रिस्तान के तजुर्बेकार लोग या दफ्न की रस्म अंजाम देने वाले लोग यह जिम्मेदारी निभाते हैं. कब्र में उतरने वाले लोगों का मकसद मरहूम को पूरे अदब और एहतराम के साथ दफ्न करना होता है.
क्या सुपुर्द-ए-खाक रात के वक्त भी किया जा सकता है?जी हां. इस्लामी तालीमात के मुताबिक अगर जरूरत हो तो रात के वक्त भी सुपुर्द-ए-खाक किया जा सकता है. हालांकि जहां मुमकिन हो, दिन के वक्त दफ्न को बेहतर माना जाता है, ताकि तमाम रस्में आसानी और बेहतर इंतजाम के साथ पूरी की जा सकें.
सुपुर्द-ए-खाक के बाद कब्र पर जाने की कोई तय मुद्दत होती है?नहीं. इस्लाम में कब्र पर जियारत करने के लिए कोई तय दिन, तारीख़ या मुद्दत मुकर्रर नहीं की गई है. लोग किसी भी वक्त मरहूम के लिए दुआ करने, क़ुरआन की तिलावत करने और आखिरत को याद करने की नीयत से कब्रिस्तान जा सकते हैं. अलग-अलग मुल्कों में इससे जुड़ी रवायतें अलग हो सकती हैं.
About the AuthorAnoop Kumar MishraAssistant Editor
Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international security affairs…और पढ़ें
न्यूजलेटर
अब ईमेल पर इनसाइड स्टोरीज
खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्स में
सबमिट करें



