जगन की हत्या के बाद लौटे डांग के डरावने किस्से,’ लिस्ट लेकर आना… नहीं तो खैर नहीं’ जैसी धमकियों से कांपते थे कर्मचारी

धौलपुर. अजमेर हाई सिक्योरिटी जेल में दस्यु जगन गुर्जर की हत्या के बाद एक बार फिर धौलपुर और चंबल के डांग क्षेत्र का खौफनाक दौर चर्चा में लौट आया है. एक समय ऐसा था, जब जगन गुर्जर का नाम सुनते ही गांवों में सन्नाटा पसर जाता था. डांग के बीहड़ों में वर्षों तक सक्रिय रहे जगन का खौफ सिर्फ आम लोगों तक सीमित नहीं था, बल्कि सरकारी कर्मचारी, ठेकेदार और पुलिसकर्मी भी उसके नाम से डरते थे. स्थानीय लोगों के अनुसार, कई विभागों के कर्मचारियों को डांग क्षेत्र में काम शुरू करने से पहले उसकी अनुमति लेनी पड़ती थी.
क्षेत्र में वर्षों तक यह चर्चा रही कि कर्मचारियों से कहा जाता था, “लिस्ट लेकर आना… नहीं तो खैर नहीं.” बताया जाता है कि उसके डर के कारण कई लोग ड्यूटी पर जाने से पहले भी कई बार सोचते थे. हालांकि इन बातों का आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय लोगों के बीच ये किस्से लंबे समय तक चर्चा का विषय रहे. अब अजमेर जेल में हुई हत्या के बाद डांग के बीहड़ों, उसके आतंक और उस दौर की कई पुरानी यादें एक बार फिर लोगों की जुबान पर लौट आई हैं.
पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती था डांग का दुर्गम इलाका
उस समय धौलपुर का डांग क्षेत्र पुलिस के लिए सबसे कठिन इलाकों में गिना जाता था. ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियां, गहरी खाइयां, घने जंगल और पथरीले रास्ते पुलिस की कार्रवाई में बड़ी बाधा बनते थे. कई स्थानों तक पुलिस वाहन पहुंच ही नहीं पाते थे. इसी भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर जगन गुर्जर और उसका गिरोह वर्षों तक पुलिस से बचता रहा. स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा रही कि सोने का गुर्जा-धौलपुर रोड पर स्थित सूआ देवहंस का किला उसके सुरक्षित ठिकानों में शामिल था. ऊंचाई पर स्थित इस स्थान से कई किलोमीटर दूर तक आने-जाने वालों पर नजर रखी जा सकती थी, जिससे पुलिस की गतिविधियों की पहले ही जानकारी मिल जाती थी.
मुखबिर होने के शक में दी थी धमकी
स्थानीय लोगों के अनुसार, जगन गुर्जर को हमेशा पुलिस मुखबिरों पर संदेह रहता था. वर्ष 2004-05 के दौरान बाड़ी क्षेत्र के एक ग्रामीण पर पुलिस को सूचना देने का शक होने पर उसने कथित तौर पर खुलेआम धमकी दी और फायरिंग भी की. हालात इतने गंभीर हो गए कि प्रशासन को संबंधित व्यक्ति के घर के आसपास राजस्थान आर्म्ड कांस्टेबुलरी की अस्थायी चौकी तक स्थापित करनी पड़ी. इसके बावजूद क्षेत्र में कई बार तनाव और फायरिंग जैसी घटनाओं की चर्चाएं होती रहीं.
वर्षों तक चलता रहा पुलिस का सर्च ऑपरेशन
धौलपुर, करौली और भरतपुर के बीहड़ों में जगन गुर्जर की तलाश के लिए राजस्थान पुलिस ने कई बड़े अभियान चलाए. कई मौकों पर मध्यप्रदेश पुलिस के साथ संयुक्त ऑपरेशन भी किए गए. बावजूद इसके, डांग की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और स्थानीय जानकारी के कारण वह लंबे समय तक गिरफ्त से बाहर रहा. बाद में उसने आत्मसमर्पण किया और विभिन्न मामलों में जेल में बंद रहा. सोमवार को अजमेर हाई सिक्योरिटी जेल में उसकी हत्या के बाद उसका नाम फिर सुर्खियों में आ गया.
जगन को ‘टाइगर’ कहकर संबोधित करती थीं पत्नी कोमेश गुर्जर
जगन गुर्जर की पत्नी और पूर्व दस्यु कोमेश गुर्जर भी लंबे समय तक उसके साथ बीहड़ों में सक्रिय रही थीं. स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, वह जगन को “टाइगर” कहकर संबोधित करती थीं. यह भी कहा जाता है कि कई बार संभावित पुलिस मुठभेड़ की आशंका होने पर उन्होंने जगन को आगे बढ़ने से रोका और वापस लौटने की सलाह दी. वर्ष 2008 में पुलिस मुठभेड़ के दौरान घायल होने के बाद कोमेश गुर्जर को गिरफ्तार कर लिया गया था. वर्तमान में वह बाड़ी स्थित अपने घर में रहती हैं.
राजस्थान और मध्यप्रदेश में 128 मुकदमों में दर्ज था नाम
बताया जाता है कि जगन गुर्जर ने अपराध की दुनिया में कदम एक छोटे चोरी के मामले से रखा था. इसके बाद वह चंबल के बीहड़ों में सक्रिय हो गया और धीरे-धीरे हत्या, अपहरण, रंगदारी, लूट, फायरिंग और अवैध हथियारों जैसे गंभीर मामलों में उसका नाम जुड़ता गया. राजस्थान और मध्यप्रदेश में उसके खिलाफ कुल 128 मुकदमे दर्ज हुए. इनमें से 78 मामलों में वह बरी हो गया, जबकि अन्य मामलों की कानूनी प्रक्रिया अलग-अलग स्तर पर चलती रही.
जगन गुर्जर की हत्या के बाद डांग क्षेत्र में एक बार फिर उसके आतंक, बीहड़ों की जिंदगी और अपराध जगत से जुड़े पुराने किस्से चर्चा में हैं. हालांकि इन घटनाओं में से कई स्थानीय लोगों की स्मृतियों, अनुभवों और वर्षों से प्रचलित चर्चाओं पर आधारित हैं. फिर भी इतना तय है कि चंबल के बीहड़ों का यह अध्याय आज भी धौलपुर के डांग क्षेत्र की यादों में जिंदा है.



