Rajasthan

700 सैनिक… 500 शिक्षक… आखिर क्यों पूरे राजस्थान में चर्चा में है झुंझुनूं का भालोठ?

Last Updated:July 05, 2026, 10:25 IST

Jhunjhunu Bhaloth Village: झुंझुनूं जिले का भालोठ गांव आज देश सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी मिसाल बन चुका है. दिल्ली के तत्कालीन बादशाह गयासुद्दीन द्वारा दान में दी गई 52 हजार बीघा भूमि पर भाल नामक व्यक्ति द्वारा बसाए गए इस गांव ने अब तक भारतीय सेना को 700 सैनिक और शिक्षा विभाग को 500 शिक्षक दिए हैं. सैनिकों और शिक्षकों की इस पावन भूमि का धार्मिक इतिहास भी समृद्ध है, जहाँ संवत 1308 का गुड़गांव वाली माता का मंदिर और राजा खेतड़ी द्वारा निर्मित अष्टधातु की मूर्तियों वाला ऐतिहासिक ठाकुरजी का मंदिर स्थित है.

राजस्थान के झुंझुनूं जिले का भालोठ गांव अपनी एक बेहद अनूठी पहचान के कारण पूरे प्रदेश में मशहूर है. इस गांव ने भारतीय सेना को अब तक 700 से अधिक सैनिक दिए हैं और साथ ही यहां से लगभग 500 शिक्षक भी निकले हैं, जो इसे देश सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में एक बेहतरीन मिसाल बनाते हैं.

इस गांव के युवाओं में सेना में भर्ती होने और शिक्षा के माध्यम से समाज को आगे बढ़ाने का जज्बा पीढ़ियों से देखने को मिलता है, जिससे भालोठ का इतिहास भी उतना ही गौरवशाली है जितना कि इसका वर्तमान. प्रशासक संतोष देवी के अनुसार दिल्ली के तत्कालीन बादशाह गयासुद्दीन ने यहां 52 हजार बीघा भूमि दान दी थी, जिस पर भाल नामक व्यक्ति ने इस गांव को बसाया था और उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम भालोठ पड़ गया.

आज भी यहां के ग्रामीण इस गौरवशाली इतिहास को अपनी अनमोल विरासत के रूप में संजोए हुए हैं और आजादी के बाद वर्ष 1948 में भालोठ को पंचायत का दर्जा मिला था. प्रशासक ने बताया कि साल 1952 में यहां पांचवीं तक का पहला विद्यालय खोला गया था, जिसे बाद में 1958 में दसवीं तक उन्नत कर दिया गया, और शिक्षा के प्रति इसी शुरुआती जागरूकता का परिणाम है कि आज इस गांव से सैकड़ों शिक्षक निकलकर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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भालोठ के लोग केवल शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि देश की सुरक्षा में भी एक बेहद अहम भूमिका निभा रहे हैं क्योंकि गांव के लगभग 700 जवान भारतीय सेना सहित विभिन्न सुरक्षा बलों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं या वर्तमान में भी देश की रक्षा में तैनात हैं. यही कारण है कि इस गांव को सैनिकों और शिक्षकों की पावन धरती के रूप में बड़े सम्मान की नजर से देखा जाता है और इसके साथ ही भालोठ गांव धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी बेहद समृद्ध है.

गांव में संवत 1308 में गुड़गांव वाली माता का मंदिर बनाया गया था जहां लोगों की बेहद गहरी आस्था जुड़ी हुई है. ऐसी मान्यता है कि होली के दिन यहां स्नान करने वाली महिलाओं की संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी होती है, यही कारण है कि इस गांव में मन्नत लेकर दूर-दूर से महिलाएं आती हैं. इस मंदिर में साल में कई बार विशेष आयोजन किए जाते हैं और खासकर नवरात्रि के समय यहां माता के दर्शन के लिए भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है.

इसके अलावा खेतड़ी के तत्कालीन राजा ने भी यहां पर ठाकुरजी का एक भव्य मंदिर बनवाया था, जो आज भी अपनी सैकड़ों साल पुरानी प्राचीन वास्तुशैली और उसमें स्थापित अष्टधातु की मूर्तियों के लिए विशेष रूप से जाना जाता है. इस मंदिर में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन विशेष आयोजन किए जाते हैं और ठाकुरजी का बेहद खूबसूरत श्रृंगार किया जाता है, जिसके चलते यह मंदिर आज भी दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आस्था का केंद्र बना हुआ है.

इसके अलावा इस गांव में साल 2000 में ग्रामीणों ने सामूहिक सहयोग से जोहड़ वाले भोले बाबा का मंदिर भी बनवाया था. अपने इस गौरवशाली इतिहास, देशभक्ति, शिक्षा और अटूट आस्था जैसी कई अनूठी विशेषताओं के कारण भालोठ गांव आज भी पूरे प्रदेश में अपनी एक अलग और खास पहचान बनाए हुए है. वैसे इस गांव के लोग मूल रूप से खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं और यहां के कई प्रगतिशील किसान आधुनिक एवं उन्नत खेती के जरिए कृषि क्षेत्र में भी बेहतरीन काम कर रहे हैं.

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