पहाड़ों पर बढ़ रहा मानसिक तनाव, ये कैसी आफत में घिरा नैनीताल? मनोचिकित्सक ने बताया डरावना सच

नैनीताल. शांत वादियों, हरी-भरी पहाड़ियों और खूबसूरत झीलों के लिए पहचाना जाने वाला नैनीताल भी मानसिक तनाव, अवसाद और आत्महत्या जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों से अछूता नहीं है. बीते दिनों शहर में सामने आए आत्महत्या के मामलों ने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ा दी है. विशेषज्ञों का कहना है कि किसी व्यक्ति के आत्महत्या जैसा कदम उठाने के पीछे केवल एक वजह नहीं होती, बल्कि कई मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां मिलकर उसे गंभीर संकट की ओर धकेल सकती हैं. बीडी पांडे जिला अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. गरिमा कांडपाल के अनुसार, आत्महत्या के हर मामले को संवेदनशीलता और गंभीरता से समझने की जरूरत है. इसे केवल पारिवारिक विवाद, आर्थिक परेशानी या रिश्तों में तनाव जैसी किसी एक वजह से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. डिप्रेशन, घबराहट, अकेलापन, बेरोजगारी, नशे की लत, रिश्तों में टूटन, भविष्य को लेकर निराशा और सामाजिक दबाव जैसे कई कारण व्यक्ति की मानसिक स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं.
क्या हैं अवसाद के संकेत
डॉ. गरिमा बताती हैं कि कई बार व्यक्ति अपने भीतर चल रही परेशानी को खुलकर नहीं बता पाता. वह सामान्य दिखने की कोशिश करता है, लेकिन अंदर ही अंदर तनाव और निराशा से जूझ रहा होता है. ऐसे में परिवार, दोस्त और आसपास के लोगों को उसके व्यवहार में आने वाले बदलावों को समझना जरूरी है. यदि कोई व्यक्ति बार-बार आत्महत्या या मौत की बात करता है, लगातार उदास रहता है, लोगों से दूरी बनाने लगता है, पहले की तुलना में कम बोलता है या अचानक गुस्सैल और चिड़चिड़ा हो जाता है, तो इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. नींद न आना, भूख कम होना, हर समय बेचैनी महसूस करना, काम में मन न लगना, बार-बार रोना, खुद को बेकार समझना और भविष्य को लेकर नकारात्मक बातें करना भी तनाव और अवसाद के संकेत हो सकते हैं. कई लोग इन लक्षणों को सामान्य थकान या कमजोरी मानकर टाल देते हैं, लेकिन समय रहते मदद न मिलने पर स्थिति गंभीर हो सकती है.
इस वजह से बढ़ रहा तनाव
पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार के सीमित अवसर, पलायन, आर्थिक दबाव और पारिवारिक जिम्मेदारियां भी लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल रही हैं. युवाओं में नौकरी को लेकर चिंता, पढ़ाई का दबाव और रिलेशनशिप से जुड़ी परेशानियां तनाव का कारण बन रही हैं. शराब और अन्य नशीले पदार्थों का बढ़ता सेवन भी मानसिक समस्याओं को बढ़ाने में भूमिका निभा रहा हैं. डॉ. गरिमा कांडपाल के मुताबिक, नशा कुछ समय के लिए व्यक्ति को परेशानी से दूर होने का अहसास देता है, लेकिन लंबे समय में यह अवसाद, गुस्सा, हिंसक व्यवहार और आत्मघाती विचारों को बढ़ा सकता है. डॉ. गरिमा बताती हैं कि ऐसे समय में परिवार की भूमिका सबसे अहम होती है. किसी तनावग्रस्त व्यक्ति को डांटने, उसकी बात को हल्के में लेने या उसे कमजोर कहने के बजाय धैर्य से सुनना चाहिए. परिवार को यह समझना होगा कि मानसिक तनाव भी एक स्वास्थ्य समस्या है, जिसका इलाज संभव है, व्यक्ति को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए और उसके साथ नियमित बातचीत करनी चाहिए.
तुरंत करें ये जरूरी काम
डॉ. गरिमा का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति में तनाव से जुड़े संकेत दिखाई दें तो तुरंत मनोचिकित्सक या काउंसलर से संपर्क करना चाहिए. सही समय पर काउंसलिंग, जरूरी दवाएं और परिवार का सहयोग व्यक्ति को मानसिक संकट से बाहर निकालने में मदद कर सकता है. मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है, ताकि लोग बिना डर और शर्म के अपनी परेशानी साझा कर सकें. जीवन की कठिन परिस्थितियों में मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी है. यदि कोई व्यक्ति तनाव में है, तो उसे भरोसेमंद परिवारजन, दोस्त, डॉक्टर या काउंसलर से बात करनी चाहिए।



