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Agriculture Tips: भरतपुर के किसानों का देसी जुगाड़! बाजरे की इस ट्रिक से बिना खर्च बढ़ रहा मुनाफा

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भरतपुर के किसानों का देसी जुगाड़! बाजरे की इस ट्रिक से बिना खर्च बढ़ रहा…

Last Updated:July 09, 2026, 13:15 IST

Agriculture Tips: भरतपुर के किसान बाजरे की पैदावार बढ़ाने के लिए ‘रोपाई’ तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसमें खेत के घने हिस्सों से बाजरे के पौधे उखाड़कर खाली जगहों पर लगा दिए जाते हैं. मानसून की बारिश के दौरान अपनाई जाने वाली इस पारंपरिक विधि से बिना किसी अतिरिक्त खर्च और बीज के पौधों को समान धूप व पोषण मिलता है. इससे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों बढ़ते हैं, जिससे किसानों का मुनाफा बढ़ रहा है.

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Agriculture Tips: भरतपुर जिले के प्रगतिशील किसान अब पारंपरिक खेती में अपनी सूझबूझ और देसी तकनीकों का इस्तेमाल कर उत्पादन बढ़ाने की दिशा में एक नई मिसाल पेश कर रहे हैं. खासकर खरीफ सीजन की मुख्य फसल बाजरे में किसानों द्वारा अपनाई जा रही एक अनोखी और पारंपरिक तकनीक ‘रोपाई’ (Plant Translocation) बेहद फायदेमंद साबित हो रही है. इस सरल देसी फॉर्मूले के जरिए किसान बेहद कम लागत और कम मेहनत में अपने खेतों से बंपर पैदावार हासिल कर रहे हैं.

अक्सर देखा जाता है कि बुवाई के बाद खेतों में कहीं-कहीं बाजरे की फसल बहुत अधिक घनी उग जाती है, जबकि खेत के कुछ हिस्से खाली या विरल रह जाते हैं. ऐसे में भरतपुर के किसान एक स्मार्ट तरकीब अपनाते हैं. वे खेत के अत्यधिक घने हिस्सों से अतिरिक्त पौधों को बेहद सावधानीपूर्वक जड़ सहित उखाड़ लेते हैं. इसके बाद इन पौधों को खेत के उन खाली स्थानों पर रोप (लगा) देते हैं, जहाँ बीज अंकुरित नहीं हो पाए थे या फसल बेहद कम थी. स्थानीय भाषा में इस पूरी प्रक्रिया को ‘रोपाई’ कहा जाता है.

कम संसाधनों में पौधों को मिलता है समान पोषणइस तकनीक का सबसे बड़ा कृषि वैज्ञानिक फायदा यह है कि इससे पूरे खेत में पौधों के बीच की एक समान दूरी (Spacing) सुनिश्चित हो जाती है. जब पौधों को पर्याप्त जगह मिलती है, तो उन्हें ज़मीन से आवश्यक पोषक तत्व, पर्याप्त पानी और सूर्य की रोशनी (धूप) बराबर मात्रा में मिलती है. इससे पौधों की ग्रोथ तेजी से होती है, कल्ले अच्छे निकलते हैं और अंततः बाजरे के सिट्टे बड़े और चमकदार बनते हैं, जिससे कुल उत्पादन में भारी बढ़ोतरी दर्ज की जाती है.

बिना अतिरिक्त खर्च छोटे किसानों के लिए वरदानभरतपुर के स्थानीय किसानों का अनुभव है कि इस विधि में उन्हें किसी अतिरिक्त महंगे बीज या खाद पर पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती. यह पूरी तरह से शून्य बजट मैनेजमेंट जैसी प्रक्रिया है, जो ज्यादा कठिन भी नहीं है. यही वजह है कि जिले के छोटे और सीमांत किसान भी इसे बड़े पैमाने पर अपना रहे हैं. खेत में पौधों का सही संतुलन बने रहने से अनाज की गुणवत्ता भी नंबर वन होती है, जिससे बाजार में किसानों को उपज के ऊंचे दाम मिलते हैं और उनका शुद्ध मुनाफा बढ़ जाता है.

मानसून की बारिश के समय सबसे कारगरकिसान भाइयों के अनुसार, इस रोपाई कार्य को अंजाम देने का सबसे उपयुक्त समय मानसून की अच्छी बारिश का दौर होता है. बरसात के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होने के कारण जब पौधे को एक जगह से उखाड़कर दूसरी जगह लगाया जाता है, तो उसकी जड़ें मिट्टी को तुरंत पकड़ लेती हैं और पौधे बिना सूखे तेजी से वृद्धि करने लगते हैं. भरतपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से लोकप्रिय हो रही यह तकनीक साबित करती है कि अगर किसान अपनी समझ और मेहनत का सही तालमेल बिठाएं, तो कम संसाधनों में भी खेती को घाटे से उबारकर मुनाफे का सौदा बनाया जा सकता है.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें

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