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Sikar News: युद्ध पर जाने से पहले यहां शीश नवाते थे राव राजा माधोसिंह, जीतकर लौटते तो कहते- ‘बाबा, मेरी फतेह हो गई’

Last Updated:July 11, 2026, 09:37 IST

Sikar Oldest temple : सीकर का फतेह बालाजी धाम आस्था और राजघराने के इतिहास से जुड़ा है. राव राजा माधोसिंह युद्ध से पहले यहां आशीर्वाद लेते थे. यह मंदिर दक्षिणमुखी वीर हनुमान स्वरूप के लिए प्रसिद्ध है. मंदिर से जुड़ी एक और खास मान्यता स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित है. बताया जाता है कि पुराने दूजोद दरवाजे पर कभी भी किंवाड़ नहीं लगाए गए, क्योंकि नगर की रक्षा स्वयं फतेह बालाजी करते हैं.

सीकर. सीकर शहर के पुराने दूजोद दरवाजे के बीच स्थित सिद्धपीठ श्री फतेह बालाजी धाम केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि सीकर के राजघराने के इतिहास से भी गहराई से जुड़ा हुआ है. मान्यता है कि तत्कालीन राव राजा माधोसिंह जब भी किसी युद्ध पर निकलते थे, तो सबसे पहले फतेह बालाजी महाराज के दरबार में पहुंचकर विजय का आशीर्वाद लेते थे. युद्ध में सफलता मिलने के बाद भी वे सीधे इसी मंदिर में आकर बालाजी महाराज के चरणों में शीश नवाते और कहते थे, “बाबा, मेरी फतेह हो गई.” इसी ऐतिहासिक परंपरा के कारण इस मंदिर को आज फतेह बालाजी के नाम से जाना जाता है.

शहर के परकोटे में स्थित यह प्राचीन मंदिर दक्षिणमुखी वीर हनुमान स्वरूप के लिए प्रसिद्ध है. मंदिर के महंत पंडित रामावतार मिश्र बताते हैं कि उनके परिवार की सात पीढ़ियां यहां पूजा-अर्चना कर रही हैं. उनके अनुसार, राव राजा माधोसिंह की विजय यात्रा और इस मंदिर की आस्था का संबंध वर्षों पुराना है, जिसे आज भी श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ याद करते हैं.

नगर की रक्षा स्वयं करते हैं फतेह बालाजीमंदिर से जुड़ी एक और खास मान्यता स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित है. बताया जाता है कि पुराने दूजोद दरवाजे पर कभी भी किंवाड़ नहीं लगाए गए, क्योंकि नगर की रक्षा स्वयं फतेह बालाजी करते हैं. यही कारण है कि इस मंदिर में अन्य स्थानों की तरह पर्दा भी नहीं लगाया जाता. श्रद्धालु दिन और रात किसी भी समय बालाजी महाराज के दर्शन कर सकते हैं.

रोज लगाया जाता है रोट का भोगफतेह बालाजी धाम में वर्षभर धार्मिक आयोजन होते रहते हैं. प्रतिदिन बालाजी महाराज को मोटी रोटी यानी रोट का भोग लगाया जाता है. प्रत्येक मंगलवार को ज्योत प्रज्ज्वलित कर हलवा, खीर और चूरमा का विशेष प्रसाद अर्पित किया जाता है. पौष मास में हर मंगलवार पौष बड़ा महोत्सव आयोजित होता है, जबकि चैत्र पूर्णिमा पर हनुमान जन्मोत्सव के अवसर पर पांच दिवसीय धार्मिक आयोजन और सवामणी का आयोजन किया जाता है.

सफलता और विजय की कामना लेकर पहुंचते हैं श्रद्धालुमौसम के अनुसार भी यहां विशेष भोग लगाने की परंपरा है. गर्मियों में आमरस, ठंडाई, दही की लस्सी और रायते का भोग लगाया जाता है, जबकि सर्दियों में बाजरे का खीचड़ा और गर्म दूध अर्पित किया जाता है. मकर संक्रांति, होली, रक्षाबंधन, दीपावली, निर्जला एकादशी, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे प्रमुख पर्वों पर मंदिर को आकर्षक झांकियों से सजाया जाता है. आज भी हजारों श्रद्धालु इस सिद्धपीठ में पहुंचकर अपने कार्यों में सफलता, विजय और मनोकामनाएं पूर्ण होने की प्रार्थना करते हैं.

About the AuthorAnand Pandey

आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें

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Sikar,Sikar,Rajasthan

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