Guava Farming Guide & Varieties | अमरूद की खेती और उन्नत तकनीक

Agriculture News: अमरूद एक बेहद पौष्टिक और विटामिन-सी से भरपूर फल है, जिसकी बाजार में सालभर भारी मांग बनी रहती है. इसे न केवल ताजा फल के रूप में खाया जाता है, बल्कि जैम, जेली, जूस और कई अन्य प्रसंस्कृत उत्पाद बनाने में भी इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है. कम लागत, बेहतर बाजार मूल्य और सालाना अच्छी कमाई के कारण अमरूद की खेती किसानों के लिए बेहद मुनाफे का सौदा साबित हो रही है. यदि किसान सही मिट्टी का चुनाव, उन्नत किस्मों का चयन, संतुलित पोषण, समय पर सिंचाई और सही कीट प्रबंधन अपनाएं तो प्रति हेक्टेयर लाखों रुपये का मुनाफा कमा सकते हैं.
एग्रीकल्चर एक्सपर्ट बजरंग सिंह के अनुसार, अमरूद की खेती के लिए गहरी और उपजाऊ बलुई दोमट मिट्टी सबसे उत्तम मानी जाती है. हालांकि यह फसल अम्लीय और क्षारीय दोनों तरह की जमीनों में उगाई जा सकती है, लेकिन यदि मिट्टी का पीएच (pH) मान 7.5 से अधिक हो, तो पौधों में उक्ठा (विल्ट) रोग का खतरा काफी बढ़ जाता है. इसलिए पौधरोपण से पहले खेत की मिट्टी की जांच कराना बेहद जरूरी है. पौधरोपण के लिए 90×90×90 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे तैयार कर उनमें गोबर की खाद, सुपर फॉस्फेट, क्यूनालफॉस चूर्ण और उपजाऊ मिट्टी का मिश्रण भरकर पौधे लगाएं. अमरूद के पौधों को बारिश के मौसम (वर्षा ऋतु) में लगाना सबसे उपयुक्त होता है, क्योंकि इस दौरान पौधों का विकास तेजी से होता है. ध्यान रखें कि पौधों और कतारों के बीच लगभग 6 मीटर की दूरी जरूर रखें.
बेहतर पैदावार देने वाली उन्नत किस्मेंअमरूद की व्यावसायिक खेती से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए उन्नत किस्मों का ही चयन करना चाहिए. किसान अपने खेतों में इलाहाबाद सफेदा, लखनऊ-49 (सरदार), ललित, श्वेता, एमपीयूएटीएस-1 (MPUATS-1) और एमपीयूएटीएस-2 (MPUATS-2) जैसी अधिक फल देने वाली किस्मों के पौधे लगा सकते हैं. इन किस्मों के फल गुणवत्ता में बेहतरीन होते हैं और बाजार में इनकी अच्छी कीमत मिलती है. विशेष रूप से सर्दी के मौसम की फसल गुणवत्ता और मंडी भाव दोनों ही दृष्टि से अधिक फायदेमंद होती है.
संतुलित खाद, उर्वरक और सिंचाई प्रबंधनपौधे की उम्र के हिसाब से खाद और उर्वरक की मात्रा तय की जाती है. 1 से 3 वर्ष के छोटे पौधों के लिए 15 किलोग्राम गोबर की खाद, 150 ग्राम यूरिया, 300 ग्राम सुपर फॉस्फेट और 300 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति पौधा देना चाहिए. वहीं 4 से 6 वर्ष के बड़े पौधों में 25 किलोग्राम गोबर की खाद, 500 ग्राम यूरिया, 1200 ग्राम सुपर फॉस्फेट और 700 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश का प्रयोग किया जाता है. सिंचाई की बात करें तो गर्मियों में 7 से 10 दिन और सर्दियों में 15 से 20 दिन के अंतराल पर पानी देना चाहिए. ड्रिप सिंचाई तकनीक (टपक सिंचाई) अपनाने से पानी की बचत होती है और पौधों की जड़ों को लगातार आवश्यक नमी मिलती रहती है. फल तुड़ाई के बाद प्रतिवर्ष छंटाई (प्रूनिंग) करने से नई शाखाएं निकलती हैं, जिनसे फलत बढ़ती है.
बेंडिंग तकनीक और कीट-रोग नियंत्रणअगस्त और सितंबर महीने में अमरूद की शाखाओं को मोड़ने (बेंडिंग तकनीक) से पौधों में ज्यादा फूल आते हैं और नवंबर-दिसंबर में मिलने वाले फलों का आकार और गुणवत्ता बेहतर हो जाती है. अमरूद की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान फल मक्खी और फफूंदजनित रोगों से होता है. फल मक्खी से बचाव के लिए मैलाथियॉन 50 ईसी या मिथाइल डिमेटॉन की 1 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें. जैविक नियंत्रण के लिए ट्राइकोडर्मा विरिडी या एस्परजिलस नाइजर का इस्तेमाल किया जा सकता है. वहीं यदि पत्तियों में जस्ते (जिंक) की कमी के लक्षण दिखें, तो 6 ग्राम जिंक सल्फेट और 4 ग्राम बुझा हुआ चूना प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से त्वरित लाभ मिलता है.



