Agriculture News: गुलाबी सुंडी और बढ़ती लागत ने छीनी ‘सफेद सोना’ की चमक, नागौर में आधी रह गई कपास की बुवाई

Nagaur: राजस्थान के नागौर जिले में कभी किसानों की पहली पसंद मानी जाने वाली नकदी फसल ‘कपास’ अब धीरे-धीरे खेतों से गायब होती नजर आ रही है. सफेद सोना कहलाने वाली कपास अब किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है. उत्पादन में लगातार आ रही गिरावट, खेती की बढ़ती लागत, गुलाबी सुंडी का बढ़ता प्रकोप और बाजार में माकूल दाम न मिलने की वजह से किसानों का रुझान इससे मोहभंग की ओर बढ़ रहा है. इस खरीफ सीजन में कृषि विभाग ने जिले में 62 हजार हेक्टेयर में कपास बुवाई का लक्ष्य रखा था, लेकिन इसके मुकाबले महज 32,150 हेक्टेयर क्षेत्र में ही बुवाई हो सकी है, जो कि तय लक्ष्य का लगभग आधा है.
नागौर की बलुई दोमट मिट्टी में एक समय कपास की शानदार पैदावार होती थी, लेकिन कई सालों तक लगातार एक ही फसल लेने से मिट्टी की उत्पादकता प्रभावित हुई है. कृषि विशेषज्ञ बजरंग सिंह के अनुसार, कपास मूल रूप से काली मिट्टी की फसल है, जिसके चलते बलुई दोमट क्षेत्र में लगातार खेती करने से उत्पादन घटता गया. इसी का नतीजा है कि किसान अब कपास छोड़ दूसरी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं. इस बार जिले में ग्वार की फसल ने कपास की जगह ली है और 1,24,250 हेक्टेयर क्षेत्र में ग्वार की बुवाई दर्ज की गई है.
लागत निकालने के बाद लाभ सीमित, 7 सालों में निचले स्तर पर पहुंची बुवाईवर्तमान में कपास का औसत उत्पादन केवल डेढ़ से दो क्विंटल प्रति बीघा तक सीमित रह गया है. 10 बीघा में बुवाई करने पर किसान को लगभग 1.20 लाख रुपये की कुल आय होती है, लेकिन बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई और मजदूरी की लागत निकालने के बाद मुनाफा बेहद नगण्य बचता है. यदि पिछले सात वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2020 में 56,143 हेक्टेयर, 2021 में 58,457 हेक्टेयर, 2022 में 74,557 हेक्टेयर, 2023 में 48,500 हेक्टेयर, 2024 में 59,302 हेक्टेयर, 2025 में 37,250 हेक्टेयर और वर्ष 2026 में घटकर यह बुवाई केवल 32,150 हेक्टेयर रह गई है.
बीटी कॉटन पर भी गुलाबी सुंडी का हमला, डेगाना और मेड़ता में बदला रुखशुरुआती वर्षों में बीटी कॉटन के आने से गुलाबी सुंडी का असर कम हुआ था, लेकिन अब बीटी बीजों पर भी इस कीट का प्रकोप बढ़ गया है, जिससे कीटनाशकों पर खर्च बढ़ रहा है. हालांकि कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) लगभग 7,710 रुपये प्रति क्विंटल है, लेकिन कम पैदावार के कारण किसानों को इसका उचित लाभ नहीं मिल पा रहा है. यही वजह है कि जिले के प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों डेगाना और मेड़ता में भी किसान तेजी से वैकल्पिक फसलों की ओर शिफ्ट हो रहे हैं.



