जोधपुर में 2 और प्रसूताओं की मौत ने डराया, जानें मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने क्या दिए तर्क?

जोधपुर. जोधपुर में दो और प्रसूताओं की उपचार के दौरान मौत हो गई. इनमें एक महिला फलौदी की रहने वाली थी. उसे हाई रिस्क प्रेग्नेंसी के चलते जोधपुर के उम्मेद अस्पताल में भर्ती करवाया गया था. वहीं दूसरी महिला सरोज नागौर की रहने वाली थी. उसे गंभीर हालत में एमडीएम अस्पताल लाया गया था. दोनों मामलों के बाद चिकित्सा व्यवस्था और मातृ मृत्यु दर को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हुए हैं. प्रसूताओं की मौत पर जोधपुर के एसएन मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. बीएस जोधा ने मीडिया से बातचीत में कहा कि निजी और सरकारी अस्पताल मिलकर काम करें तो गंभीर गर्भवती महिलाओं को समय पर उपचार देकर मातृ मृत्यु के मामलों को और कम किया जा सकता है.
मातृ मृत्यु के कारणों पर बात करते हुए डॉ. जोधा ने कहा कि गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच के बावजूद कई बार परिवार की ओर से गंभीर लक्षणों को नजरअंदाज कर दिया जाता है. सामाजिक भ्रांतियां, जागरूकता की कमी, अशिक्षा और आर्थिक परिस्थितियां भी समय पर उपचार में बाधा बनती है. उन्होंने लोगों से अपील की कि गर्भवती महिला को किसी भी प्रकार की परेशानी होने पर अस्पताल पहुंचाने में देरी न करें. सरकारी अस्पतालों में दवाइयां, जांच, परिवहन और उपचार जैसी सुविधाएं निशुल्क उपलब्ध हैं. समय पर अस्पताल पहुंचने पर चिकित्सकों को मरीज की जान बचाने का अधिक अवसर मिलता है.
यदि कोई मरीज गंभीर होता है तो सरकारी अस्पताल उसे लेने के लिए तैयार रहता है
जोधा ने कहा कि निजी अस्पतालों को भयमुक्त होकर काम करना चाहिए. यदि कोई मरीज गंभीर होता है तो सरकारी अस्पताल उसे लेने के लिए तैयार है. मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में क्षमता से अधिक मरीज होने के बावजूद गंभीर मरीजों को भर्ती कर उपचार उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है. जोधा के मुताबिक उम्मेद अस्पताल में भर्ती फलोदी निवासी प्रसूता ने ऑपरेशन के जरिए शिशु को जन्म दिया था. इसके बाद गुरुवार सुबह अचानक उसकी तबीयत बिगड़ी और उसे सांस लेने में परेशानी होने लगी. चिकित्सकों ने तत्काल उसे वेंटिलेटर पर लिया और आईसीयू में शिफ्ट कर उपचार शुरू किया. लेकिन इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. वहीं नागौर निवासी सरोज को गर्भ में शिशु की मृत्यु और गंभीर रक्तस्राव की स्थिति में एमडीएम अस्पताल लाया गया था. चिकित्सकों ने उपचार शुरू किया. लेकिन उसकी भी जान नहीं बचाई जा सकी.
राजस्थान के करीब आठ जिलों से गंभीर मरीज रेफर होकर यहां आते हैंडॉ. बीएस जोधा ने कहा कि उम्मेद अस्पताल पश्चिमी राजस्थान का मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए प्रमुख केंद्र है. यहां राजस्थान के करीब आठ जिलों से गंभीर मरीज रेफर होकर आते हैं. इसके अलावा करीब 80 निजी अस्पतालों से भी गंभीर मामलों को यहां भेजा जाता है. पिछले दिनों भी गंभीर अवस्था में कई प्रसूताएं अस्पताल पहुंचीं. चिकित्सकों ने उनका सही निदान कर उन्हें बचाने का पूरा प्रयास किया. लेकिन कुछ मामलों में जटिलताएं इतनी गंभीर होती हैं कि मरीज को बचाना मुश्किल हो जाता है.
प्रमुख कारणों में रक्तस्राव, हाई ब्लड प्रेशर और संक्रमण शामिल है
उन्होंने कहा कि मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में रक्तस्राव, हाई ब्लड प्रेशर और संक्रमण शामिल है. उनके अनुसार भारत में मातृ मृत्यु के मामलों में करीब 20 से 24 प्रतिशत मौतें रक्तस्राव के कारण और करीब 18 से 20 प्रतिशत हाई ब्लड प्रेशर के कारण होती हैं. संक्रमण भी मातृ मृत्यु का एक प्रमुख कारण है. डॉ. जोधा ने बताया कि एसएन मेडिकल कॉलेज से जुड़े उम्मेद अस्पताल और जनाना अस्पताल में सालाना करीब 32 से 33 हजार डिलीवरी होती है. इनमें बड़ी संख्या गंभीर और रेफरल मामलों की होती है. जनवरी से जुलाई तक जोधपुर में करीब 10 से 12 मातृ मृत्यु के मामले सामने आए हैं. इनमें अधिकांश मरीज गंभीर हालत में दूसरे अस्पतालों से रेफर होकर पहुंचे थे.
हाई रिस्क प्रेग्नेंसी को लेकर विशेष अभियान चलाया जा रहा हैउन्होंने कहा कि सरकार और चिकित्सा विभाग की ओर से हाई रिस्क प्रेग्नेंसी को लेकर विशेष अभियान चलाया जा रहा है. 1 से 15 अगस्त तक हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिलाओं की पहचान, मैपिंग और फॉलोअप किया जा रहा है. संबंधित स्वास्थ्यकर्मियों को इन महिलाओं की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है. जरूरत पड़ने पर 104 और 108 जैसी सेवाओं के माध्यम से समय पर अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था भी की जा रही है.
गंभीर स्थिति बनने पर मरीज को रेफर करने में देरी न करेंनिजी अस्पतालों से गंभीर मरीजों के देर से सरकारी अस्पताल पहुंचने के सवाल पर डॉ. जोधा ने कहा कि निजी अस्पतालों की अपनी सीमाएं होती हैं. कई छोटे अस्पतालों में सीमित संख्या में विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध होते हैं. जबकि सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में कई यूनिट और विशेषज्ञों की पूरी टीम 24 घंटे उपलब्ध रहती है. उन्होंने निजी अस्पतालों के चिकित्सकों से अपील की कि गंभीर स्थिति बनने पर मरीज को रेफर करने में देरी न करें और सरकारी अस्पताल से समय रहते संपर्क करें. उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर वीडियो कॉल के जरिए भी चिकित्सकीय सलाह ली जा सकती है. डॉ. जोधा ने कहा कि निजी अस्पतालों को भयमुक्त होकर काम करना चाहिए. यदि कोई मरीज गंभीर होता है तो सरकारी अस्पताल उसे लेने के लिए तैयार हैं. मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में क्षमता से अधिक मरीज होने के बावजूद गंभीर मरीजों को भर्ती कर उपचार उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है.



