भरतपुर से गायब होती ‘हाथ की चक्की’, जो सेहत और संस्कृति दोनों संवारती थी

Last Updated:August 08, 2026, 09:33 IST
Traditional Stone Mill: भरतपुर जिले में कभी हर घर की पहचान रही पत्थर से बनी पारंपरिक हाथ की चक्की अब आधुनिकता और इलेक्ट्रिक आटा मशीनों के कारण विलुप्त होने की कगार पर है. पहले गांवों में महिलाएं इस चक्की से अनाज पीसती थीं, जिससे आटा स्वादिष्ट, पौष्टिक रहता था और शारीरिक व्यायाम भी हो जाता था. अब शहरी क्षेत्रों में यह चक्की पूरी तरह गायब हो चुकी है और गांवों में महज एक सजावटी वस्तु या याद बनकर रह गई है. बुजुर्गों ने इस अनमोल परंपरा को सहेजने की बात कही है.
भरतपुर जिले में एक समय ऐसा था, जब लगभग हर घर में पत्थर से बनी हाथ की चक्की आसानी से देखने को मिल जाती थी. यह चक्की सिर्फ अनाज पीसने का घरेलू साधन नहीं थी, बल्कि ग्रामीण जीवन की पहचान और सदियों पुरानी परंपरा का अहम हिस्सा हुआ करती थी. घर की महिलाएं इसी चक्की से गेहूं, बाजरा, ज्वार और अन्य अनाज पीसा करती थीं. लेकिन बदलते समय, आधुनिक तकनीक और बिजली से चलने वाली मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण हाथ की यह पारंपरिक चक्की अब धीरे-धीरे लोगों के घरों से गायब होती जा रही है और विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है.
पहले के समय में गांवों के लगभग हर घर में महिलाएं सुबह-शाम हाथ की चक्की से गेहूं, चना, मक्का और अन्य अनाज पीसा करती थीं. यह पूरी प्रक्रिया हाथ से की जाती थी, जिसमें मेहनत तो काफी लगती थी, लेकिन इससे अनाज का स्वाद और पौष्टिकता काफी हद तक बरकरार रहती थी. पत्थर से बनी इस पारंपरिक चक्की में दो गोल पाट होते थे. इनके बीच अनाज डाला जाता था और ऊपरी पाट को हाथ से घुमाया जाता था. धीरे-धीरे अनाज पिसकर ताजा आटे में बदल जाता था. यही वजह थी कि उस दौर में हाथ से पिसे आटे को स्वाद और गुणवत्ता के लिहाज से खास माना जाता था.
समय के साथ लोगों की जीवनशैली में बड़ा बदलाव आया और बाजार में इलेक्ट्रिक आटा चक्कियों का चलन बढ़ने लगा. इन आधुनिक मशीनों ने अनाज पीसने के काम को आसान और तेज बना दिया. अब कुछ ही मिनटों में बड़ी मात्रा में अनाज पीसा जा सकता है, जिससे लोगों का समय और मेहनत दोनों बचने लगे. सुविधा और तेज काम की वजह से लोगों ने धीरे-धीरे पारंपरिक हाथ की चक्की का इस्तेमाल कम कर दिया. यही कारण है कि कभी हर घर की पहचान रही पत्थर की हाथ चक्की अब धीरे-धीरे लोगों के घरों और ग्रामीण जीवन से गायब होती चली गई.
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आज स्थिति यह है कि भरतपुर के शहरी इलाकों में हाथ की पत्थर वाली चक्कियां लगभग पूरी तरह गायब हो चुकी हैं. वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में भी इनका इस्तेमाल अब बेहद कम रह गया है. कई घरों में कभी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा रही ये चक्कियां अब सिर्फ पुरानी यादों या सजावट की वस्तु बनकर रह गई हैं. नई पीढ़ी के अधिकांश लोग तो इस पारंपरिक उपकरण के इस्तेमाल और उससे जुड़ी प्रक्रिया के बारे में भी ज्यादा नहीं जानते. बदलती जीवनशैली और आधुनिक मशीनों के बढ़ते चलन के बीच हाथ की चक्की अब धीरे-धीरे इतिहास का हिस्सा बनती जा रही है.
स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि हाथ की चक्की से पिसा हुआ आटा स्वादिष्ट होने के साथ-साथ सेहत के लिए भी बेहतर माना जाता था. चक्की चलाने की प्रक्रिया में शारीरिक मेहनत होती थी, जो एक तरह के व्यायाम का काम करती थी और शरीर को सक्रिय रखने में मदद करती थी. लेकिन आधुनिक सुविधाओं और मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण यह पारंपरिक परंपरा धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही है. बुजुर्गों का मानना है कि यदि ऐसी पारंपरिक चीजों और उनसे जुड़ी विरासत को समय रहते सहेजकर नहीं रखा गया, तो आने वाली पीढ़ियां इन्हें सिर्फ तस्वीरों और कहानियों में ही देख पाएंगी और ये पूरी तरह इतिहास का हिस्सा बन जाएंगी.
राजस्थान और भरतपुर की ग्रामीण संस्कृति की पहचान रही हाथ की चक्की आज आधुनिकता की तेज रफ्तार में पीछे छूटती नजर आ रही है. कभी घर-घर में इस्तेमाल होने वाली यह पारंपरिक पत्थर की चक्की अब बहुत कम घरों में देखने को मिलती है. समय के साथ इसका उपयोग लगभग खत्म होता जा रहा है और यह अनमोल विरासत अब सिर्फ पुरानी परंपराओं, कहानियों और लोगों की यादों तक सीमित रह गई है. जरूरत है कि ऐसी पारंपरिक धरोहरों को सहेजकर रखा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी राजस्थान की ग्रामीण संस्कृति और पुरानी जीवनशैली से जुड़ी इस विरासत को जान और समझ सकें.
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August 08, 2026, 09:33 IST



