राजस्थान सरकार के वन मंत्री संजय शर्मा के धरने से उठे सवाल, किसका ‘भरोसा’ टूटा?

Last Updated:August 13, 2026, 18:17 IST
Forest Minister Sanjay Sharma Case : राजस्थान के अलवर में वन मंत्री संजय शर्मा की ओर से अपने ही जिले के अधिकारियों के खिलाफ दिए गए धरने ने सूबे में एक नई बहस छेड़ दी है. यह बहस है ‘भरोसे’ और ‘विश्वास’ की. आखिर इस घटनाक्रम से आम पब्लिक का अपने जनप्रतिनिधि के प्रति भरोसा ‘बढ़ा’ या ‘टूटा’ है. शासन और प्रशासन के बीच आखिरकार ऐसी नौबत क्यों आई? वन मंत्री संजय शर्मा ने अलवर नगर निगम में धरना दिया था.
जयपुर. राजस्थान में जल्द ही शहरी और ग्रामीण इलाकों में निकायों तथा पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव होने हैं. लेकिन उससे पहले ही भजनलाल सरकार के वन मंत्री संजय शर्मा की ओर से अपनी ही सरकार के खिलाफ दिए धरने ने सूबे की सियासत में बवाल मचा दिया है. कांग्रेस ने इस मुद्दे को लपकते हुए उसे भुनाना शुरू कर दिया है. मंत्री शर्मा के इस कदम ने सरकार को मुश्किल में डाल दिया है. पब्लिक समझ नहीं पा रही है कि वह शर्मा की तारीफ करे या प्रशासन को सही माने. विश्लेषक इसे ‘सिस्टम’ में खामी मान रहे हैं जिसका खामियाजा सबसे ज्यादा सरकार को ही भुगतना पड़ेगा.
राजनीति के जानकार अलवर के नगर निगम में सफाई कर्मचारियों के नियुक्ति पत्र को लेकर उठे इस सियासी बंवडर के पीछे एक नहीं बल्कि कई कारण गिनाते हैं. वे इसे सिस्टम की खामी के साथ ही शासन और प्रशासन के बीच ‘समन्वय’ का अभाव में मानते हैं. लेकिन मूल सवाल यह है कि आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों कि मंत्री को अपनी ही सरकार में ‘ब्यूरोक्रेसी’ (जिला कलक्टर) के खिलाफ मैदान में उतरना पड़ा. हालांकि यह भी एक संयोग ही है कि वन मंत्री संजय शर्मा पर पहले भी दो-तीन बार ब्यूरोक्रेसी पर सवाल उठा चुके हैं.
शर्मा पहले भी ब्यूराक्रेसी पर सवाल उठा चुके हैंसीकर के प्रभारी मंत्री रहते हुए संजय शर्मा जनसेवा शिविर में वहां के कलक्टर से नाराज हो चुके हैं. यहां तक कि उन्होंने डीएम पर गड़बड़ी करने वाले अधिकारियों को बचाने का आरोप भी लगा दिया था. लेकिन वह मामला दूसरे जिले का था. जबकि ताजा मामला तो उनके ही गृह जिले अलवर का ही है. संजय शर्मा अलवर शहर से ही विधायक हैं. उससे पहले वे अपने ही वन विभाग के अधिकारियों पर मॉनिटरिंग को लेकर सवाल उठा चुके हैं. अब अपने ही जिले की डीएम को आरोपों के कटघरे में खड़ा कर चुके हैं. तीनों ही बार शर्मा ब्यूरोक्रेसी के कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं.
मंत्रियों की पहले भी अधिकारियों से अनबन की खबरें आती रही हैंहालांकि यह कोई पहली बार नहीं है कि जब कोई मंत्री ब्यूरोक्रेसी से नाराज हुआ हो. इससे पहले कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार के समय भी कई मंत्रियों की जिला कलक्टर ही नहीं बल्कि विभागों के शासन सचिवों तक से ‘अनबन’ की खबरें आती रही हैं. यह बात दीगर है कि तब हालात मंत्री के धरने प्रदर्शन तक नहीं पहुंचे थे. उन मसलों को शासन सचिवालय के गलियारों में ही अधिकारी को कुर्सी से हटाकर बर्फ वाली जगह लगाने या फिर ट्रांसफर पॉलिसी के जरिये निपटा लिया गया था. वे खबरों की सुर्खियां जरुर बने लेकिन सरेराह इस तरह का सियासी ड्रामा नहीं हुआ. लेकिन संजय शर्मा के मामले ने सरकार और प्रशासन के ‘को-ऑर्डिनेशन’ की कलई सरेआम खोल दी है.
ब्यूरोक्रेसी बेलगाम है या फिर कारण कुछ और हैहालांकि राजनीति के जानकारों कहना है कि पब्लिक के प्वाइंट ऑफ व्यू से शर्मा का कदम सही है कि उन्होंने अफसरशाही के खिलाफ आमजन के साथ मिलकर आवाज बुलंद कर उसे भरोसा दिलाने की कोशिश की है. लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि इसका मतलब साफ है कि बीजेपी राज में ब्यूरोक्रेसी ‘बेलगाम’ है. सरकार का उस पर कोई अंकुश नहीं है. बस यही बात अब सोशल मीडिया और अन्य जगहों पर चर्चा का विषय बनी हुई है. क्योंकि विपक्षी पार्टी, निर्दलीय या फिर छोटे दलों के विधायकों से अधिकारियों की तूं-तूं, मैं-मैं तो आए दिन होती रहती है. लेकिन सत्ता पक्ष के मंत्री के साथ अधिकारियों के इस तरह के रवैये का मामला पहला ही सामने आया है. इससे आम पब्लिक में सत्तारुढ़ जनप्रतिनिधियों के प्रति ‘विश्वास’ कम बढ़ता है और ‘भरोसा’ ज्यादा टूटता है. वो यह सोचने के लिए मजबूर हो जाता है कि जब शासन प्रशासन मंत्री की ही नहीं सुन रहा तो उसकी तो बिसात की क्या है?
जब हालात ऐसे हो जाते हैं भरोसा टूट जाता हैसरकार का मतलब उसे आमजन के उस भरोसे को कायम रखना है जिसके लिए उसने उसे चुना है. आम आदमी को लगना चाहिए कि प्रशासन अगर उसकी नहीं सुनेगा तो जनप्रतिनिधि की तो सुनेगा ही. लेकिन जब हालात ऐसे हो जाते हैं तो वह उसका भरोसा टूटना लाजिमी है. हो सकता है कि इस विवाद की जड़ में और भी कई पेंच हो जो अभी तक सामने नहीं आए हैं. हो सकता है धीरे-धीरे सामने आ जाए. लिहाजा दोनों पक्षों में सीधे किसी एक को सीधे दोषी नहीं ठहराया जा सकता. क्योंकि यह जांच का विषय है कि आखिरकार गड़बड़ कहां है ‘शासन’ में या ‘प्रशासन’ में.
शासन जनहित में प्रशासन को सही ‘दिशा’ देबहरहाल जरुरत इस बात की है कि शासन जनहित में प्रशासन को सही ‘दिशा’ दे और प्रशासन उस दिशा में काम करते हुए पब्लिक को ‘राहत’ पहुंचाए. वहीं स्थित पब्लिक और सरकार के लिए ‘आदर्श’ हो सकती है. अन्यथा दोनों से तीसरे पक्ष ‘पब्लिक’ का भरोसा टूटते देर नहीं लगती. अब यह सरकार और प्रशासन के मुखियाओं की जिम्मेदारी है कि वे देखे कि आखिर ऐसे हालात पैदा क्यों हो रहे हैं? इन्हें सुधारने के लिए भरोसे वाले कदम उठाए जाने चाहिए. अन्यथा बिखरे रायते को और बिखरने वालों की तो कमी है नहीं.
About the AuthorSandeep Rathore
संदीप राठौड़ वर्तमान में न्यूज18 इंडिया में क्लस्टर हेड राजस्थान (डिजिटल) पद पर कार्यरत हैं। राजनीति, क्राइम और सामाजिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग में रूचि रखने वाले संदीप को पत्रकारिता का ढाई दशक से ज्यादा का अनुभव…
और पढ़ेंLocation :
Jaipur,Jaipur,Rajasthan
First Published :
August 13, 2026, 18:10 IST



