क्या है शहरी सरकार बनने का ट्रेंड? तीन दशक के आंकड़ों में छिपा है बड़ा सियासी गणित

जयपुर. राजस्थान में नगर निकाय चुनाव के दूसरे चरण के लिए आज 147 निकायों में मतदान हो रहा है. इनमें जयपुर, जोधपुर, कोटा, अजमेर, उदयपुर और पाली जैसे बड़े शहरी निकाय भी शामिल हैं. ऐसे में चुनावी नतीजों को लेकर सियासी दलों के बीच जोर आजमाइश जारी है. लेकिन राजस्थान की शहरी राजनीति का करीब तीन दशक का रिकॉर्ड एक दिलचस्प तस्वीर पेश करता है. 1994 से अब तक के चुनावी ट्रेंड को देखें तो करीब 80 फीसदी मौकों पर जिस दल की प्रदेश में सरकार रही, उसी दल का मेयर या बोर्ड पर दबदबा देखने को मिला. यानी विधानसभा की सत्ता और शहर की सरकार के बीच एक मजबूत राजनीतिक कनेक्शन दिखाई देता है. हालांकि यह ट्रेंड हर चुनाव में पूरी तरह कायम नहीं रहा.
विधानसभा चुनाव में भले ही हर पांच साल में सत्ता बदलती रही हो, लेकिन शहरी सरकारों के मामले में तस्वीर अक्सर इसके उलट रही है. पिछले 32 साल के रिकॉर्ड पर नजर डालें तो प्रदेश में जिस दल की सरकार रही, अधिकांशत: उसी दल का मेयर या नगर निकाय बोर्ड पर दबदबा रहा. आज निकाय चुनाव के दूसरे चरण का मतदान जारी है. ऐसे में पुराने चुनावी रिकॉर्ड से यह सवाल अहम हो गया है कि क्या 2026 में भी शहरी सत्ता पर प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी का प्रभाव कायम रहेगा? हालांकि इस ट्रेंड के बीच कई बार स्थानीय समीकरणों, निर्दलीय पार्षदों, बगावत और क्रॉस वोटिंग ने भी नतीजों को प्रभावित किया है. खासकर जब मेयर का चुनाव पार्षदों के जरिए हुआ, तब पार्टी के भीतर का गणित कई बार सत्ता का पूरा समीकरण बदलता रहा.
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चुनाव से बदलती रही तस्वीर
राजस्थान में नगर निकायों की सियासत को समझने के लिए चुनाव की प्रणाली भी अहम है. कई चुनावों में मेयर का फैसला सीधे जनता के वोट से नहीं, बल्कि निर्वाचित पार्षदों के जरिए हुआ. ऐसे में वार्ड स्तर पर जीत हासिल करने के बाद मेयर चुनने की लड़ाई अलग राजनीतिक गणित में बदल जाती थी. यहां पार्षदों की नाराजगी, निर्दलीय पार्षदों का समर्थन और क्रॉस वोटिंग निर्णायक साबित होती रही. वहीं जिन मौकों पर मेयर का चुनाव प्रत्यक्ष तरीके से हुआ, वहां सत्तारूढ़ दल को अपनी लोकप्रियता और संगठनात्मक ताकत का सीधा फायदा मिलता दिखा. यही वजह है कि प्रदेश की सत्ता में बैठी पार्टी का शहरी निकायों पर प्रभाव लंबे समय तक बना रहा.
जयपुर में भी दिखा सत्ता के साथ बदलता समीकरण
राजस्थान की राजधानी जयपुर इस ट्रेंड का बड़ा उदाहरण है. 1994 से 2026 तक के रिकॉर्ड में जयपुर के अलग-अलग बोर्डों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता का बदलाव दिखाई देता है. 1994-99 के बोर्ड में मोहनलाल गुप्ता भाजपा से मेयर बने. इसके बाद 1999-2004 में निर्मला वर्मा भाजपा की मेयर रहीं. 2004-09 में डॉ. अशोक परनामी भाजपा से मेयर बने. इसके बाद 2009-14 में ज्योति खंडेलवाल कांग्रेस से मेयर बनीं. 2014-19 में भाजपा की अशोक लाहोटी और 2019 के बाद के दौर में भाजपा से जुड़े नेतृत्व का प्रभाव रहा. जयपुर में ग्रेटर और हेरिटेज नगर निगम बनने के बाद मेयर पद के समीकरण और भी दिलचस्प हुए. हेरिटेज में मुनेश गुर्जर और ग्रेटर में सौम्या गुर्जर जैसे नाम इस दौर की सियासी तस्वीर का हिस्सा रहे.
जोधपुर, कोटा और अजमेर में भी सत्ता का असर
जोधपुर नगर निगम के इतिहास में भी सत्ता के साथ बोर्ड के समीकरण बदलते दिखाई देते हैं. शुरुआती बोर्डों में भाजपा और कांग्रेस दोनों को मौका मिला, लेकिन कई चुनावों में प्रदेश की सत्ता में मौजूद दल का प्रभाव नगर निगम तक पहुंचा. कोटा में भी अलग-अलग दौर में भाजपा और कांग्रेस के मेयर रहे हैं. 2020-25 के बोर्ड में कोटा उत्तर और कोटा दक्षिण, दोनों नगर निगमों की राजनीति में अलग-अलग दलों और पार्षदों के समर्थन का गणित देखने को मिला. इससे साफ है कि अप्रत्यक्ष चुनाव की स्थिति में केवल पार्टी की सीट संख्या ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि मेयर बनाने के लिए पार्षदों का समर्थन जुटाना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है. अजमेर में भी 1994 से अब तक भाजपा और कांग्रेस के बीच मेयर पद का मुकाबला चलता रहा है. उदयपुर और बीकानेर जैसे शहरों के रिकॉर्ड में भी सत्ता परिवर्तन के साथ नगर निकाय की राजनीतिक तस्वीर बदलती रही है.
आखिर क्यों मजबूत रहता है सत्तारूढ़ दल का असर?
नगर निकाय चुनाव में सत्तारूढ़ दल को कई स्तरों पर फायदा मिलता है. सरकार में होने के कारण संगठनात्मक नेटवर्क मजबूत रहता है. स्थानीय नेताओं, विधायकों और मंत्रियों की सक्रियता बढ़ जाती है. इसके अलावा विकास कार्य, बजट और स्थानीय सुविधाओं से जुड़े मुद्दे भी चुनावी अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. हालांकि शहर की राजनीति पूरी तरह राज्य की सत्ता की कॉपी नहीं होती. वार्ड स्तर पर उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय मुद्दे, जातीय और सामाजिक समीकरण तथा बागी प्रत्याशी कई बार पूरे चुनाव का गणित बदल देते हैं.
अब 2026 में किस ओर जाएगा ट्रेंड?
नगर निकाय चुनाव 2026 के दूसरे चरण में राजस्थान के छह नगर निगमों समेत 147 निकायों में मतदान हो रहा है. ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन सा उम्मीदवार जीतेगा, बल्कि यह भी है कि क्या करीब 32 साल से दिखाई दे रहा सत्तारूढ़ दल के पक्ष में शहरी सत्ता का ट्रेंड एक बार फिर कायम रहेगा? इस चुनाव में पार्षदों के नतीजे आने के बाद मेयर और बोर्ड गठन की तस्वीर साफ होगी. अगर पिछले रिकॉर्ड जैसा परिणाम आता है तो शहरी सरकार में भी प्रदेश की मौजूदा सत्ता का प्रभाव दिखाई दे सकता है. लेकिन यदि स्थानीय समीकरण, निर्दलीय और बागी उम्मीदवार निर्णायक साबित हुए तो 2026 का चुनाव पुराने ट्रेंड से अलग नई राजनीतिक कहानी भी लिख सकता है.



