अमिताभ बच्चन को आइकॉनिक गाना देने वाला गीतकार, तंगहाली में ट्यूशन पढ़ाकर किया गुजारा, कलम के दम पर बनाई पहचान

Last Updated:September 13, 2026, 04:06 IST
बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन को सदाबहार गाना देने वाले महान गीतकार अनजान की कामयाबी के पीछे एक लंबा और दर्दनाक संघर्ष छिपा है. बनारस से मुंबई का सपना लेकर आए अनजान को जब शुरुआती दिनों में काम नहीं मिला, तो उन्होंने अपने गुजारे के लिए बच्चों को ट्यूशन तक पढ़ाया. तंगहाली और मुश्किल हालात भी उनकी कलम की ताकत को डिगा न सके. अपनी कड़ी मेहनत और बनारसी मिठास से पिरोए शब्दों के दम पर उन्होंने इंडस्ट्री में वो मुकाम हासिल किया, जिसकी गूंज आज भी बॉलीवुड संगीत में सुनाई देती है.
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गीतकार अनजान ने बनारस की गलियों से मुंबई पहुंचकर बनाई थी पहचान.
नई दिल्ली. दिग्गज गीतकार अनजान अपनी सादगी भरे गानों के लिए आज भी जाने जाते हैं. भले ही उनकी पैदाइश बनारस की थी, लेकिन उनके लिखे गीतों की गूंज पूरे देश में सुनाई दी. लालजी पांडेय के नाम से अपनी जीवन यात्रा शुरू करने वाले अनजान को मायानगरी मुंबई में पहचान और शोहरत कमाने के लिए लंबा और कठिन संघर्ष करना पड़ा था. आम बोलचाल के शब्दों को सदाबहार गानों में ढालने की कला में माहिर इस महान शायर ने अपनी कलम से बॉलीवुड संगीत को एक नया मुकाम दिया.
अनजान का जन्म 28 अक्टूबर 1930 को वाराणसी के पास ओदार गांव में पिता शिवनाथ पांडेय और माता इंदिरा देवी के घर हुआ था. बनारस में ही उन्होंने बीएचयू से एम. कॉम किया. बचपन से ही उन्हें कविता-शायरी का शौक था. पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं छपने लगीं और दोस्तों ने ही उन्हें ‘अनजान’ नाम दिया. बनारस के एक होटल में एक संगीत कार्यक्रम में उनकी मुलाकात प्रसिद्ध गायक मुकेश से हुई थी. मुकेश ने उनकी रचनाएं सुनकर कहा था कि आपको मुंबई में होना चाहिए. इसके बाद अनजान 1951 में मुंबई चले गए.
अनजान ने लोकल ट्रेनों में काटी रातें
शुरू में फिल्मों में काम न मिले के कारण वह खर्च चलाने के लिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते थे और रातें कभी लोकल ट्रेन में तो कभी अपार्टमेंट की सीढ़ियों के नीचे काटते थे. इस दौरान छोटी फिल्मों में काम मिला, लेकिन पहचान नहीं मिल पाई. अनजान को 1953 में प्रेमनाथ प्रोडक्शन की फिल्म प्रिजनर ऑफ गोलकुंडा ‘लहर ये डोले कोयल बोले’ और ‘शहीदों अमर है तुम्हारी कहानी’ लिखी थी.
20 साल के स्ट्रगल के बाद मिली सफलता
अंजान को सफलता मिलने में करीब 20 साल लग गए. इस दौरान वह छोटी फिल्मों और नॉन-फिल्म एल्बम्स के लिए लिखते थे. 1960 के दशक में जीएस कोहली के साथ ‘लंबे हाथ’ फिल्म का गाना ‘मत पूछ मेरा है मेरा कौन वतन’ लोकप्रिय हुआ. इसके बाद 1963 में पंडित रविशंकर के संगीत से सजी फिल्म ‘गोदान’ के गीत ‘चली आज गोरी पिया की नगरिया’ से प्रसिद्धि मिली. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
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