Ganesh Chaturthi: तोप के गोलों से भी नहीं हिले गणेशजी, पानी में नहीं गलती मिट्टी की मूर्ति, जानिए विजय गणेश का रहस्य

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बेहद खास है सीकर के विजय गणेश की कहानी, तोप के गोले के भी नहीं हिला पाए थे
Last Updated:September 13, 2026, 06:28 IST
Ganesh Chaturthi Special: सीकर के फतेहपुरी गेट स्थित विजय गणेश मंदिर की कहानी आस्था के साथ रियासतों के इतिहास और युद्ध से भी जुड़ी है. करीब 250 साल से ज्यादा पुरानी मानी जाने वाली गणेश प्रतिमा ने पाटोदा से कासली और फिर सीकर तक का सफर तय किया. वर्ष 1840 में सीकर के राव देवी सिंह और कासली के पूरणमल के बीच युद्ध हुआ. मान्यता है कि कासली पर सीकर की सेना के दागे तोप के गोले विघ्न हरण गणेशजी की प्रतिमा के प्रभाव से बेअसर हो गए. इसके बाद राव देवी सिंह ने रणभूमि में घुटनों के बल बैठकर गणेशजी की स्तुति की और विजय की प्रार्थना की. दोबारा युद्ध में सीकर की सेना विजयी हुई और कासली सीकर रियासत में शामिल हो गया. इसके बाद गणेश प्रतिमा सीकर लाई गई और फतेहपुरी गेट के पास स्थापित की गई. तभी से इन्हें विजय गणेश के नाम से जाना जाता है.
फतेहपुरी गेट स्थित विजय गणेश मंदिर सीकर की रियासत के इतिहास से जुड़ी ऐसी कहानी समेटे हुए है, जिसमें युद्ध, रियासतों की दुश्मनी और भगवान गणेश की चमत्कारी शक्ति का जिक्र मिलता है. यह मंदिर करीब 250 साल से ज्यादा पुराना है. यह मूर्ति पहले पाटोदा, फिर कासली और इसके बाद सीकर पहुंची. यही वजह है कि इसे तीन रियासतों का सफर तय करने वाली गणेश प्रतिमा भी कहा जाता है.
इस प्रतिमा की कहानी की सबसे दिलचस्प कड़ी वर्ष 1840 से जुड़ी है. उस समय सीकर में राव देवी सिंह का शासन था, जबकि कासली पर पूरणमल का दबदबा था. इतिहासकार महावीर पुरोहित ने बताया कि उस दौर में पूरणमल बेहद ताकतवर माना जाता था और उसने राव देवी सिंह के कई महारथियों को युद्ध में परास्त किया था. वह रोजाना नानी दरवाजे पर आकर भाला मारते हुए राव देवी सिंह को युद्ध की चुनौती देता था. आखिरकार दोनों रियासतों के बीच टकराव की स्थिति बन गई.
राव देवी सिंह ने पहले बातचीत से मामला सुलझाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी. उन्होंने पूरणमल के मौसेरे भाई और अलवर नरेश प्रताप सिंह को मध्यस्थता के लिए कहा. जब इससे भी समाधान नहीं निकला तो सीकर की सेना ने कासली पर हमला कर दिया. लेकिन यहां कहानी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसने इस मंदिर को आज तक रहस्य और आस्था से जोड़ रखा है. कासली पर दागे गए तोप के गोले अपना असर नहीं कर पाए. युद्धभूमि में मौजूद लोगों के लिए यह घटना किसी चमत्कार से कम नहीं थी.
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जब तोप के गोले बेअसर होने की वजह तलाश की गई तो कासली में स्थापित विघ्न हरण गणेशजी की मूर्ति की चर्चा सामने आई. मान्यता थी कि भगवान गणेश की यह प्रतिमा कासली को हर संकट और हमले से बचा रही थी. इसके बाद पंडितों की सलाह पर राव देवी सिंह ने रणभूमि में घुटनों के बल बैठकर गणेशजी की स्तुति की. उन्होंने विजय की प्रार्थना की और इसके बाद दोबारा युद्ध किया. इस बार सीकर की सेना को जीत मिली और कासली रियासत सीकर में शामिल हो गई.
युद्ध में विजय के बाद गणेशजी की वही प्रतिमा सीकर लाई गई और फतेहपुरी गेट के पास स्थापित की गई. तभी से इन्हें विजय गणेश के नाम से जाना जाने लगा. इस प्रतिमा से जुड़ी सबसे अनोखी मान्यता यह है कि मूर्ति मिट्टी की बनी होने के बावजूद पानी में नहीं गलती. बताया जाता है कि सीकर में स्थापना के बाद बरसात के दौरान मंदिर में पानी भरने पर मूर्ति कई बार पूरी तरह पानी में डूबी, लेकिन प्रतिमा को कोई नुकसान नहीं हुआ. हालांकि अब मूर्ति को पानी से सुरक्षित रखने के इंतजाम किए गए हैं.
विजय गणेशजी का सफर कासली से भी पहले का बताया जाता है. मान्यता के अनुसार यह प्रतिमा पहले पाटोदा में थी, जिसे पुराने समय में पाटकद्वव के नाम से जाना जाता था. यहां भी मूर्ति से जुड़े कई चमत्कारों की बातें सामने आती हैं. इसके बाद प्रतिमा कासली पहुंची और वहां विघ्न हरण गणेश के रूप में पूजी गई. पाटोदा से यह मूर्ति कब और कहां से आई, इसका प्रमाणित इतिहास उपलब्ध नहीं है. इसी वजह से इसके 250 साल से भी ज्यादा पुराना होने की बात कही जाती है.
गणेश चतुर्थी के मौके पर विजय गणेश मंदिर में आस्था का बड़ा आयोजन होने जा रहा है. 13 सितंबर को सिंजारा पर्व पर शाम 5:15 बजे भगवान गणेशजी को मेहंदी लगाई जाएगी और यह मेहंदी भक्तों में प्रसाद के रूप में बांटी जाएगी. शाम 7 बजे 56 भोग की आरती होगी. इसके अगले दिन गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को महाआरती, शोभायात्रा और रात में जागरण का आयोजन होगा.
First Published :
September 13, 2026, 06:28 IST



