जालोर के इन हनुमान मंदिरों की कहानी है बेहद अनोखी, कहीं धरती से प्रकट हुए बजरंगबली तो कहीं नहीं है छत

Last Updated:September 20, 2026, 15:12 IST
जालोर में हनुमान आस्था से जुड़े कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं, जिनकी मान्यताएं बेहद अनोखी हैं. कहीं हनुमानजी की प्रतिमा धरती से प्रकट होने की मान्यता है तो कहीं 800 साल पुराने मंदिर में आज भी प्रतिमा खुले आसमान के नीचे विराजमान है. 35 फीट ऊंची प्रतिमा, द्रविड़ शैली की वास्तुकला और महाभारत काल से जुड़ी मान्यताएं इन मंदिरों को खास बनाती हैं.
जालोर के आलासन गांव का हनुमान मंदिर करीब 300 साल पुरानी आस्था से जुड़ा है. मान्यता है कि भीषण अकाल के समय यहां जाल के पेड़ के नीचे धरती से हनुमान जी की मूर्ति प्रकट हुई. इसके बाद ग्रामीणों ने मिलकर यहां मंदिर का निर्माण करवाया. मंदिर परिसर में 35 फीट ऊंची हनुमान जी की प्रतिमा खास आकर्षण है. यहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मन्नत यहां पूरी होती है.
जालोर से करीब 10 किलोमीटर दूर कानीवाड़ा में पातालेश्वर हनुमानजी का प्राचीन मंदिर है, मान्यता है कि यहां हनुमानजी की प्रतिमा किसी ने स्थापित नहीं की, बल्कि वे स्वयं धरती से प्रकट हुए थे. पुजारी के अनुसार, इसी वजह से इन्हें पातालेश्वर हनुमानजी कहा जाता है और यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है. मंदिर करीब 800 साल पुराना बताया जाता है, लेकिन आज भी हनुमानजी के ऊपर छत नहीं है. मंगलवार और शनिवार को यहां विशेष श्रृंगार होता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु पैदल यात्रा करके भी दर्शन के लिए पहुंचते हैं.
जालोर से करीब 35 किलोमीटर दूर सायला कस्बे के मुख्य मार्ग पर बना यह हनुमान मंदिर दूर से ही लोगों का ध्यान खींच लेता है. मंदिर की खूबसूरत बनावट देखते ही नजर ठहर जाती है. तमिलनाडु के कारीगरों ने इसे द्रविड़ शैली में तैयार किया है. दक्षिण भारतीय वास्तुकला की झलक इसे बाकी मंदिरों से अलग पहचान देती है. मंदिर की खूबसूरती देखकर मैं भी इसकी तस्वीरें लेने से खुद को रोक नहीं सका.
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जालोर में बालाजी का यह मंदिर अपनी अलग आस्था और मान्यताओं के लिए लोगों का ध्यान खींचता है. स्थानीय लोगों के अनुसार यहां बालाजी महाराज जागृत स्वरूप में विराजमान हैं और भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं. खास बात यह है कि यहां बालाजी को किसी बंधन में नहीं, बल्कि स्वतंत्र और जागृत स्वरूप में पूजे जाने की मान्यता है.
जालोर से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर अपनी अनोखी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है. मंदिर का एक प्रवेश द्वार जालोर जिले की ओर, जबकि दूसरा सिरोही जिले की ओर खुलता है. मान्यता है कि महाभारत काल में पांडवों ने यहां कुछ समय ठहरकर विश्राम किया था. मंदिर के पास से गुजरने वाले निजी वाहन और रोडवेज बसें श्रद्धा से कुछ देर जरूर रुकती हैं.
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September 20, 2026, 15:12 IST



