IIT में नकल पकड़े जाने पर आत्महत्या! छोटी सी बात पर क्यों अंदर से हिल जाते हैं युवा? मानसिक बीमारी या अचानक आया इमोशनल तूफान

IIT Student Suicide Mental Illness: IIT में एडमिशन पाना सपने जैसा होता है. लेकिन इतने प्रतिष्ठित संस्थान में एडमिशन पाने के बाद भी कुछ स्टूडेंट आत्महत्या कर लें तो यह किसी को भी सन्न कर सकता है. यह दुख भरी बात तो है लेकिन कोई भी युवा जब सुसाइड करता है तो इसके पीछे समाज के मनोवैज्ञानिक पहलुओं की कमियों को उजागर कर देता है. एक समय के लिए लगता है कि आत्महत्या जैसे खौफनाक कदम उठाने के पीछे अचानक कोई इमोशनल तूफान आया होगा लेकिन विज्ञान और मनोविज्ञान के नजरिए से देखें तो यह लंबे समय से पनप रहे छोटे-छोटे विक्षोभ का लास्ट स्ट्रॉ होता है. यानी आखिरी तिनका. पढ़ाई का अत्यधिक दबाव, आगे बढ़ने की उत्कट इच्छाएं, सामाजिक शर्म जैसे कई कारक होते हैं जो किसी को आत्महत्या की ओर प्रवृत करता है. लेकिन पिछले कुछ सालों से जिस तरह से युवाओं में आत्महत्या की प्रवृति बढ़ी है वह हमारे समाज के लिए बेहद खतरे की घंटी है. आखिर क्यों आज का युवा किसी एक छोटी सी गलती या झटके को झेल नहीं पाता और अचानक ऐसा क्या होता है जो दिमाग पर पूरी तरह हावी हो जाता है? आइए फोर्टिस अस्पताल में साइकेट्रिक डिपार्टमेंट की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. नेहा अग्रवाल से समझते हैं इस आत्मघाती कदम के पीछे छिपे मनोवैज्ञानिक कारणों और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कड़वे सच को.
आत्मसम्मान का बिखरनाडॉ. नेहा अग्रवाल बताती हैं कि युवा उम्र में आत्महत्या के लिए के लिए कई चीजें एक साथ जिम्मेदार होती हैं. अधिकांश मामलों में सुसाइड करने वालों के दिमाग में लंबे समय से कुछ न कुछ जमा हो रहा होता है जो लास्ट में ट्रिगर प्वाइंट की तरह काम करता है. यह ठीक इसी तरह है जैसे किसी गिलास में धीरे-धीरे पानी भर रहा हो और एक दिन पानी पूरी तरह से भर कर बाहर निकल गया हो. कभी-कभी यह दिमाग में अचानक भी ख्याल आ सकता है. वास्तव में यंग एज में व्यक्ति अपनी पहचान और आत्मसम्मान को बहुत हद तक दूसरों के नजरिये से देखता है. वह यह देखता है कि हमसे आगे कितने लोग है. ऐसे में एकेडमिक सफलता को वह अपनी पहचान बना लेता है. फिर जब किसी सार्वजनिक स्थिति में जैसे कि परीक्षा में पकड़े जाना, नकल का आरोप लगना या शिक्षक द्वारा डांटना जैसी घटनाएं अचानक होती है तो वह इससे अपमान महसूस करने लगता है. ऐसे लोगों का दिमाग इसे साधारण असफलता नहीं मानता. उसे लगता है कि यह गंभीर सामाजिक और शर्मनाक स्थिति है. व्यक्ति को लगता है कि उसकी पूरी छवि, करियर और सम्मान एक झटके में खत्म हो गया है और फिर वह आत्महत्या जैसी प्रवृति की ओर बढ़ जाता है.
इम्पल्सिविटी और भावनात्मक बवंडरयुवा अवस्था में भावनाएं बहुत तीव्र होती हैं. अपमान या विफलता के क्षण में व्यक्ति टनल विजन का शिकार हो जाता है. इसमें दिमाग को भविष्य का कोई सकारात्मक पहलू दिखाई नहीं देता, केवल वर्तमान का असहनीय दर्द और शर्म ही दिखाई देती है. तर्कसंगत सोच बंद हो जाती है और केवल उस स्थिति से तुरंत भागने की इच्छा हावी हो जाती है.
परफेक्शनिज़्म और हार न स्वीकार पानाडॉ. नेहा अग्रवाल के मुताबिक भावनात्मक बंवडर सिर्फ कमजोर छात्र में ही नहीं होता बल्कि अच्छे और होनहार छात्र में भी यह प्रवृति पनप सकती है. ऐसे युवा पढ़ाई या करियर में हमेशा आगे रहे होते हैं. उनमें असफलता या गलती को स्वीकार करने की मानसिक क्षमता कम होने लगती है. उनके दिमाग में तर्क की भावना कमजोर रहती है. उनके लिए एक छोटी सी असफलता भी जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बन जाती है. वह हार स्वीकार करना पसंद नहीं कर पाता. फिर इस तरह की घटना होने के बाद वह आत्मघाती कदम उठाने लगता है.
कैटास्ट्रोफ़ाइजिंगयह एक मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति छोटी सी समस्या के सबसे बुरे परिणाम की कल्पना करने लगता है. जैसे अब मेरा सस्पेंशन हो जाएगा, करियर खत्म हो जाएगा, माता-पिता को क्या मुंह दिखाऊंगा, समाज क्या कहेगा. यह डर इतना बड़ा हो जाता है कि इंसान को जीवन खत्म करना ही एकमात्र समाधान लगता है.
बायलॉजी भी एक पहलू25 साल से कम उम्र के अधिकांश युवाओं के ब्रेन में प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स मैच्योर नहीं हो पाता है. मस्तिष्क का यह वही हिस्सा है जिससे तर्क, निर्णय लेने, आवेग नियंत्रण और दीर्घकालिक परिणामों को समझने के लिए ज़िम्मेदार होता है. यही कारण है कि युवाओं में अत्यधिक तनाव के क्षणों में तर्कसंगत सोच की जगह त्वरित और आवेगी फैसले लेने की संभावना बहुत अधिक होती है. इस तरह के मामलों में मस्तिष्क का एमिग्डाला हिस्सा भय और खतरों को पहचानता है. जब किसी व्यक्ति पर आरोप लगता है या भारी अपमान होता है, तो एमिग्डाला अत्यधिक सक्रिय हो जाता है. यह शरीर में तनाव वाले हार्मोन कॉर्टिसोल और एड्रेनालाईन का तूफ़ान ला देता है. इस स्थिति में दिमाग फाइट, फ्लाइट या फ्रीज़ मोड में चला जाता है, जहां इंसान ठंडे दिमाग से सोच ही नहीं पाता.वहीं अगर व्यक्ति लंबे समय से तनाव में है, अकेलेपन या दबाव में है, उसके दिमाग में सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर का स्तर पहले से ही गिरा हुआ होता है. सेरोटोनिन की कमी से व्यक्ति में आवेग नियंत्रण खत्म होने लगता है, जिससे एक ही झटके में आत्मघाती कदम उठाने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है.
इस तरह के केस से कैसे बचा जाएडॉ. नेहा अग्रवाल बताती हैं कि इस तरह के मामलों में बचपन से ही ध्यान देने की जरूरत है. इसलिए इसमें जागरुकता बहुत जरूरी है. सबसे पहले तो माता-पिता को बच्चों में इस तरह की प्रवृति को पहचानना चाहिए. उसे इस तरह के संस्कार देने चाहिए कि उसमें तर्कशीलता विकसित हो. बच्चा शुरुआत से तर्क करने में सक्षम हो. चीजों के कई पहलुओं के बारे में समझाना चाहिए. माता-पिता को बच्चों की हर ख्वाहिश को पूरी नहीं करनी चाहिए. अगर बच्चा आक्रामक हो रहा, शर्मीला हो रहा, दब्बूपन का शिकार बन रहा, दूसरे से बात करने में शर्मिदगी हो रही है, तो ऐसी स्थितियों में माता-पिता को संभल जाना चाहिए और उसे सही शिक्षा देनी चाहिए. कई बार माता-पिता को बच्चों की आक्रामकता अच्छी लगती है लेकिन बाद में जाकर यही चीजें नुकसान पहुंचाने लगती है. जब बच्चा टीनएज में आ जाए तो माता-पिता यह जरूर देखें कि बच्चा ज्यादा तनाव में तो नहीं है, वह अकेले रहने की कोशिश तो नहीं कर रहा है, वह डिप्रेशन में तो नहीं रह रहा है. ये सारी बातें सुसाइडल किट की तरह काम करती है.
खुलकर बातचीत करना ज्यादा बेहतर हैडॉ. नेहा अग्रवाल बताती है कि कोई भी आत्महत्या तब करता है जब उसके दिमाग में पहले से यह ख्याल आता है. इसलिए टीनएज से ही बच्चे से इस विषय पर बातचीत करनी चाहिए. कई बार आत्महत्या के बारे में सुनकर माता-पिता नाराज हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि अगर हम इस पर बच्चे से बात करेंगे तो सचमुच ऐसा करने लगेगा. इसके बाद माता-पिता फिर इस विषय पर बात ही नहीं करते जबकि ऐसे मामलों में तुरंत बातचीत करना चाहिए और उसकी समस्याओं को परखनी चाहिए. ऐसे मामलों में तुरंत साइकेट्रिस्ट के पास जाना चाहिए. इस विषय पर बच्चों से या जो भी इस तरह के ख्याल मन में लाते हैं, उनसे खुलकर बात करें. उन्हें समझाएं और उनके कारणों का पता लगाएं. अगर कोई व्यक्ति खुद को अलगाव महसूस करता है, हमेशा तनाव में रहता है, चिड़चिड़ा रहता है, किसी दूसरे की कोई बात सुनता नहीं है, इमोशनली बहुत कमजोर रहता है तो ऐसे लोगों को मदद करने की दरकार होती है. ऐसे लोगों को मनोचिकित्सक से दिखाने की जरूरत है.



