बोटॉक्स से पहले दिमाग की जांच! आखिर क्यों बदल रही हैं कॉस्मेटिक क्लीनिकों की गाइडलाइंस

करण जौहर के टॉक शो ‘कॉफी विद करण’ में नजर आईं अनुष्का शर्मा के लिप फिलर्स की चर्चा हो या फिर दीपिका पादुकोण का इस शो में ‘एक्ट्रेसेस की प्लास्टिक सर्जरीज’ को लेकर उड़ाया गया मजाक हो, एक्ट्रेसेस के ब्यूटी ट्रीटमेंट की चर्चा अक्सर होती है. अब तो बोटॉक्स, लिप फिलर्स और दूसरे कॉस्मेटिक इंजेक्शन सिर्फ फिल्मी सितारों तक सीमित नहीं हैं. शादी से पहले, किसी बड़े इवेंट से पहले या सोशल मीडिया पर बेहतर दिखने की चाह में लाखों लोग ऐसे ट्रीटमेंट्स का सहारा ले रहे हैं. लेकिन क्या ऐसे ट्रीटमेंट लेने वाले लोगों की पहले मेंटल हेल्थ जांचनी चाहिए? क्या खुद के चेहरे के हर फीचर को ‘परफेक्ट’ बनाने की इच्छा कहीं आपके दिमाग का कोई फितूर तो नहीं? ब्रिटेन की स्वास्थ्य संस्था NICE का कहना है कि कई लोगों को बोटॉक्स या फिलर्स देने से पहले उनके मानसिक स्वास्थ्य की भी जांच की जानी चाहिए.
आखिर डॉक्टरों को यह जरूरत क्यों महसूस हुई?
किसी व्यक्ति को लगता है कि उसकी नाक बहुत खराब दिखती है या होंठ उतने सुंदर नहीं हैं. वह बार-बार आईने में खुद को देखता है, तस्वीरें एडिट करता है और बार-बार कॉस्मेटिक प्रक्रियाएं करवाने की सोचता है. एक हद तक इसमें कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन समस्या यह है कि कई बार असली परेशानी चेहरे में नहीं, बल्कि व्यक्ति की सोच और सेल्फ-इमेज में होती है. विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ लोग बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर (BDD) या ऑब्सेसिव-कम्पल्सिव डिसऑर्डर (OCD) जैसी मेंटल हेल्थ कंडीशंस से जूझ रहे होते हैं. ऐसे लोग अपने शरीर या चेहरे की छोटी-सी बात को भी बहुत बड़ा दोष मान सकते हैं. Health and Me की रिपोर्ट में इस संस्था का कहना है कि कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट चाहने वाले लोगों में इन स्थितियों को पहचानना जरूरी है, क्योंकि कई बार इनके लक्षण नजरअंदाज हो जाते हैं.
कॉस्मेटिक प्रक्रिया से पहले यह समझना जरूरी है कि आप यह बदलाव क्यों चाहते हैं.
BDD क्या होता है?
BDD को आसान भाषा में समझें तो यह ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने शरीर या चेहरे की किसी बात को लेकर असामान्य रूप से परेशान रहता है, जबकि दूसरे लोगों को वह कमी दिखाई भी नहीं देती. जैसे किसी युवती को लग सकता है कि उसके होंठ बहुत पतले हैं. वह एक बार फिलर लगवाती है, फिर दोबारा और फिर तीसरी बार भी. लेकिन संतुष्टि नहीं मिलती. समस्या होंठों में नहीं, बल्कि उस मानसिक दबाव में हो सकती है जो उसे बार-बार बदलाव करने के लिए प्रेरित कर रहा है.
क्या कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट मानसिक तनाव बढ़ा भी सकते हैं?
ब्रिटेन की NHS लोगों को सलाह देती है कि किसी भी कॉस्मेटिक प्रक्रिया से पहले यह समझना जरूरी है कि आप यह बदलाव क्यों चाहते हैं. अगर आपकी उम्मीदें अनरीयल हैं या आप मानते हैं कि एक इंजेक्शन आपकी पूरी जिंदगी बदल देगा, तो प्रोसीजर के बाद भी आपको संतुष्टी नहीं मिलेगी. इसके अलावा कॉस्मेटिक प्रक्रियाएं कई बार मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं, खासकर जब परिणाम उम्मीदों के मुताबिक न हों.
सोशल मीडिया ने बढ़ाई मुसीबत
आज Instagram, Snapchat और AI फोटो फिल्टर ने सुंदरता की परिभाषा बदल दी है. कई लोग फिल्टर वाली तस्वीरों को देखकर सोचते हैं कि उनका चेहरा भी वैसा ही होना चाहिए. विशेषज्ञों का मानना है कि यह दबाव खासकर युवाओं में आत्म-संतुष्टि को कम कर सकता है. जब कोई व्यक्ति बार-बार “परफेक्ट” चेहरा पाने की कोशिश करता है, तो कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं की संख्या बढ़ सकती है.
सिर्फ मेंटल हेल्थ नहीं, सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा है
हाल के वर्षों में ब्रिटेन में कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है. संसदीय समितियों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कई जगह बिना पर्याप्त प्रशिक्षण वाले लोग भी फिलर्स और इंजेक्शन दे रहे हैं. कुछ मामलों में नकली या अनधिकृत उत्पादों के कारण गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं सामने आई हैं. NHS के अनुसार, डर्मल फिलर्स से संक्रमण, नसों को नुकसान और दुर्लभ मामलों में आंखों की रोशनी प्रभावित होने जैसी जटिलताएं भी हो सकती हैं.
भारत में स्थिति कैसी है?
भारत में बोटॉक्स और फिलर्स का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. बड़े शहरों में एस्थेटिक क्लीनिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है. हालांकि भारत में इन प्रक्रियाओं के लिए कोई यूनीवर्सल मेंटल हेल्थ स्क्रीनिंग जरूरी नहीं है, लेकिन मनोचिकित्सक और प्लास्टिक सर्जन लंबे समय से कहते रहे हैं कि जिन लोगों में अत्यधिक असंतोष, चिंता या शरीर को लेकर जुनूनी सोच दिखाई दे, उनके लिए सायकायट्रिक जांच फायदेमंद साबित हो सकती है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सिर्फ “क्या बदलना है” ये पूछना ही काफी नहीं है. बल्कि क्यों “क्यों बदलना है” ये ज्यादा जरूरी सवाल है.
बोटॉक्स और फिलर्स अपने आप में बुरे नहीं हैं. कई लोगों को इनसे आत्मविश्वास मिलता है और वे अपने रूप-रंग को लेकर बेहतर महसूस करते हैं. लेकिन विशेषज्ञ अब इस बात पर जोर दे रहे हैं कि कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं को सिर्फ सौंदर्य का मामला नहीं माना जा सकता. कभी-कभी चेहरे में बदलाव की इच्छा के पीछे मानसिक तनाव, चिंता या आत्म-छवि से जुड़ी गहरी परेशानियां भी छिपी हो सकती हैं. इसलिए सबसे अच्छा कॉस्मेटिक फैसला वही है जो सुरक्षित, सोच-समझकर और सही कारणों से लिया जाए.



