24 साल बाद फिर वही हालात, सितंबर में ही सूखने लगे नागौर के तालाब, बारिश की कमी ने बढ़ाई चिंता

Last Updated:September 26, 2026, 17:04 IST
Nagaur Water Crisis: नागौर में इस बार बारिश की कमी का असर जल स्रोतों पर साफ दिखाई दे रहा है. जिले के कई तालाब सितंबर में ही सूखे नजर आने लगे हैं. स्थानीय स्तर पर इसकी तुलना 24 साल पहले पड़े अकाल से की जा रही है, जब नवंबर से पहले ही तालाब सूख गए थे. इस बार सितंबर में दोबारा ऐसे हालात दिखने से किसानों और ग्रामीणों के बीच चिंता बढ़ गई है.
मानसून अंतिम पड़ाव में पहुंच चुका है, लेकिन इस बार बारिश के आंकड़े और जमीन की स्थिति में बड़ा अंतर नजर आ रहा है. 1 जून से 30 सितंबर तक मानसून की बारिश दर्ज की जाती है. जिले में अब तक 324 मिलीमीटर बारिश हुई है, जो औसत बारिश का करीब 81 प्रतिशत है. आंकड़ा सामान्य के करीब दिखाई दे रहा है, लेकिन इसके बावजूद छोटे-बड़े तालाब और पोखर खाली पड़े हैं. पिछले साल जिले में 673 एमएम बारिश दर्ज हुई थी.
सितंबर में ही तालाबों के सूखने की स्थिति ने चिंता बढ़ा दी है. स्थानीय स्तर पर जानकारों के अनुसार करीब 24 साल पहले 2002-03 में भयंकर अकाल के दौरान ऐसी स्थिति बनी थी, जब तालाब नवंबर से पहले ही सूख गए थे. इस बार हालांकि बारिश का आंकड़ा अकाल जैसे हालात नहीं दिखाता, लेकिन बारिश के तरीके ने जलस्रोतों को पर्याप्त पानी नहीं दिया. कई इलाकों में बारिश हुई, लेकिन वह तालाबों और जलाशयों के कैचमेंट क्षेत्र से पर्याप्त बहाव पैदा नहीं कर सकी.
इस मानसून में तेज और लगातार बारिश के बजाय रुक-रुककर और बिखरी बारिश हुई. कई बार बादल आए, लेकिन थोड़े समय की बारिश के बाद मौसम साफ हो गया. इसका सीधा असर जलस्रोतों पर पड़ा. तालाबों में पानी आने के लिए सिर्फ बारिश होना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि आसपास के बड़े क्षेत्र से पानी का बहाव भी जरूरी होता है. इस बार यही कड़ी कमजोर रही. नतीजा यह रहा कि जिन तालाबों से ग्रामीण क्षेत्रों में मवेशियों और अन्य जरूरतों के लिए पानी की उम्मीद थी, वे मानसून खत्म होने से पहले ही खाली नजर आने लगे.
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बारिश का 81 प्रतिशत आंकड़ा इसलिए भी भ्रम पैदा कर रहा है, क्योंकि बारिश का वितरण पूरे जिले में एक जैसा नहीं रहा. कहीं अच्छी बारिश हुई तो कहीं लंबे अंतराल तक जमीन सूखी रही. तेज गर्मी और बारिश के बीच लंबे अंतराल के कारण जमीन में नमी भी लगातार बनी नहीं रह सकी. जो छोटे जलस्रोत कुछ समय के लिए भरे थे, उनमें भी लगातार वाष्पीकरण के कारण पानी कम होता गया. अब ग्रामीण क्षेत्रों में मवेशियों के लिए पीने के पानी को लेकर चिंता बढ़ने लगी है.
मौसम वैज्ञानिक राधेश्याम शर्मा के अनुसार हवा के पैटर्न में बदलाव और वातावरण में नमी कम होने के संकेतों को देखते हुए 20 सितंबर के बाद मानसून की वापसी की प्रक्रिया शुरू हो सकती है. विदाई से पहले स्थानीय स्तर पर बूंदाबांदी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. पिछले दस साल में दो बार मानसून की वापसी सामान्य समय से करीब 13 दिन देरी से हुई है. सामान्य स्थिति में देश से मानसून की पूरी विदाई 15 अक्टूबर तक मानी जाती है.
सबसे बड़ी चिंता अब पेयजल व्यवस्था को लेकर है. जिले को नहर से फिलहाल करीब 74 एमएलडी पानी मिल रहा है, जबकि जरूरत करीब 125 एमएलडी की बताई जा रही है. यानी मौजूदा आपूर्ति जरूरत से काफी कम है. ऐसे में यदि स्थानीय तालाबों और जलस्रोतों में पानी की आवक नहीं बढ़ी तो आने वाले महीनों में पेयजल व्यवस्था पर दबाव और बढ़ सकता है. तालाबों का पानी केवल ग्रामीण उपयोग ही नहीं, बल्कि पशुधन और स्थानीय भूजल स्तर के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है.
बारिश कम नहीं, लेकिन पानी टिक नहीं पाया… यही इस मानसून की सबसे बड़ी कहानी बन गई है. 324 एमएम बारिश के बावजूद यदि सितंबर में ही तालाब सूखने की स्थिति में पहुंच रहे हैं तो आने वाले महीनों की जल जरूरतों को लेकर अभी से तैयारी जरूरी होगी. मानसून की विदाई के बाद बारिश की संभावना घटेगी और नहर से मिलने वाला पानी भी मांग के मुकाबले कम है. ऐसे में खाली होते तालाब सिर्फ इस सीजन की बारिश का परिणाम नहीं, बल्कि अगले कई महीनों की पेयजल चुनौती का संकेत भी बन सकते हैं.
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September 26, 2026, 17:04 IST



