हौसले और मेहनत से बदली पूजा राठौड़ की पहचान, भारत की पहली महिला व्हीलचेयर हैंडबॉल रेफरी बनने का गौरव

Last Updated:September 26, 2026, 13:04 IST
Pooja Rathore Wheelchair Handball Referee: पूजा राठौड़ की कहानी हौसले, मेहनत और पिता की प्रेरणा की मिसाल है. पिता से मिले प्रोत्साहन के साथ उन्होंने खेल के क्षेत्र में अपना सफर शुरू किया और लगातार मेहनत करते हुए अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचीं. पूजा राठौड़ ने भारत की पहली महिला व्हीलचेयर हैंडबॉल रेफरी बनकर एक खास उपलब्धि हासिल की. उनकी सफलता खेलों में महिलाओं की भागीदारी और चुनौतियों के बीच आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है.
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जोधपुर: जिस सपने की शुरुआत पिता की प्रेरणा से हुई, उसे मेहनत और हौसले ने आज विश्व मंच तक पहुंचा दिया. जोधपुर की पूजा राठौड़ ने स्पेन के बार्सिलोना में आयोजित IHF व्हीलचेयर हैंडबॉल विश्व चैंपियनशिप में भारत की पहली महिला रेफरी बनकर इतिहास रच दिया. स्कूल और यूनिवर्सिटी स्तर से हैंडबॉल खेलने वाली पूजा ने नेशनल लेवल तक अपनी पहचान बनाई और इसके बाद रेफरी के रूप में कदम बढ़ाया. लगातार मेहनत, परिवार के सहयोग और खेल के प्रति जुनून ने उन्हें उस मुकाम तक पहुंचाया, जहां उन्होंने दुनिया के छह महाद्वीपों से आई टीमों के बीच रेफरी और टेक्निकल डेलीगेट की जिम्मेदारी निभाई.
पूजा राठौड़ का खेलों से जुड़ने का सफर उनके पिता की प्रेरणा से शुरू हुआ. उन्होंने विद्यालय स्तर से लेकर यूनिवर्सिटी और नेशनल लेवल तक हैंडबॉल में हिस्सा लिया। इसके बाद उन्होंने डिप्लोमा इन स्पोर्ट्स कोचिंग का कोर्स किया. महज 23 वर्ष की उम्र में शिक्षा विभाग में सरकारी नौकरी हासिल करने के बाद भी उन्होंने खेल से अपना रिश्ता नहीं छोड़ा. वर्तमान में पूजा एमजीजीएस बीजेएस में वरिष्ठ शारीरिक शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं. डिप्लोमा के दौरान मिले प्रशिक्षकों के सहयोग ने उनके आत्मविश्वास को आगे बढ़ाया. इसके बाद राजस्थान हैंडबॉल एसोसिएशन, हैंडबॉल एसोसिएशन इंडिया और व्हीलचेयर हैंडबॉल एसोसिएशन ऑफ इंडिया से मिले सहयोग ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने का रास्ता दिया.
मेहनत के साथ परिवार का मिला मजबूत साथअंतरराष्ट्रीय रेफरी बनने का सफर आसान नहीं था. नामांकन के बाद निर्धारित प्रक्रिया पूरी करने के साथ पूजा को फिजिकल टेस्ट और रिटन टेस्ट जैसी प्रक्रियाओं से भी गुजरना पड़ा. पूजा अपनी सफलता का श्रेय अपनी मेहनत के साथ अपने पिता और ससुराल पक्ष को देती हैं. उनका कहना है कि अगर परिवार का सहयोग नहीं मिलता तो मेहनत को उस मुकाम तक पहुंचाना मुश्किल होता. उन्होंने बताया कि ससुराल पक्ष ने कभी उन्हें आगे बढ़ने से नहीं रोका, बल्कि हर कदम पर प्रोत्साहित किया. इसी पारिवारिक सहयोग ने उन्हें अपनी जिम्मेदारियों के साथ खेल के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ने की ताकत दी.
निष्पक्ष फैसला ही एक रेफरी की सबसे बड़ी जिम्मेदारीपूजा के लिए रेफरी बनना सिर्फ मैदान में निर्णय देने की भूमिका नहीं, बल्कि खिलाड़ियों के भविष्य और उनके उत्साह से जुड़ी जिम्मेदारी है. उनका मानना है कि खिलाड़ी वर्षों की मेहनत के बाद मैदान पर उतरते हैं और उस मेहनत का परिणाम कई बार रेफरी के एक निर्णय पर निर्भर करता है. ऐसे में रेफरी का निष्पक्ष होना बेहद जरूरी है. पूजा कहती हैं कि खिलाड़ी हारें या जीतें, अगर उन्हें निष्पक्ष निर्णय मिलता है, तो उनका खेल के प्रति विश्वास और मोटिवेशन बढ़ता है. यही वजह है कि उन्होंने हमेशा निष्पक्ष निर्णय देने का संकल्प रखा है. बार्सिलोना में भारत की पहली महिला रेफरी के रूप में जिम्मेदारी निभाकर पूजा ने साबित किया कि जोधपुर की बेटियां अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर भी अपनी अलग पहचान बना सकती हैं.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
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Jodhpur,Rajasthan
First Published :
September 26, 2026, 13:04 IST



