Isabgol Farming I नागौर के किसान ध्यान दें, ईसबगोल की बुवाई में ये बातें बदल सकती हैं पैदावार

नागौर. जिले में ईसबगोल रबी सीजन की प्रमुख फसलों में से एक है, कम पानी में तैयार होने वाली इस फसल की खेती जिले के कई क्षेत्रों में किसान करते हैं. ईसबगोल का उपयोग मुख्य रूप से भूसी के लिए किया जाता है, जिसकी बाजार में मांग बनी रहती है. एग्रीकल्चर एक्सपर्ट बजरंग सिंह ने बताया कि किसानों के लिए अच्छी पैदावार हासिल करने में बुवाई का समय, मिट्टी की तैयारी, बीज की गुणवत्ता और सिंचाई प्रबंधन की अहम भूमिका रहती है.
उन्होंने बताया कि ईसबगोल की बुवाई सामान्य तौर पर अक्टूबर के अंत से नवंबर तक की जाती है. बहुत जल्दी बुवाई करने पर अधिक तापमान का असर पौधों की बढ़वार और उत्पादन पर पड़ सकता है, जबकि देरी से बुवाई करने पर फसल की अवधि और पैदावार प्रभावित हो सकती है, इसलिए किसानों को स्थानीय मौसम की स्थिति को देखते हुए सही समय पर बुवाई करना जरूरी है. तापमान अनुकूल रहने पर पौधों का अंकुरण और शुरुआती विकास बेहतर होता है.
ऐसी मिट्टी में अच्छी होती है फसल
ईसबगोल की खेती के लिए हल्की, दोमट या बलुई दोमट मिट्टी को उपयुक्त माना जाता है. सबसे जरूरी बात यह है कि खेत में पानी जमा नहीं होना चाहिए. जल निकासी खराब होने पर पौधों की जड़ें प्रभावित हो सकती हैं और रोगों का खतरा बढ़ सकता है. बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बना ले. इसके अलावा खेत को समतल करने से सिंचाई के दौरान नमी का समान वितरण करने में मदद मिलती है.
बीज की गुणवत्ता पर रखें विशेष ध्यान
एग्रीकल्चर एक्सपर्ट बजरंग सिंह ने बताया ईसबगोल का बीज आकार में काफी छोटा होता है, इसलिए बुवाई के दौरान इसे बहुत अधिक गहराई में नहीं डालना चाहिए. किसानों को प्रमाणित और अच्छी गुणवत्ता वाले बीज का इस्तेमाल करना चाहिए. कतारों में बुवाई करने से पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखने और बाद में खरपतवार नियंत्रण में सुविधा रहती है.
ज्यादा पानी से हो सकता है नुकसान
ईसबगोल कम पानी में होने वाली फसल है, इसलिए सिंचाई का प्रबंधन बेहद जरूरी है. खेत में जरूरत के अनुसार हल्की सिंचाई करनी चाहिए. अधिक पानी देने या खेत में लंबे समय तक पानी जमा रहने से फसल को नुकसान हो सकता है. दूसरी ओर, फूल आने और दाना बनने की अवस्था में पानी की कमी होने पर भी उत्पादन प्रभावित हो सकता है, इसलिए मिट्टी में नमी और मौसम की स्थिति देखकर सिंचाई करना जरूरी है.
खरपतवार और रोगों पर नजर जरूरी
फसल की शुरुआती अवस्था में खरपतवार तेजी से बढ़ सकते हैं, ये पौधों के साथ पानी और पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं. ऐसे में समय पर निराई-गुड़ाई करके खेत को खरपतवार मुक्त रखना जरूरी है. किसानों को फसल की नियमित निगरानी भी करनी चाहिए. पत्तियों या पौधों पर असामान्य लक्षण दिखाई देने पर बिना जानकारी के दवा का इस्तेमाल करने के बजाय कृषि विभाग या कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित रहता है.
110 से 130 दिन में तैयार हो सकती है फसल
मौसम और खेती की परिस्थितियां अनुकूल रहने पर ईसबगोल की फसल करीब 110 से 130 दिन में तैयार हो जाती है. पकने पर पौधे सूखने लगते हैं और बालियों का रंग बदलने लगता है. इस अवस्था में कटाई में ज्यादा देरी करने पर बीज झड़ने का नुकसान हो सकता है. कटाई के बाद बालियों को अच्छी तरह सुखाकर बीज अलग किया जाता है, बीज की अच्छी सफाई और उचित भंडारण से उसकी गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलती है.



