झांसी के क्राफ्ट मेला मैदान का इतिहास रानी लक्ष्मीबाई के पिता मोरोपंत तांबे की शहादत से जुड़ा, यहां दी गई थी फांसी, जानें

Last Updated:October 07, 2026, 07:44 IST
Jhansi Craft Mela: झांसी का क्राफ्ट मेला मैदान आज बड़े आयोजनों के लिए जाना जाता है. लेकिन इस जगह का रिश्ता रानी लक्ष्मीबाई के परिवार के एक दर्दनाक अध्याय से भी जोड़ा जाता है. स्थानीय इतिहास के अनुसार इसी जगह रानी लक्ष्मीबाई के पिता मोरोपंत तांबे को अंग्रेजों ने फांसी दी थी. इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि मोरोपंत तांबे का झांसी से गहरा संबंध था और रानी लक्ष्मीबाई के झांसी आने के बाद वह भी यहीं रहने लगे थे.
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झांसीः यूपी का झांसी जिला, जहां से रानी लक्ष्मीबाई नें 1857 में अंग्रेजों का विद्रोह करते हुए तलवार उठाईं और ऐसी जंग लड़ीं की इतिहास में अमर हो गईं. अंग्रेजों ने उनके पिता को फांसी के फंदे पर लटका दिया था. जिसके चलते रानी का आक्रोश और बढ़ गया.
झांसी का क्राफ्ट मेला मैदान आज बड़े आयोजनों के लिए जाना जाता है. लेकिन इस जगह का रिश्ता रानी लक्ष्मीबाई के परिवार के एक दर्दनाक अध्याय से भी जोड़ा जाता है. स्थानीय इतिहास के अनुसार इसी जगह रानी लक्ष्मीबाई के पिता मोरोपंत तांबे को अंग्रेजों ने फांसी दी थी. इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि मोरोपंत तांबे का झांसी से गहरा संबंध था और रानी लक्ष्मीबाई के झांसी आने के बाद वह भी यहीं रहने लगे थे.
क्राफ्ट मेले से ताजा हो जाता है झांसी के इस जगह का इतिहास
रानी लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम मणिकर्णिका था और उन्हें मनु कहा जाता था. बिठूर में पली-बढ़ीं मनु ने घुड़सवारी और शस्त्र चलाने की शिक्षा ली. साल 1842 में उनका विवाह झांसी के महाराजा गंगाधर राव से हुआ. शादी के बाद वह लक्ष्मीबाई बनीं और झांसी की रानी कहलायीं. रानी के झांसी आने के बाद उनके पिता मोरोपंत तांबे भी झांसी में रहने लगे. फिर आया 1857 का दौर था जब अंग्रेजों ने झांसी पर हमला किया तो रानी किले से निकलकर कालपी और फिर ग्वालियर की ओर बढ़ीं. इसी दौरान मोरोपंत तांबे भी अंग्रेजों की गिरफ्त में आ गए. ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक उन्हें दतिया में पकड़ा गया और बाद में अंग्रेजों ने फांसी दे दी.
क्राफ्ट मेला मैदान को उनकी फांसी की जगह बताए जाने की स्थानीय मान्यता इस जगह को झांसी के इतिहास से जोड़ती है. कुछ ही समय बाद 18 जून 1858 को ग्वालियर में लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई भी वीरगति को प्राप्त हुईं. यानी पिता और बेटी दोनों का जीवन 1857 के उस संघर्ष से जुड़ा रहा, जिसने झांसी का नाम इतिहास में अमर कर दिया.
About the AuthorRajneesh Kumar Yadav
Rajnish Kumar Yadav is a digital journalist and content publisher with over seven years of experience in print and digital media. He is currently working with Digital (Local18) as a Content Publisher, wh…
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Jhansi,Uttar Pradesh
First Published :
October 07, 2026, 07:44 IST



