40 दिन की तपस्या के बाद जलती बातियों के बीच घूमते हैं कलाकार, चूक से जुड़ी है अनोखी मान्यता

Last Updated:October 07, 2026, 05:41 IST
Mewar Gavri Tradition: मेवाड़ का प्रसिद्ध लोकनाट्य गवरी 40 दिनों की कठिन तपस्या और कड़े नियमों के बाद ‘ग्वालन-वलावन’ की अनोखी रस्म के साथ संपन्न होता है. इस दौरान कलाकार हरी सब्जी, चप्पल और परिवार से दूर रहकर सात्विक जीवन जीते हैं. समापन से पहले जागरण होता है और कलाकार जलते हुए दीपकों के बीच से गुजरकर ‘अग्नि परीक्षा’ देते हैं. मान्यता है कि तपस्या में चूक होने पर ही अग्नि नुकसान पहुंचाती है. अंत में मिट्टी का हाथी बनाकर नदी किनारे वलावन की रस्म पूरी की जाती है और मेवाड़ की यह सदियों पुरानी परंपरा पूर्ण होती है.
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Gavri tradition in Mewar: राजस्थान के मेवाड़ अंचल की गवरी सिर्फ एक लोकनाट्य या सामान्य नृत्य नहीं है, बल्कि यह गहरी आस्था, सदियों पुरानी परंपरा और अत्यंत कठिन तपस्या का एक अनूठा संगम है. इसे देखने के लिए आज भी स्थानीय लोग और दूर-दराज से आए पर्यटक बेहद उत्सुक रहते हैं. 40 दिनों तक गवरी खेलने वाले कलाकार कई कठिन नियमों का सख्ती से पालन करते हैं और अपने परिवार से दूर रहकर इस पवित्र परंपरा को निभाते हैं. लेकिन इस पूरी तपस्या और लोकनाट्य का सबसे खास और अंतिम पड़ाव होता है ‘ग्वालन’ और ‘वलावन’. इसी दौरान गवरी के कलाकार एक ऐसी अग्नि परीक्षा से गुजरते हैं, जिसे मेवाड़ की सबसे रहस्यमयी और सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा माना जाता है.
गवरी में शामिल होने वाले कलाकार पूरे 40 दिनों तक व्रत और तपस्या करते हैं. इस दौरान वे कई तरह के त्याग करते हैं. 40 दिन के इस अनुष्ठान में कलाकार हरी सब्जियों का सेवन बिल्कुल नहीं करते हैं. इसके अलावा वे मांस-मदिरा और किसी भी तरह के व्यसन से पूरी तरह दूर रहते हैं. तपस्या का स्तर इतना ऊंचा होता है कि ये कलाकार इन 40 दिनों तक अपने पैरों में जूते या चप्पल तक नहीं पहनते हैं. वे पूरी तरह से सात्विक जीवन जीते हैं और अपने परिवार से भी शारीरिक और मानसिक दूरी बनाए रखते हैं. लगातार 40 दिनों तक इन कड़े नियमों का पालन करने के बाद ही गवरी अपने समापन की ओर बढ़ती है, जिसे ‘वलावन’ की प्रक्रिया कहा जाता है.
रातभर जागरण और भगवान से आज्ञावलावन की अंतिम प्रक्रिया शुरू होने से पहले रात में भव्य जागरण किया जाता है. इस जागरण में देवी-देवताओं के भजन गाए जाते हैं और पूरी रात भक्ति का माहौल रहता है. इसके बाद जिस गांव की गवरी होती है, वहां के सभी कलाकार गांव के प्रमुख मंदिर में एक साथ पहुंचते हैं. यहां भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और उनसे आगे की रस्मों के लिए आज्ञा ली जाती है. यह क्षण बहुत ही भावुक और आस्था से भरा होता है.
अग्नि परीक्षा: तपस्या का असली प्रमाणभगवान से आज्ञा लेने के बाद शुरू होती है गवरी की सबसे खास और रोंगटे खड़े कर देने वाली रस्म— अग्नि परीक्षा. इस अग्नि परीक्षा के लिए मिट्टी के बड़े-बड़े दीपकों में बड़ी-बड़ी बातियां तैयार की जाती हैं. इसके बाद कलाकार इन धधकती और जलती हुई बातियों के आसपास अपने शरीर को घुमाते हैं और अपनी आस्था का प्रदर्शन करते हैं. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, अगर अग्नि की लौ इस दौरान किसी भी कलाकार को छू जाए या उसे जला दे, तो इसे 40 दिनों की तपस्या में हुई किसी चूक या गलती से जोड़कर देखा जाता है. हालांकि, भगवान की कृपा से आमतौर पर इस अग्नि परीक्षा के दौरान किसी भी कलाकार को कोई नुकसान नहीं होता है.
मिट्टी का हाथी और वलावन की पूर्णताअग्नि परीक्षा के सफलतापूर्वक संपन्न होने के बाद अगले दिन वलावन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाता है. इस रस्म में मिट्टी का एक खास हाथी बनाया जाता है और इसके साथ ही भगवान शिव और माता पार्वती की पूरे विधि-विधान से पूजा की जाती है. पूजा संपन्न होने के बाद सभी कलाकार गाते-बजाते हुए किसी पवित्र नदी या सरोवर के किनारे पहुंचते हैं. यहीं पर 40 दिनों से चली आ रही उनकी इस कठिन तपस्या का अंतिम पड़ाव पूरा होता है.
मेवाड़ की सांस्कृतिक पहचानगवरी में मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी पौराणिक कथाओं का ही मंचन किया जाता है. कलाकार अलग-अलग पात्रों के रूप में लोककथाओं और धार्मिक प्रसंगों को आम जनता के सामने प्रस्तुत करते हैं. यही वजह है कि गवरी को मेवाड़ की समृद्ध लोक संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. लोक संस्कृति के जानकार श्रीकृष्ण जुगुनू बताते हैं कि गवरी की यह पवित्र परंपरा मेवाड़ में सैकड़ों वर्षों से बदस्तूर चली आ रही है. समय के साथ समाज में कई बदलाव जरूर आए हैं, लेकिन गवरी की मूल परंपरा और इसके कलाकारों की तपस्या आज भी वैसी ही कायम है. वलावन की यह परंपरा पूरी होने के बाद गवरी खेलने वाले कलाकार अपने घर लौटते हैं और मेवाड़ की यह अनूठी लोक परंपरा एक बार फिर अपनी गहरी सांस्कृतिक पहचान छोड़ जाती है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Udaipur,Udaipur,Rajasthan
First Published :
October 07, 2026, 05:41 IST



