झुंझुनूं के बिसाऊ में 200 साल पुरानी मूक रामलीला, बिना बोले मंच पर जीवंत होती है पूरी रामायण

Last Updated:October 07, 2026, 09:26 IST
Bisau Mook Ramleela Jhunjhunu: राजस्थान के झुंझुनूं जिले के बिसाऊ कस्बे में 200 साल पुरानी ऐतिहासिक मूक रामलीला का मंचन 11 अक्टूबर से शुरू होने जा रहा है. इस रामलीला में कोई भी कलाकार संवाद नहीं बोलता है, बल्कि मुखौटों और इशारों से पूरी रामायण का जीवंत मंचन किया जाता है. गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज इस अनूठी परंपरा की शुरुआत 170 साल पहले जमना साध्वी ने की थी. दशहरे के बजाय चतुर्दशी को रावण दहन होता है. इस आयोजन में मुस्लिम समुदाय की भी अहम भागीदारी होती है, जो साम्प्रदायिक सौहार्द की अद्भुत मिसाल है.
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झुंझुनूं: राजस्थान के झुंझुनूं जिले का बिसाऊ कस्बा अपनी ऐतिहासिक और अनूठी मूक रामलीला के लिए दुनियाभर में मशहूर है. यह अनोखी परंपरा लगभग 200 साल पुरानी है और आज भी पूरी शिद्दत के साथ निभाई जा रही है. इस रामलीला की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें मंच पर कोई भी कलाकार एक भी शब्द नहीं बोलता है. पूरी रामायण का मंचन केवल भाव-भंगिमाओं, इशारों, विशेष मुखौटों और अद्भुत अभिनय के जरिए किया जाता है. इस बार इस ऐतिहासिक मूक रामलीला का मंचन 11 अक्टूबर से शुरू होने जा रहा है. गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज इस अनोखी रामलीला को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं. बिसाऊ कस्बे में रामलीला की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं.
कलाकार अपने किरदारों में पूरी तरह ढलने के लिए कड़ी मेहनत और अभ्यास कर रहे हैं. मंचन स्थल पर सभी जरूरी व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है. कलाकार बाबू नवहाल समुद्र तट पर श्रीराम की लंका चढ़ाई से पहले होने वाली शिव पूजा के लिए शिवलिंग पर रंग-रोगन कर रहे हैं. रामलीला के विभिन्न प्रसंगों में इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग पात्रों के मुखौटे, साज-सज्जा और अन्य सामग्री भी पूरी सावधानी के साथ तैयार की जा रही है. इन मुखौटों का इस रामलीला में बहुत ज्यादा महत्व है क्योंकि संवाद न होने के कारण चेहरे के भाव इन्हीं के जरिए बेहतरीन तरीके से व्यक्त किए जाते हैं.
रामाणा जोहड़ से हुई थी इस अनूठी शुरुआतबिसाऊ की इस रामलीला की शुरुआत का इतिहास भी बेहद दिलचस्प और प्रेरणादायक है. स्थानीय लोगों के अनुसार इस मूक रामलीला की शुरुआत करीब 170 साल पहले रामाणा जोहड़ से हुई थी. बताया जाता है कि जमना नाम की एक साध्वी ने गांव के कुछ बच्चों को इकट्ठा करके रामलीला शुरू करवाई थी. उस समय पात्रों के लिए अलग-अलग मुखौटे तैयार किए गए थे. लेकिन मुखौटे पहनने के बाद बच्चों को संवाद बोलने में काफी परेशानी होने लगी. बच्चों की इस परेशानी को देखते हुए मंचन को बिना संवाद के यानी मूक तरीके से करने का फैसला लिया गया. यही अनोखा प्रयोग आगे चलकर बिसाऊ की एक बड़ी और वैश्विक पहचान बन गया.
मौन अभिनय और दशहरे के बाद भी मंचनइस मूक रामलीला में मौन अभिनय ही सबकुछ है. चेहरे के भाव, हाथों के इशारे, शरीर की गतिविधियां और मंच पर होने वाले एक्शन ही संवाद का काम करते हैं. ढोल-नगाड़ों की तेज आवाज के बीच जब कलाकार बिना एक भी शब्द बोले रामायण के प्रसंगों को जीवंत करते हैं, तो दर्शकों के लिए यह अनुभव बेहद रोमांचक बन जाता है. पूरे देश में जहां दशहरे के दिन रावण दहन के साथ रामलीला समाप्त हो जाती है, वहीं बिसाऊ की परंपरा इससे बिल्कुल अलग है. यहां रामलीला का मंचन करीब एक पखवाड़े तक चलता है. सातवें दिन लंका के पुतले का दहन किया जाता है. सबसे बड़ी बात यह है कि यहां रावण दहन दशहरे के बजाय चतुर्दशी को किया जाता है.
सामाजिक भाईचारे की मिसाल और विशेष मिठाइयांबिसाऊ की रामलीला सामाजिक सौहार्द की भी एक बेहतरीन मिसाल है. इस आयोजन में मुस्लिम समुदाय के ईल्लाही समाज के लोग भी पूरी श्रद्धा से शामिल होते हैं. रामलीला के दौरान बजने वाले ढोल-नगाड़ों में ईल्लाही समाज की खास भागीदारी होती है. इसके अलावा, इस दौरान बिसाऊ में विशेष मिठाइयां तिलंगनी और सैंठोली बनाई जाती हैं. ये मिठाइयां रामलीला से लेकर दीपावली तक बनती हैं और लोगों के आकर्षण का बड़ा केंद्र रहती हैं. अब यह ऐतिहासिक रामलीला सोशल मीडिया पर भी लाइव दिखाई जाती है, जिससे दुनिया भर के लोग इस पौने दो सदी पुरानी परंपरा का आसानी से हिस्सा बन सकें.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
और पढ़ेंLocation :
Jhunjhunu,Jhunjhunu,Rajasthan
First Published :
October 07, 2026, 09:26 IST



