Rajasthan

Agriculture: बाजरे की खेती में आएगा बदलाव, कृषि विश्वविद्यालय ने विकसित की 2 हाईब्रिड किस्में, जानें खासियत

बीकानेर. पश्चिमी राजस्थान के शुष्क इलाकों में बाजरा खेती का प्रमुख आधार है. कम पानी में तैयार होने वाली इस फसल की पैदावार बढ़ाने और किसानों को बेहतर किस्में उपलब्ध करवाने के लिए बीकानेर स्थित स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय में बाजरे की हाईब्रिड किस्मों पर शोध किया जा रहा है. शोध के तहत ऐसी किस्मों के विकास पर जोर दिया जा रहा है, जो स्थानीय जलवायु के अनुकूल होने के साथ कम समय में पकें और किसानों को अधिक उत्पादन दे सके. विश्वविद्यालय में चल रहे अनुसंधान का उद्देश्य बाजरे की ऐसी किस्मों को बढ़ावा देना है, जो शुष्क क्षेत्रों में खेती को अधिक लाभकारी बनाने में मदद करें.

कम पानी में बेहतर उत्पादन और कम अवधि में पकने वाली हाईब्रिड किस्में पश्चिमी राजस्थान के किसानों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है. विश्वविद्यालय के अनुसंधान अधिकारी डॉ. एन.के. शर्मा ने बताया कि बाजरा एरिड जोन यानी शुष्क क्षेत्रों की सबसे महत्वपूर्ण फसलों में शामिल है. खाद्यान्न के रूप में इसका विशेष महत्व है. कम पानी में उत्पादन देने की क्षमता के कारण राष्ट्रीय स्तर पर भी बाजरे की उपयोगिता बढ़ रही है. उन्होंने बताया कि बाजरे की खेती में बेहतर उत्पादन क्षमता वाली हाईब्रिड किस्मों का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है.

बीकानेर में विकसित हुई दो प्रमुख किस्में

डॉ. शर्मा के अनुसार, बाजरे का अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना केंद्र स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर में संचालित है. यहां से बीएचपी 1202 और बीएचपी 1602 नाम की दो किस्में विकसित की गई है. ये हाईब्रिड किस्में यहां के वातावरण और कृषि परिस्थितियों के अनुकूल हैं. उन्होंने बताया कि हाल ही में आरएचबी 233 और आरएचबी 234 नाम की दो अन्य किस्में भी सामने आई हैं. इनकी उत्पादन क्षमता काफी अच्छी मानी जा रही है. हाईब्रिड किस्मों में सामान्य किस्मों की तुलना में अधिक उत्पादन की संभावना रहती है. साथ ही, फसल में एकसमान परिपक्वता मिलने से कटाई और अन्य कृषि कार्यों में भी सुविधा हो सकती है.

70 से 75 दिन में पकने वाली किस्मों पर जोर

शुष्क क्षेत्रों में कम समय में पकने वाली बाजरे की किस्में किसानों के लिए विशेष रूप से उपयोगी हैं. डॉ. शर्मा ने बताया कि वर्तमान में बाजरे की विभिन्न किस्मों को पकने में लगभग 65 से 70 दिन से लेकर 90 से 95 दिन तक का समय लगता है. लेकिन शुष्क क्षेत्रों की परिस्थितियों को देखते हुए 70 से 75 दिन में तैयार होने वाली किस्में अधिक उपयोगी साबित हो सकती है. उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध है, वहां अधिक उत्पादन क्षमता वाले हाईब्रिड का चयन किया जा सकता है. वहीं, बारानी खेती यानी बारिश पर निर्भर रहने वाले क्षेत्रों में जल्दी पकने वाली किस्में किसानों के लिए फायदेमंद हो सकती हैं. कम समय में पकने से फसल को उपलब्ध नमी के अनुसार तैयार करने में मदद मिल सकती है.

अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार किस्मों का चयन जरूरी

डॉ. शर्मा ने बताया कि बाजरे की खेती में बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए क्षेत्र की जलवायु, पानी की उपलब्धता और फसल की अवधि को ध्यान में रखना जरूरी है. राज 171, जेवीवी-2 और दाह शक्ति जैसी किस्मों का भी इस क्षेत्र की खेती के संदर्भ में उल्लेख किया गया. किसानों के लिए सही किस्म का चयन उनकी जमीन और खेती की परिस्थितियों के अनुसार करना महत्वपूर्ण है.

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