बीजेपी-कांग्रेस ने बदली रणनीति, प्रचार से लेकर टिकट आवंटन तक सबकुछ बदलेगा

जयपुर. राजस्थान में पंचायतीराज चुनाव 2026 के पहले चरण के नामांकन की अंतिम तारीख नजदीक आने के साथ ही भाजपा और कांग्रेस ने अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव शुरू कर दिया है. नगरीय निकाय चुनाव में टिकट वितरण के बाद सामने आई बगावत और निर्दलीय उम्मीदवारों की चुनौती से सबक लेते हुए दोनों दल इस बार उम्मीदवारों के चयन से लेकर प्रचार तक ज्यादा सतर्क नजर आ रहे हैं. भाजपा और कांग्रेस कई जगहों पर प्रत्याशियों के नाम अंतिम समय तक गोपनीय रखने की रणनीति अपना सकती हैं, ताकि टिकट नहीं मिलने से नाराज दावेदारों को निर्दलीय चुनाव लड़ने या दूसरी पार्टी से संपर्क करने का ज्यादा समय न मिले. वहीं, कांग्रेस निकाय चुनाव के उलट इस बार प्रदेश के बड़े नेताओं को भी प्रचार अभियान में उतारने की तैयारी कर रही है.
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली सहित वरिष्ठ नेता चुनावी सभाएं कर सकते हैं. कांग्रेस ने जिला इकाइयों से सभाओं के लिए स्थान और नेताओं के दौरों से जुड़े प्रस्ताव मांगे हैं. पहले चरण में करीब 16 जिला परिषदों और 104 पंचायत समितियों के वार्डों में उम्मीदवार उतारने की तैयारी के बीच पार्टी में टिकटों पर मंथन चल रहा है. भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने चुनौती केवल उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की नहीं, बल्कि संगठन को एकजुट रखने और अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ भीतरघात रोकने की भी है.
निकाय चुनाव से सबक, टिकटों की घोषणा में गोपनीयता
हाल ही में हुए नगरीय निकाय चुनावों में निर्दलीय और अन्य विकल्पों के उम्मीदवारों ने करीब 30 प्रतिशत तक वोट हासिल किए थे. टिकट नहीं मिलने से नाराज कई दावेदारों के निर्दलीय मैदान में उतरने या दूसरे दलों का रुख करने की आशंका ने प्रमुख राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ाई. इसी अनुभव को देखते हुए पंचायत चुनाव में उम्मीदवारों की सूची अंतिम समय तक सार्वजनिक नहीं करने की रणनीति पर जोर दिया जा रहा है. भाजपा ने निकाय चुनाव के दौरान कई जगहों पर प्रत्याशियों को फोन पर टिकट की पुष्टि की थी. नामांकन के लिए उम्मीदवारों को एक स्थान पर एकत्रित कर साथ ले जाने की रणनीति भी अपनाई गई थी. अब पंचायत चुनाव में भी इसी तरह गोपनीयता बरतने की संभावना है. इसका मकसद असंतुष्ट दावेदारों को बगावत की तैयारी या दूसरे दलों से संपर्क साधने के लिए कम समय देना है. हालांकि, सभी सीटों पर यही तरीका अपनाया जाएगा या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है.
कांग्रेस ने बदली रणनीति, बड़े नेताओं को प्रचार में उतारने की तैयारी
नगरीय निकाय चुनाव में प्रदेश स्तरीय नेताओं के प्रचार से दूरी बनाए रखने के बाद कांग्रेस पंचायत चुनाव में अपना रुख बदलने जा रही है. पार्टी पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट, प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली सहित प्रमुख नेताओं को प्रचार में उतारने की तैयारी कर रही है. कैंपेन कमेटी की बैठक के बाद प्रदेश कांग्रेस ने जिला कांग्रेस कमेटियों से सभाओं के लिए स्थान और नेताओं की मांग से जुड़े प्रस्ताव मांगे हैं. सूत्रों के मुताबिक, डोटासरा और जूली के संयुक्त दौरे प्रस्तावित हैं, जबकि गहलोत और पायलट अलग-अलग क्षेत्रों में सभाएं कर सकते हैं. बड़े नेताओं के अपने गृह जिलों और प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी सक्रिय रहने की संभावना है. डोटासरा सीकर और जूली अलवर में फोकस कर सकते हैं. वहीं, गहलोत के जोधपुर और मारवाड़ तथा पायलट के टोंक, दौसा और पूर्वी राजस्थान में सक्रिय रहने की संभावना है.
16 जिला परिषद और 104 पंचायत समितियों पर फोकस
पंचायत चुनाव के पहले चरण में करीब 16 जिला परिषदों और 104 पंचायत समितियों के वार्डों में उम्मीदवार उतारने के लिए कांग्रेस में नामों पर मंथन चला. प्रदेश कांग्रेस ने सिंबल वितरण की तैयारी भी पूरी कर ली है. पार्टी सूत्रों के अनुसार, चुनाव वाले जिलों के जिला प्रभारी और पंचायत समिति प्रभारी सिंबल लेने के लिए प्रदेश स्तर पर बुलाए गए हैं. प्रदेश कांग्रेस के वॉररूम से सिंबल वितरित किए जाने हैं, जिसके बाद संबंधित जिलों में तय उम्मीदवारों को सिंबल सौंपे जाएंगे. टिकटों को लेकर अब तक किसी बड़े विवाद की सूचना नहीं होने की बात कही जा रही है. हालांकि, किसी सीट पर सहमति नहीं बनने या विवाद बढ़ने की स्थिति में प्रदेश नेतृत्व हस्तक्षेप कर उम्मीदवार के नाम पर फैसला कर सकता है. टिकटों को अंतिम रूप दिए जाने के बाद जिला कांग्रेस कमेटियों को प्रचार के लिए नेताओं के नाम और कार्यक्रम भी मिल सकते हैं.
टिकट से लेकर प्रचार तक एकजुटता की परीक्षा
पंचायत चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती असंतुष्ट दावेदारों को संभालने की होगी. पंचायत समिति और जिला परिषद की एक ही सीट पर कई नेता दावेदारी कर रहे हैं. टिकट नहीं मिलने पर नाराज दावेदार निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं या विरोधी दल का दामन थाम सकते हैं. इससे अधिकृत उम्मीदवारों के सामने अपने ही क्षेत्र में चुनौती खड़ी होने का खतरा रहेगा. ऐसे में दोनों दल उम्मीदवारों की घोषणा से लेकर नामांकन और प्रचार तक रणनीतिक गोपनीयता और संगठनात्मक समन्वय पर जोर दे रहे हैं. कांग्रेस जहां बड़े नेताओं की सभाओं के जरिए चुनावी माहौल बनाने की तैयारी में है, वहीं दोनों दल टिकट वितरण के बाद संभावित बगावत को रोकने की कोशिश में जुटे हैं. अब नामांकन प्रक्रिया और उम्मीदवारों की अंतिम सूची से साफ होगा कि पार्टियां अपने दावेदारों को कितनी प्रभावी तरीके से साध पाती है.



