जहाँ आधुनिक मेडिकल साइंस भी हो जाता है फेल, लकवा रोगी हो जाते हैं पूरी तरह ठीक

Last Updated:October 14, 2026, 09:08 IST
Chittorgarh Jhantla Mata Temple For Paralysis Healing Shrine: चित्तौड़गढ़ के पांडोली गांव में स्थित झांतला माता मंदिर लकवा रोगियों के इलाज के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है. सैकड़ों साल पुराने इस मंदिर में आधुनिक चिकित्सा से ठीक न होने वाले लकवा पीड़ित माता के दरबार में आकर स्वस्थ होते हैं. यहाँ वट वृक्ष की परिक्रमा और रात्रि विश्राम की विशेष मान्यता है. नवरात्रि पर यहाँ गुजरात, एमपी और मुंबई सहित दूर-दूर से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं. आस्था और चमत्कार का यह केंद्र आज भी विज्ञान के लिए एक बड़ा अजूबा बना हुआ है.
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Chittorgarh Jhantla Mata Temple: लकवा रोगियों के लिए वरदान है चित्तौड़गढ़ का झांतला माता मंदिर
चित्तौड़गढ़: आमतौर पर जब कोई व्यक्ति लकवा या पैरालाइसिस जैसी गंभीर बीमारी से ग्रसित होता है, तो वह देश के बड़े-बड़े अस्पतालों और महंगे डॉक्टरों के चक्कर काटने को मजबूर हो जाता है. लेकिन राजस्थान के ऐतिहासिक और मेवाड़ के प्रसिद्ध शहर चित्तौड़गढ़ में आस्था का एक ऐसा अलौकिक केंद्र मौजूद है, जहां गंभीर बीमारियों का इलाज आधुनिक चिकित्सा पद्धति से हटकर माता के दरबार में होता है. हम बात कर रहे हैं चित्तौड़गढ़ के प्रसिद्ध झांतला माता मंदिर की, जहां देश-विदेश से लकवा रोगी डॉक्टरों के बजाय माता के चरणों में शीश नवाने पहुंचते हैं और स्वस्थ होकर घर लौटते हैं.
चित्तौड़गढ़ जिला मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर की दूरी पर पांडोली गांव के ऐतिहासिक तालाब की पाल पर झांतला माता का यह प्रसिद्ध शक्तिपीठ स्थित है. इस मंदिर का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है. मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में यहां एक विशाल वट वृक्ष हुआ करता था, जिसके नीचे माता की दिव्य प्रतिमा विराजित थी. कालांतर में विक्रम संवत 1215 के आसपास इस स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया. वर्तमान समय में मंदिर के गर्भ गृह में पांच देवियों की मनमोहक और चमत्कारी प्रतिमाएं स्थापित हैं. इस पवित्र स्थान की एक और खास बात यह है कि पिछले लगभग 125 वर्षों से गुर्जर समाज का एक ही परिवार पूरी निष्ठा, तपस्या और पारंपरिक नियमों के साथ माताजी की सेवा-पूजा निभाता आ रहा है.
‘लकवा ग्रस्त रोगियों की देवी’ के रूप में ख्यातिझांतला माता को मुख्य रूप से ‘लकवा ग्रस्त रोगियों की देवी’ के रूप में जाना जाता है. यहां आने वाले लकवा रोगियों के लिए कुछ विशेष नियम और परंपराएं हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य होता है. मरीजों को मंदिर परिसर में ही रात्रि विश्राम करना पड़ता है और परिसर में स्थित प्राचीन वट वृक्ष की नियमित परिक्रमा करनी होती है. ऐसी अटूट मान्यता है कि इस विशेष धार्मिक प्रक्रिया और माता के आशीर्वाद से गंभीर से गंभीर लकवा पीड़ित मरीज भी धीरे-धीरे पूरी तरह स्वस्थ होने लगते हैं. रोग मुक्त होने के बाद श्रद्धालु आभार प्रकट करने के लिए माता के दरबार में परंपरा के अनुसार मुर्गों का उतारा करते हैं और उन्हें मंदिर परिसर में ही छोड़ देते हैं.
नवरात्रि पर लगता है भारी मेला, दूर-दूर से पहुंचते हैं भक्तशक्ति की आराधना के पर्व नवरात्रि के दौरान झांतला माता के इस दरबार में भव्य मेलों का आयोजन किया जाता है. इन नौ पवित्र दिनों में माताजी की विशेष पांच प्रकार की आरतियां की जाती हैं, जिनके दर्शन करने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है. चित्तौड़गढ़ के अलावा राजस्थान के भीलवाड़ा, अजमेर, राजसमंद तथा पड़ोसी राज्यों जैसे गुजरात, मध्य प्रदेश और मुंबई, महाराष्ट्र तक से लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. विज्ञान और आधुनिक चिकित्सा के इस आधुनिक दौर में भी चित्तौड़गढ़ का यह झांतला माता मंदिर देश-दुनिया के लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए अटूट आस्था, विश्वास और जीवन की नई उम्मीद का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Chittaurgarh,Chittaurgarh,Rajasthan
First Published :
October 14, 2026, 09:08 IST



