नवरात्रि की नवमी पर घोड़ों की पूजा क्यों करता है मेवाड़ राजपरिवार? जानिए शौर्य से जुड़ी परंपरा

उदयपुर. झीलों की नगरी उदयपुर अपनी ऐतिहासिक विरासत, शौर्य गाथाओं और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए दुनियाभर में खास पहचान रखती है. यहां आज भी कई ऐसी परंपराएं निभाई जाती हैं, जो मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास की याद दिलाती हैं. शारदीय नवरात्रि की नवमी के अवसर पर मेवाड़ राजपरिवार में निभाई जाने वाली अश्व पूजन की परंपरा भी इन्हीं में से एक है. सूर्यवंशी परंपरा का निर्वहन करते हुए महाराज कुमार हरितराज सिंह मेवाड़ ने शंभू निवास प्रांगण में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विधि-विधान से अश्व पूजन किया.
इस दौरान राजसी शृंगार से सुसज्जित तीन अश्वों ‘राजस्वरूप’, ‘राजमुकुट’ और ‘नागराज’ को पूजा के लिए लाया गया. पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार महाराज कुमार हरितराज सिंह मेवाड़ ने अश्वों को अक्षत, कुंकुम और पुष्प अर्पित किए.इसके बाद आरती कर मंगलकामना की गई. अश्वों को पारंपरिक रूप से आहार और वस्त्रादि भेंट किए गए तथा ज्वारें धारण करवाकर अनुष्ठान संपन्न किया गया.इस दौरान धार्मिक आस्था के साथ मेवाड़ की पारंपरिक संस्कृति की झलक भी देखने को मिली.
शौर्य और सम्मान का प्रतीक है अश्व पूजन
मेवाड़ के इतिहास में घोड़ों का विशेष स्थान रहा है. राजपूत परंपरा में अश्व को केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि वीरता, स्वामिभक्ति और युद्ध कौशल से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता रहा है. मेवाड़ के इतिहास और महाराणा प्रताप जैसे वीर योद्धाओं की गाथाओं में भी अश्वों का उल्लेख विशेष रूप से मिलता है. ऐसे में नवरात्रि की नवमी पर अश्व पूजन की परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ उस ऐतिहासिक विरासत की याद भी दिलाती है, जिसमें अश्वों का सम्मान राजपरिवार की संस्कृति का अहम हिस्सा रहा है.
राजसी आभूषणों से सजाए जाते हैं अश्व
इस पारंपरिक आयोजन की एक खास बात अश्वों का राजसी शृंगार भी है. मेवाड़ राजपरिवार में अश्वों को कंठी, चांदी के छोगों, मुखभूषण, पारंपरिक लगाम और चंवर सहित विभिन्न आभूषणों से सजाया जाता है. इस शृंगार में राजसी परंपरा और पारंपरिक कलात्मकता की झलक दिखाई देती है. नक्कारों और शहनाई की मंगलध्वनि के बीच होने वाला यह अनुष्ठान वातावरण को पारंपरिक रंग में रंग देता है. पूजा के दौरान अश्वों के प्रति सम्मान और उनके महत्व को विशेष रूप से दर्शाया जाता है.
17वीं सदी के अस्तबल में आज भी संरक्षित हैं मारवाड़ी नस्ल के अश्व
मेवाड़ की इस परंपरा की खासियत यह भी है कि इसका संबंध केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि राजपरिवार की ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण से भी जुड़ा है. राजमहल परिसर में स्थित 17वीं सदी के ऐतिहासिक अस्तबल में आज भी मारवाड़ी नस्ल के अश्वों का संरक्षण किया जाता है. मारवाड़ी नस्ल के घोड़े अपनी विशिष्ट बनावट और मुड़े हुए कानों के लिए पहचाने जाते हैं. राजस्थान की पारंपरिक अश्व संस्कृति में इस नस्ल का विशेष महत्व रहा है.
पीढ़ियों से चली आ रही अश्व पूजन की यह परंपरा मेवाड़ की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए है. नवरात्रि की नवमी पर होने वाला यह आयोजन बताता है कि किस तरह राजपरिवार अपनी ऐतिहासिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को आज भी संजोकर रखे हुए है. धार्मिक आस्था, राजसी रीति-रिवाज और अश्वों के प्रति सम्मान का संगम इस आयोजन को खास बनाता है. यही वजह है कि मेवाड़ की ऐसी परंपराएं आज भी उदयपुर की ऐतिहासिक पहचान और गौरवशाली अतीत की झलक पेश करती है.



