कमर दर्द, स्लिप डिस्क या साइटिका… कब दवाइयों से चलेगा काम और कब जरूरी है ऑपरेशन?

फरीदाबाद: कमर दर्द, स्लिप डिस्क और साइटिका की समस्या आजकल कई लोगों में देखने को मिल रही है. घंटों बैठकर काम करना, गलत तरीके से उठना-बैठना और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याएं इसकी वजह बन सकती हैं. कई बार दर्द बढ़ने पर मरीज को सर्जरी की सलाह दी जाती है, लेकिन ऑपरेशन का नाम सुनते ही लोगों के मन में लकवा होने का डर बैठ जाता है. हालांकि, आधुनिक तकनीक ने स्पाइन सर्जरी को पहले के मुकाबले अधिक सुरक्षित बनाया है. फरीदाबाद के अमृता अस्पताल में कंसल्टेंट ऑर्थोपेडिक एवं स्पाइन सर्जन डॉ. अर्चित गोयल ने Local18 से बातचीत में बताया कि किन परिस्थितियों में स्पाइन सर्जरी की जरूरत पड़ती है, ऑपरेशन के बाद मरीज कितने समय में चलने-फिरने लगता है और सर्जरी से पहले डॉक्टर से कौन-से सवाल पूछने चाहिए.
स्पाइन सर्जरी के बाद लकवा होने का कितना खतरा?
डॉ. अर्चित गोयल बताते हैं कि पहले स्पाइन सर्जरी को लेकर मरीजों में लकवा होने का डर ज्यादा रहता था, लेकिन अब आधुनिक तकनीक और उपकरणों की मदद से सर्जरी पहले के मुकाबले अधिक सुरक्षित हो गई है. ज्यादातर स्पाइन सर्जरी में लकवा होने का जोखिम 0.3 से 0.4 प्रतिशत के आसपास रहता है, जबकि कुछ विशेष प्रकार की सर्जरी में यह जोखिम एक प्रतिशत से अधिक भी हो सकता है. हालांकि, सर्जरी का जोखिम मरीज की बीमारी और उसकी स्थिति पर निर्भर करता है.
स्लिप डिस्क और साइटिका में कब पड़ती है ऑपरेशन की जरूरत?
डॉ. अर्चित गोयल बताते हैं कि स्लिप डिस्क या साइटिका होने पर हर मरीज को ऑपरेशन कराने की जरूरत नहीं होती. कई मरीज दवाइयों, व्यायाम और कमर में लगाए जाने वाले विशेष इंजेक्शन की मदद से ठीक हो सकते हैं. लगभग 70 से 90 प्रतिशत मरीज बिना सर्जरी के ठीक हो सकते हैं या उन्हें काफी आराम मिल सकता है. हालांकि, जिन मरीजों को दूसरे इलाज से फायदा नहीं मिलता या जिनकी नसों में कमजोरी आने लगती है, उन्हें सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है. अगर नसों पर दबाव के कारण स्थायी नुकसान होने का खतरा हो, तो डॉक्टर की सलाह पर समय रहते इलाज कराना जरूरी है.
नई तकनीक से कितनी सुरक्षित हुई स्पाइन सर्जरी?
डॉ. अर्चित गोयल बताते हैं कि रोबोटिक्स, नेविगेशन, 3D सी-आर्म, न्यूरो मॉनिटरिंग और बोन स्कैल्पेल जैसे आधुनिक उपकरणों ने स्पाइन सर्जरी को अधिक सटीक और सुरक्षित बनाने में मदद की है. रोबोटिक्स और नेविगेशन की मदद से रीढ़ की हड्डी में इंप्लांट लगाने में सटीकता बढ़ती है. वहीं, न्यूरो मॉनिटरिंग के जरिए ऑपरेशन के दौरान नसों की स्थिति पर नजर रखी जाती है, जिससे संभावित नुकसान का पता लगाने में मदद मिलती है. इन तकनीकों से नसों को चोट पहुंचने का जोखिम कम करने में मदद मिलती है. हालांकि, किसी भी सर्जरी में जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होता.
ऑपरेशन के बाद कितने दिन में चलने लगता है मरीज?
डॉ. अर्चित गोयल बताते हैं कि रोबोटिक्स ज्यादातर मरीज स्पाइन सर्जरी के अगले दिन से ही खड़े होकर चलना शुरू कर देते हैं. हालांकि, सर्जरी के बाद छह सप्ताह से तीन महीने तक कुछ सावधानियां बरतनी पड़ सकती हैं. मरीज को पूरी तरह ठीक होने में कितना समय लगेगा, यह उसकी बीमारी और सर्जरी से पहले नसों की स्थिति पर निर्भर करता है. अगर नसों को पहले से नुकसान नहीं पहुंचा है, तो रिकवरी की संभावना बेहतर रहती है. वहीं, नसों में कमजोरी होने पर ठीक होने में तीन महीने से लेकर एक साल या कुछ मामलों में 18 महीने तक लग सकते हैं.
डॉ. अर्चित गोयल बताते हैं कि ऑपरेशन कराने से पहले मरीज को डॉक्टर से यह जरूर पूछना चाहिए कि सर्जरी क्यों जरूरी है और इससे क्या फायदा मिलने की उम्मीद है. क्या ऑपरेशन कमर दर्द के लिए किया जा रहा है, पैरों के दर्द के लिए या नसों पर दबाव कम करने के लिए? इसके अलावा, मरीज को सर्जरी से जुड़े संभावित जोखिम, उनके होने की आशंका और इलाज के दूसरे विकल्पों के बारे में भी जानकारी लेनी चाहिए. डॉक्टर से यह पूछना भी जरूरी है कि ऑपरेशन को अधिक सुरक्षित और सटीक बनाने के लिए किन आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा.



