महाराष्ट्र का अनोखा गांव: दशहरे पर यहां जलाया नहीं जाता रावण, 300 साल पुरानी परंपरा के तहत होती है पूजा और महाआरती

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महाराष्ट्र का अनोखा गांव: दशहरे पर नहीं जलाते रावण, 300 साल पुरानी परंपरा
Last Updated:October 20, 2026, 09:00 IST
महाराष्ट्र का एक अनोखा गांव इन दिनों चर्चा में है, जहां दशहरे के पावन अवसर पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है. यहां करीब 300 साल पुरानी एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जिसके तहत रावण दहन के बजाय उसकी विशेष पूजा-अर्चना और भव्य महाआरती की जाती है. इस सदियों पुरानी परंपरा को गांव के लोग आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं, जो इसे बाकी जगहों से बिल्कुल अलग बनाती है.
Vijayadashami 2026: आज देश के कई हिस्सों में विजयादशमी यानी दशहरे का पर्व मनाया जा रहा है. विजयादशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था. वहीं देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय को भी इस पर्व से जोड़कर देखा जाता है. भारत के अलग-अलग हिस्सों में विजयादशमी और रावण दहन को लेकर कई अनोखी परंपराएं और प्रथाएं प्रचलित हैं. कई जगहों पर रावण दहन की परंपरा नहीं होती, बल्कि इसके बजाय रावण की पूजा की जाती है. इन स्थानों में महाराष्ट्र के अकोला जिले का सांगोला गांव भी शामिल है. आइए जानते हैं दशहरे के दिन यहां क्या होता है…
दशहरे के दिन रावण की पूजाअकोला से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित गांव में एक ही पत्थर से बनी रावण की मूर्ति है, जिसमें उसे दस सिरों वाले राजा के रूप में और हथियारों के साथ दिखाया गया है. इस गांव में दशहरे के दिन रावण का दहन नहीं, बल्कि उसकी पूजा और महाआरती की जाती है. गांव में रावण की पूजा करने के पीछे ग्रामीणों का मानना है कि रावण में जहां कुछ दुर्गुण थे, वहीं उसमें कई सद्गुण भी मौजूद थे. इसलिए रावण को सिर्फ घृणा की दृष्टि से देखने के बजाय, उसके दुर्गुणों को छोड़कर उसके अच्छे गुणों को अपनाना चाहिए. रावण के अच्छे गुणों को स्वीकार करते हुए यहां के ग्रामीण परंपरागत रूप से उसकी पूजा करते आ रहे हैं.
गांव के प्रवेश द्वार पर ही मंदिर की स्थापनारावण की प्रतिमा को गांव के दूसरी ओर स्थापित किया जाना था, लेकिन प्रतिमा को गांव की सीमा से आगे ले जाना संभव नहीं हुआ. आखिरकार, गांव के प्रवेश द्वार पर ही उसकी स्थापना कर दी गई. आज भी यहां के पुजारी प्रतिदिन इस प्रतिमा की पूजा करते हैं. इसके पीछे ग्रामीणों की गहरी आस्था है. पुजारी बालकृष्ण जाधव ने बताया कि यहां यह मूर्ति सैकड़ों वर्ष पुरानी है. उन्होंने कहा कि हमारे गुरुजी ने बताया था कि रावण की मूर्ति को दूसरी जगह से एक बैलगाड़ी में लाया गया था. जिस वक्त इस मूर्ति को ले जाया जा रहा था तो ये हमारे गांव के इस स्थान से आगे नहीं बढ़ी थी. इसलिए गांव के लोगों ने मूर्ति की यहीं स्थापना की. उन्होंने बताया कि शनिवार के दिन नारियल के तेल से पूजा की जाती है और धूप-दीप, अगरबत्ती लगाई जाती है.
मूर्ति आगे नहीं बढ़ पाईएक स्थानीय युवक ने कहा कि माना जाता है कि 200 या 300 साल पहले गांव में मूर्ति की स्थापना हुई थी. यहां पर पास में एक चिखल गांव है. वहां पर मूर्ति को बनाया गया था, जब वहां से मूर्ति को दूसरी जगह ले जाया जा रहा था, तब पास से गुजरने वाली नदी से थोड़ी दूर पर मूर्ति आगे नहीं बढ़ पाई थी. गांव वालों ने इसी गांव में मूर्ति की स्थापना कराई और तभी से यहां मूर्ति पूजन किया जाता है.
About the AuthorParag SharmaChief Sub Editor
पराग शर्मा Hindi Digital में Chief Sub Editor के पद पर कार्यरत हैं. वर्तमान में धर्म, ज्योतिष, ग्रह-नक्षत्र, राशि और वास्तु से जुड़ी खबरों पर काम कर रहे हैं. भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेद…
October 20, 2026, 09:00 IST



