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Kota Crocodile News: काले मगरमच्छ हुए सफेद! पानी में जहर या केमिकल का खौफनाक असर?

Last Updated:October 30, 2026, 18:49 IST

Kota Crocodile News: कोटा के डीसीएम औद्योगिक क्षेत्र में केमिकल युक्त पानी से जलीय जीवों पर संकट गहराता जा रहा है. नाले में काले और मटमैले दिखने वाले मगरमच्छ अब सफेद नजर आने लगे हैं. स्थानीय लोगों ने फैक्ट्रियों के जहरीले अपशिष्ट को इसकी वजह बताया है. प्रदूषण का पानी चंद्रलोई नदी तक पहुंचने से मगरमच्छों समेत पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर खतरा मंडरा रहा है.Amazon Prime DayTop Deals Insideमगरमच्छ सफेद क्यों हुए? कोटा के नाले में केमिकल प्रदूषण का खौफनाक चेहराZoomकोटा में सफेद मगरमच्छ

कोटा. औद्योगिक प्रदूषण का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, यहां डीसीएम औद्योगिक क्षेत्र से निकलने वाले नाले में रहने वाले मगरमच्छों का रंग काले और मटमैले से बदलकर सफेद दिखाई देने लगा है. स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इसके पीछे फैक्ट्रियों से निकलने वाले केमिकल युक्त पानी को जिम्मेदार बताया है. उनका दावा है कि प्रदूषित पानी का असर केवल मगरमच्छों पर ही नहीं, बल्कि नाले में रहने वाले दूसरे जलीय जीवों पर भी पड़ रहा है, कई छोटी जलीय प्रजातियां लगभग खत्म हो चुकी हैं.

कोटा का डीसीएम औद्योगिक क्षेत्र अब पर्यावरणीय संकट को लेकर चर्चा में है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, यहां स्थित दो बड़ी औद्योगिक इकाइयों का अपशिष्ट जल नाले में छोड़ा जा रहा है. शहर के गंदे पानी के साथ फैक्ट्रियों से निकलने वाला केमिकल युक्त पानी लगातार नाले में पहुंच रहा है. इससे पानी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। स्थानीय लोगों का दावा है कि इसी प्रदूषण के कारण मगरमच्छों की त्वचा का रंग बदलकर सफेद नजर आने लगा है. हालांकि, रंग बदलने के वास्तविक कारणों की वैज्ञानिक पुष्टि होना अभी बाकी है.

पहले हो चुकी हैं मगरमच्छों की मौत

यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में इसी नाले में कई मगरमच्छों की मौत के मामले सामने आ चुके हैं. अब उनके रंग में बदलाव और दूसरे जलीय जीवों की संख्या में कमी ने पर्यावरण को लेकर चिंता बढ़ा दी है. स्थानीय लोगों का कहना है कि नाले में छोटी मछलियों और अन्य जलीय जीवों की कई प्रजातियां लगभग समाप्त हो चुकी हैं. डीसीएम नाले का पानी आगे जाकर चंद्रलोई नदी में मिलता है. यह नदी मगरमच्छों की बड़ी आबादी के लिए जानी जाती है. अनुमान के मुताबिक, यहां एक हजार से ज्यादा मगरमच्छ मौजूद हैं. ऐसे में नाले के जरिए नदी तक पहुंचने वाला प्रदूषित पानी बड़े स्तर पर जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकता है. यदि समय रहते प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं किया गया तो इसका असर नदी में रहने वाले जीवों और आसपास के पर्यावरण पर भी पड़ सकता है.

सालों से आवाज उठा रहे हरीश गुरुबख्शानी

सोशल एक्टिविस्ट हरीश गुरुबख्शानी लंबे समय से इस मुद्दे को लेकर आवाज उठा रहे हैं। उन्होंने मगरमच्छों और दूसरे जलीय जीवों को बचाने के लिए कई बार प्रशासन से शिकायत की और प्रदर्शन भी किए. उनका आरोप है कि जिम्मेदार अधिकारियों तक बार-बार मामला पहुंचाने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ है. फैक्ट्रियों से निकलने वाला केमिकल युक्त पानी आज भी नाले में पहुंच रहा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि नाले में रहने वाले मगरमच्छों के व्यवहार में भी बदलाव आया है. पहले इंसानों को देखकर मगरमच्छ पानी में चले जाते थे, लेकिन अब उनके आक्रामक होने का अनुभव किया जा रहा है. हालांकि, उनके व्यवहार में बदलाव और रासायनिक प्रदूषण के बीच संबंध की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है.

रिसर्च में भी सामने आया प्रदूषण का मुद्दा

वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय के जियोलॉजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर संदीप हुड्डा ने भी नाले में मगरमच्छों की मौत के मामलों के बाद रिसर्च की है. उनका कहना है कि नाले के पानी में बड़े स्तर पर केमिकल प्रदूषण मौजूद है, जिसका जलीय जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. छोटे जलीय जीवों की संख्या में कमी भी पर्यावरणीय संकट की ओर इशारा करती है. नाले के आसपास रहने वाले ग्रामीणों का दावा है कि प्रदूषण का असर हवा और पानी दोनों पर दिखाई दे रहा है. इससे स्थानीय लोगों की सेहत को लेकर भी चिंता बढ़ रही है. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इस मामले में कब कार्रवाई करेंगे. नाले के पानी के सैंपल लेकर केमिकल की जांच, फैक्ट्रियों के डिस्चार्ज की निगरानी और ट्रीटमेंट प्लांट की स्थिति की पड़ताल जरूरी है. आखिर मामला सिर्फ मगरमच्छों के सफेद दिखाई देने का नहीं, बल्कि पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और इंसानी जीवन की सुरक्षा का है.

About the Authorमोनाली पाल

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…

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October 30, 2026, 18:49 IST

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