पाकिस्तान की सियासत से राजस्थान की सरपंची तक, 50 साल में ऐसे बदली सोढ़ा परिवार की कहानी

बाड़मेर. भारत-पाकिस्तान के बंटवारे और दोनों देशों के बीच हुए युद्धों ने कई परिवारों की जिंदगी बदल दी. कुछ परिवारों को अपनी पुश्तैनी जमीन और घर छोड़कर भारत आना पड़ा. ऐसा ही एक परिवार पाकिस्तान के सिंध प्रांत के छाछरो का सोढ़ा परिवार था, जिसकी कभी वहां राजनीति और सत्ता के गलियारों में मजबूत पकड़ हुआ करती थी. करीब पांच दशक पहले यह परिवार अपनी जन्मभूमि छोड़कर भारत आ गया था. वक्त बदला, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन अपनी मिट्टी से जुड़ी पहचान और पुरानी विरासत को फिर से हासिल करने की चाह बनी रही. अब इस परिवार की कहानी राजस्थान के बाड़मेर जिले में एक नए मोड़ पर पहुंची है.
परिवार के 77 वर्षीय पदम सिंह ने ग्राम पंचायत चुनाव जीतकर सरपंच की कुर्सी हासिल की है. इसे परिवार के लोग अपनी खोई हुई पहचान और सम्मान की वापसी के तौर पर देख रहे हैं. 24 अक्टूबर को बाड़मेर जिले के नवगठित छाछरो गांव में हुए सरपंच चुनाव में पदम सिंह ने 950 वोट हासिल किए. उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी धना राम को हराया, जिन्हें 612 वोट मिले. इस जीत के साथ पदम सिंह गांव के पहले सरपंच बने. खास बात यह है कि पदम सिंह आज भी अपने नाम के साथ छाछरो पहचान जोड़ते हैं. उनके बेटे पुष्पेंद्र सिंह के मुताबिक, परिवार के लिए यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि उस पुरानी पहचान से जुड़ने का मौका है, जिसे वे पाकिस्तान में पीछे छोड़ आए थे.
पाकिस्तान में था सोढ़ा परिवार का राजनीतिक दबदबा
पदम सिंह का परिवार पाकिस्तान के सिंध प्रांत के छाछरो में एक प्रभावशाली हिंदू जमींदार परिवार के रूप में जाना जाता था. परिवार की राजनीतिक हैसियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके परदादा ठाकुर अखिराज सिंह सोढ़ा 1937 में सिंध विधानसभा के सदस्य रहे थे. उनके बेटे ठाकुर लाल सिंह ने भी विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया था. परिवार के एक अन्य सदस्य लक्ष्मण सिंह सोढ़ा पाकिस्तान सरकार में रेलवे विभाग के उपमंत्री रह चुके थे.
परिवार के लिए हालात तब मुश्किल होने लगे, जब भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 का युद्ध हुआ. 7 दिसंबर 1971 को भारतीय सेना के छाछरो पहुंचने के दौरान लक्ष्मण सिंह सोढ़ा और उनके भाई ने सेना की मदद की थी. उन्होंने भारतीय सैनिकों को रास्ता दिखाने के साथ इलाके से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां भी उपलब्ध कराई थी. इस सैन्य अभियान का नेतृत्व जयपुर के तत्कालीन महाराजा सवाई भवानी सिंह ने किया था, जो 10 पैरा कमांडो बटालियन की कमान संभाल रहे थे.
पाकिस्तान छोड़ने के बाद भी लौटने का दबाव
युद्ध के बाद परिवार की स्थिति लगातार असहज होती गई. पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के संस्थापक जुल्फिकार अली भुट्टो ने लक्ष्मण सिंह सोढ़ा से संपर्क कर परिवार को वापस पाकिस्तान लौटने का प्रस्ताव दिया था. उन्हें सुरक्षा और संरक्षण का भरोसा भी दिलाया गया था. परिवार के बेटे पुष्पेंद्र सिंह के अनुसार, भुट्टो की पार्टी से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोगों और धार्मिक नेताओं ने भी परिवार को वापस बुलाने की कोशिश की. यहां तक कि दो हेलिकॉप्टर लेकर भारत आए प्रतिनिधियों ने भी वापसी का आग्रह किया, लेकिन लक्ष्मण सिंह ने पाकिस्तान लौटने से इनकार कर दिया.
राजस्थान में फिर जुड़ी पुश्तैनी पहचान
पाकिस्तान से आने के बाद सोढ़ा परिवार ने भारत में अपनी जिंदगी दोबारा बसाई. समय के साथ परिवार की नई पीढ़ी ने राजस्थान में अपनी जड़ें मजबूत की. साल 2024 में लंबे प्रयासों के बाद राजस्थान सरकार ने छाछरो नाम से नया राजस्व गांव बनाने की प्रक्रिया को मंजूरी दी. अब इसी गांव में पदम सिंह का पहला सरपंच चुना जाना परिवार के लिए खास महत्व रखता है. पांच दशक पहले जिस छाछरो को छोड़कर परिवार भारत आया था, उसी नाम से राजस्थान में बनी नई ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी अब परिवार के बुजुर्ग सदस्य के हाथों में है. पदम सिंह की यह जीत केवल पंचायत चुनाव का परिणाम नहीं है, बल्कि विस्थापन, संघर्ष और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की कहानी भी है. पाकिस्तान में राजनीतिक रसूख रखने वाले परिवार की नई पीढ़ी अब राजस्थान की ग्रामीण राजनीति में अपनी जगह बना रही है. परिवार के लिए यह सफर अपनी पुरानी पहचान को नए ठिकाने पर फिर से जीवित करने जैसा है.



