CM विजय को ‘लाश’ कहने वाली महिला को जमानत, हाईकोर्ट ने कहा- सत्ता में बैठे लोग गाली सुनने को तैयार रहें

मद्रास हाईकोर्ट ने राजनीतिक अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर एक बेहद नजीर पेश करने वाली और तल्ख टिप्पणी की है. अदालत ने साफ लफ्जों में कहा कि अभिव्यक्ति की संवैधानिक सुरक्षा की असली परीक्षा तब होती है जब कोई बात कड़वी या चुभने वाली हो, न कि तब जब वह बहुत शालीन और मीठी हो. अदालत के मुताबिक सत्ता कभी भी किसी तहजीबदार आलोचक को सलाखों के पीछे डालने की जहमत नहीं उठाती.
यह अहम टिप्पणी उस वक्त सामने आई जब हाईकोर्ट ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में फंसी डीएमके (DMK) महिला पार्षद डी. सुधा को अग्रिम जमानत दे दी. मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने साफ संदेश दिया कि लोकतंत्र में राजनीतिक बयानबाजी और आलोचना का दायरा सिर्फ तारीफों तक सीमित नहीं हो सकता. पुलिस कार्रवाई के डर से किसी की आवाज दबाना अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार का गला घोंटना है.
16 पन्नों के एक कड़े आदेश में, जस्टिस एन. रमेश ने कहा कि ऊंचे सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को आलोचना, मज़ाक और यहां तक कि अपशब्दों का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि अगर कोई राजनीतिक बयान हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था नहीं फैलाता है, तो पुलिस उसके जवाब में गिरफ्तारी की धमकी का इस्तेमाल नहीं कर सकती. एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जज ने टिप्पणी की, “लोकतंत्र में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को यह मानकर चलना चाहिए कि उनकी आलोचना होगी, उनका मज़ाक उड़ाया जाएगा और कई बार उन्हें अपशब्द भी कहे जा सकते हैं.”
सुधा ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन के वार्ड 95 का प्रतिनिधित्व करती हैं और DMK की महिला शाखा की एक पदाधिकारी हैं. आरोप है कि 7 अक्टूबर को राजा अन्नामलाई मंड्रम में हुई पार्टी की एक बैठक में उन्होंने मुख्यमंत्री को “कुत्ता” और “लाश” कहा था. इसके 12 दिन बाद, ‘तमिलगा वेत्री कझगम’ (TVK) के एक पदाधिकारी ने शिकायत दर्ज कराई. इसके बाद, भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 296(b), 352 और 353(1)(c) के तहत एक FIR (प्राथमिकी) दर्ज की गई.
जज ने इस बात पर सवाल उठाया कि पुलिस ने विरोधी पार्टियों के समर्थकों के बीच टकराव की संभावना पर इतना भरोसा क्यों किया. उन्होंने बताया कि शिकायत से पहले के 12 दिनों में या उसके बाद, इस भाषण की वजह से कोई भी अप्रिय घटना नहीं हुई. कोर्ट ने कहा कि राज्य को यह डर था कि सोशल मीडिया पर होने वाली बहस सड़कों पर आ सकती है; यह एक ऐसा “दूर का, काल्पनिक या बहुत ही अनिश्चित” खतरा है, जिसके आधार पर अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती.
जज ने यह भी पूछा कि FIR दर्ज करने से पहले पुलिस ने शुरुआती जांच (प्रारंभिक जांच) क्यों नहीं की, खासकर तब जब इन कथित अपराधों के लिए अधिकतम तीन साल की सजा का प्रावधान है. कोर्ट ने कहा कि असल में यह मामला मुख्यमंत्री की कथित मानहानि से जुड़ा है. कानून में सरकारी पदों पर बैठे लोगों की मानहानि के मामलों में कार्रवाई के लिए एक अलग प्रक्रिया है, जिसमें सरकारी मंजूरी के साथ पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (सरकारी वकील) द्वारा शिकायत दर्ज कराना शामिल है. जज ने कहा, “यहां जो किया गया है, वह उस कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार करना है – यानी किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति के अपमान को, एक आम राहगीर की शिकायत के आधार पर ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ (पब्लिक ऑर्डर) से जुड़े अपराध में बदल देना.”



