Unique Temple: 106 साल से सहेज रहे बारिश की बूंदें, भगवान के भोग से स्नान तक इसी पानी का इस्तेमाल

Last Updated:November 03, 2026, 17:32 IST
Jhunjhunu Laxminath Temple: झुंझुनूं के ऐतिहासिक लक्ष्मीनाथ मंदिर में पिछले 106 साल से बारिश की बूंदों को सहेजने की अनूठी परंपरा निभाई जा रही है. वर्ष 1919 में बने 20 हजार लीटर क्षमता वाले भूमिगत कुंड में छत का पानी जमा किया जाता है. इसी पानी का इस्तेमाल भगवान के भोग, स्नान, पूजा-पाठ और बागवानी में होता है. आस्था के साथ जल संरक्षण की यह मिसाल आज भी पुरखों की दूरदर्शिता की कहानी बयां कर रही है.
झुंझुनूं/ सत्यप्रकाश सोनी. पानी की एक-एक बूंद की कीमत क्या होती है, यह बात आज दुनिया समझ रही है, लेकिन हमारे पुरखे इस दूरदर्शिता को सौ साल पहले ही अपना चुके थे, उन्होंने धार्मिक आस्था के साथ जल संरक्षण की ऐसी व्यवस्था तैयार की, जो आज भी लोगों को पानी बचाने का संदेश दे रही है. झुंझुनूं शहर के पुराने पोस्ट ऑफिस के पास स्थित ऐतिहासिक लक्ष्मीनाथ मंदिर इसका जीवंत उदाहरण है, यहां पिछले 106 साल से बारिश की बूंदों को सहेजने की परंपरा चली आ रही है.
मंदिर की खास बात यह है कि यहां भगवान के भोग के लिए भोजन बनाने से लेकर भगवान के स्नान और दूसरी धार्मिक गतिविधियों तक में संरक्षित वर्षा जल का उपयोग किया जाता है. मंदिर की छत पर गिरने वाला बारिश का पानी नालियों के जरिए सीधे मंदिर परिसर के नीचे बने विशाल भूमिगत कुंड तक पहुंचता है. यहां इसे सालभर के इस्तेमाल के लिए सुरक्षित रखा जाता है. आज के दौर में जब शहरों में बारिश का पानी नालों के जरिए बहकर बर्बाद हो जाता है, तब मंदिर की यह व्यवस्था जल संरक्षण की एक पुरानी लेकिन कारगर मिसाल पेश कर रही है. मंदिर के पुजारी इसी पानी से धार्मिक अनुष्ठान, साफ-सफाई और बागवानी जैसे काम भी करते हैं. मंदिर में भगवान लक्ष्मीनारायण के साथ राम परिवार और शिव परिवार की प्रतिमाएं भी विराजमान हैं.
1919 में बनी थी 20 हजार लीटर क्षमता की जल संरक्षण व्यवस्था
मंदिर व्यवस्थापक रघुनाथ प्रसाद शर्मा बताते हैं कि मंदिर की नींव वर्ष 1915 में रखी गई थी. इसके निर्माण में करीब चार साल का समय लगा. वर्ष 1919 में मंदिर निर्माण पूरा होने के साथ ही जल संरक्षण को ध्यान में रखते हुए यहां करीब 20 हजार लीटर पानी संग्रहण की क्षमता वाला भूमिगत कुंड भी बनवाया गया था. इसका निर्माण सेठ रामकरणदास रामबिलास राय खेतान ने करवाया था. उस दौर में ही मंदिर की छतों से बारिश का पानी एकत्रित करने और उसे सुरक्षित रखने की व्यवस्था तैयार कर दी गई थी. खास बात यह है कि एक सदी से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह व्यवस्था उपयोग में ली जा रही है.
आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश
लक्ष्मीनाथ मंदिर की यह व्यवस्था सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सीख भी है. जिस पानी को आज लोग अक्सर व्यर्थ बहा देते हैं, उसी पानी को सहेजकर मंदिर में भगवान की सेवा और पूजा-पाठ के काम में लिया जा रहा है. 106 साल पुराना यह कुंड बताता है कि जल संरक्षण के लिए हमेशा आधुनिक तकनीक की जरूरत नहीं होती. जरूरत होती है पानी की कीमत समझने और उसे सहेजने की सोच की. शेखावाटी के पुरखों ने अपनी इसी सोच को मंदिरों की बनावट में उतारा और आज भी उनकी दूरदर्शिता बारिश की हर बूंद के साथ दिखाई दे रही है.
About the Authorमोनाली पाल
नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
और पढ़ेंLocation :
Jhunjhunu,Rajasthan
First Published :
November 03, 2026, 17:32 IST



