Ajab Gajab: यहां दिवाली पर होती है बैलों की दौड़, सींगों पर बंधे नारियल-पैसों के लिए जान जोखिम में डालते हैं युवा

पाली. दीपावली यानी रोशनी का त्योहार, खुशियों और दीपों का पर्व, लेकिन राजस्थान के पाली जिले से एक ऐसी अनोखी तस्वीर सामने आई है, जो आम दीपोत्सव से बिल्कुल जुदा है. पाली के कानूजा गांव में दिवाली की एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसके बारे में सुनकर आप भी हैरान रह जाएंगे. यहां पिछले 400 सालों से चली आ रही इस रस्म के तहत त्योहार के मौके पर पशुओं को दौड़ाया जाता है, जिनके सींगों पर नारियल और नगद रुपए बांधे जाते हैं.
इन इनामों को पाने के लिए ग्रामीण उत्साह के साथ आगे आते हैं. पाली के कानूजा गांव में सदियों पुरानी, रोमांचक परंपरा की एक ऐसी झलक, जो राजस्थान की संस्कृति के अलग ही रंग बयां करती है. यहां आतिशबाजी के धमाकों के बीच भड़कते बैलों के सींगों पर बंधे इनाम को छीनने के लिए गांव के युवा अपनी जान हथेली पर रखकर मैदान में कूद पड़ते हैं.
रोशनी के त्योहार में रोमांच का तड़काराजस्थान अपनी समृद्ध संस्कृति, इतिहास और अनूठी परंपराओं के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है. जब पूरा देश दीपावली की आतिशबाजी और मिठाइयों में सराबोर होता है, तब पाली जिले के रायपुर मारवाड़ उपखंड स्थित कानूजा (कनूजा) गांव में एक अलग ही सांस्कृतिक रंग देखने को मिलता है. जहां एक ओर आधुनिकता और शहर की चकाचौंध में लोग अपनी पुरानी परंपराओं और लोक-संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, वहीं कानूजा गांव के ग्रामीणों ने अपनी सदियों पुरानी विरासत को आज भी पूरी जीवंतता के साथ कायम रखा है. गोवर्धन पूजा के खास मौके पर यहां ‘बैल भड़काने’ की पारंपरिक रस्म अदा की जाती है, जिसे देखने के लिए न केवल स्थानीय बल्कि आसपास के तमाम गांवों से भारी भीड़ उमड़ पड़ती है.
सुबह से ही सजने लगती है गांव की चौपालगोवर्धन पूजा के दिन सुबह 7 बजे से ही कानूजा गांव की मुख्य चौपाल पर उत्सव जैसा माहौल बनने लगता है. पशुपालक और गांव के लोग अपने बैलों और गांव के बेसहारा बैलों को चौपाल पर एकत्र करते हैं. इसके बाद शुरू होता है बैलों के निखार और श्रृंगार का दौर. बैलों के शरीर पर मेहंदी और लाल रंग लगाकर उन्हें बेहद सुंदर तरीके से सजाया जाता है. इसके बाद एक विशेष रस्म निभाई जाती है—लाल और केसरिया रंग के कपड़ों में नारियल, नकद रुपए और मिठाइयां रखकर एक पोटली तैयार की जाती है. इस पोटली को बड़ी ही मजबूती के साथ बैलों के सींगों पर बांध दिया जाता है, यह पोटली ही इस रोमांचक खेल की मुख्य ‘इनाम’ होती है.
आतिशबाजी से भड़कते हैं बैलबैलों के सींगों पर इनाम की पोटली बांधने के बाद गांव के मुख्य मार्ग पर आतिशबाजी और पटाखे फोड़े जाते हैं. पटाखों के धमाकों और शोर-शराबे से बैल भड़क उठते हैं और गांव की गलियों व चौपाल पर सरपट दौड़ने लगते हैं. जैसे ही भड़के हुए बैल दौड़ना शुरू करते हैं, गांव के साहसी युवाओं की टोलियां उनके पीछे दौड़ पड़ती हैं. युवाओं के बीच होड़ मच जाती है कि कौन दौड़ते और भड़कते हुए बैल के पास जाकर उसके सींगों से बंधे नारियल और पैसों की पोटली को सुरक्षित निकाल पाता है. यह दृश्य बेहद रोमांचक और साथ ही अत्यंत जोखिम भरा होता है.
भड़के हुए शक्तिशाली बैलों को काबू में करना और उनके सींगों से पोटली छीनना कोई आसान काम नहीं है. इस भगदड़ और आपाधापी में हर साल दर्जनों युवा चोटिल होते हैं, कई गिरते हैं तो कई बैलों की टक्कर से जख्मी हो जाते हैं. लेकिन परंपरा और लोक-संस्कृति का जुनून ऐसा होता है कि युवा चोट की परवाह किए बिना तुरंत खड़े होते हैं और दोबारा मुस्कुराते हुए बैलों के पीछे भागने लगते हैं.
400 साल पुराना इतिहास या 60 वर्षों की अटूट आस्थाजोखिम और खतरे की गंभीरता को देखते हुए गांव की युवतियां, महिलाएं और बुजुर्ग अपने घरों की छतों पर चढ़कर इस पूरे आयोजन को सुरक्षित रूप से देखते हैं. जयकारों और ग्रामीणों के उत्साहवर्धक शोर से पूरा गांव गूंज उठता है. आयोजन में रावत समाज सहित सर्वजाति के लोग एकजुट होकर हिस्सा लेते हैं, जो आपसी भाईचारे की मिसाल पेश करता है. कानूजा गांव के बुजुर्गों और ग्रामीणों के अनुसार, इस गांव का इतिहास और परंपराएं सदियों पुरानी हैं. पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इस रस्म को कई लोग 400 सालों का इतिहास बताते हैं, वहीं ग्रामीण बताते हैं कि इस संगठित रूप को वे पिछले 60 से भी अधिक वर्षों से बिना किसी रुकावट के लगातार निभाते आ रहे हैं. गांव के लोग इस परंपरा को महज एक खेल नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों की धरोहर मानते हैं.



