Agriculture: बारिश ने दिया धोखा तो क्या हुआ? इन 3 तकनीकों से कम पानी में भी किसान कर सकते हैं खेती

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पानी की किल्लत में भी लहलहाएंगे खेत, किसानों के काम आएंगी ये 3 तकनीकें
Last Updated:October 24, 2026, 06:09 IST
Water Saving Methods for Agriculture: सिरोही जिले में इस बार औसत से कम बारिश होने के कारण किसानों के सामने सिंचाई के पानी का संकट खड़ा हो गया है. बांधों में पर्याप्त पानी नहीं आने से रबी सीजन की खेती प्रभावित होने की आशंका है. हालांकि, किसान आधुनिक तकनीकों की मदद से कम पानी में भी अच्छी पैदावार ले सकते हैं. प्रगतिशील किसान मोहनलाल डांगी के अनुसार, ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर सिस्टम और मल्चिंग तकनीक पानी बचाने के अच्छे विकल्प हैं. ड्रिप सिंचाई में पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है, जिससे पानी की बर्बादी कम होती है. एक से पांच बीघा में सब्जियों की खेती के लिए ड्रिप सिस्टम लगाने की अनुमानित लागत 25 से 60 हजार रुपये तक हो सकती है. वहीं, मल्चिंग से मिट्टी में लंबे समय तक नमी बनी रहती है और खरपतवार भी कम उगते हैं. किसानों के लिए फसल और मौसम के अनुसार सही तकनीक चुनना जरूरी है.
सिरोही. राजस्थान के सिरोही जिले समेत कई जिलों में इस बार औसत से काफी कम बारिश देखने को मिली है. ऐसे में रबी के सीजन में खेती करने वाले किसान सिंचाई के लिए परेशान हो रहे हैं, क्योंकि जिले में जिन बांधों से सिंचाई के लिए पानी दिया जाता था, उनमें इस बार पानी की का आवक हुई है. ऐसे में किसान भी फसल को सिंचित करने के लिए पानी की समस्या से जूझ रहे हैं. किसान चाहे तो कुछ आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर कम पानी में भी अच्छी पैदावार कर सकते हैं. इनमें ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और कम पानी में तैयार होने वाली फसलों को अपनाकर भी खेती कर सकते हैं.
प्रगतिशील किसान मोहनलाल डांगी ने बताया कि जिन इलाकों में कम बारिश होती है, उन जगहों पर ड्रिप या स्प्रिंकलर तकनीक से सिंचाई करना फायदेमंद होता है. कम पानी में खेती के लिए ड्रिप सिंचाई एक उपयोगी तकनीक है. इसमें पाइप और ड्रिपर की मदद से पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है. इससे खेत में अनावश्यक पानी फैलने की समस्या कम होती है.
किसान सिंचाई के लगर सकते हैं स्प्रिंकलर सिस्टम
उन्होंने बताया कि अनार, अमरूद और अन्य फलदार पौधों के साथ टमाटर, मिर्च और कई सब्जियों की खेती में इसका उपयोग किया जा सकता है. इसकी लागत बीघा के हिसाब से फसल पर निर्भर करती है. अगर एक से 5 बीघा तक सब्जियों की खेती की जा रही है, तो इसकी लागत करीब 25 से 60 हजार रुपए तक आती है. इसके अच्छे रिजल्ट के लिए सही डिजाइन, फिल्टर की सफाई और नियमित रखरखाव जरूरी है. ड्रिप सिस्टम के अलावा एक नई तकनीक के रूप में कई किसान स्प्रिंकलर सिस्टम भी लगा रहे हैं. इसमें कम पानी से फव्वारा तकनीक से फसल को पानी दिया जाता है. इसकी लागत ड्रिप सिस्टम से ज्यादा आती है.
मल्चिंग से मिट्टी में बनी रहती है नमी
वहीं मल्चिंग तकनीक खेती में पानी बचाने का एक दूसरा अच्छा तरीका है. इस तकनीक में पौधों के आसपास की मिट्टी को सूखे पत्तों, फसल अवशेषों या विशेष कृषि फिल्म से ढक दिया जाता है. वहीं कई बार मलचिंग पेपर बिछाकर बुवाई की जाती है. इससे मिट्टी से पानी का वाष्पीकरण कम होता है और नमी लंबे समय तक बनी रह सकती है. इससे पौधे के आसपास अनावश्यक खरपतवार को रोकने में भी मदद मिलती है. सब्जियों और बागवानी फसलों में मल्चिंग तकनीक का इस्तेमाल किसानों के लिए काफी उपयोगी हो सकता है. कम पानी से खेती में तकनीक के साथ फसलों का सही सिलेक्शन भी जरूरी होता है. प्रदेश में बाजरा, ग्वार, मोठ और तिल जैसी फसलें कम पानी वाली परिस्थितियों के लिए जरूरी होती है.
About the Authorदीप रंजन सिंह Content Producer
दीपरंजन सिंह लगभग एक दशक से पत्रकारिता के फिल्ड से जुड़े हुए हैं. वह अभी न्यूज18 हिंदी के राजस्थान डिजिटल डेस्क से जुड़े हैं, जहां वे बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले लगभग एक दशक से सक्रिय पत…
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Sirohi,Rajasthan
First Published :
October 24, 2026, 06:09 IST



