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Agriculture Tips: महंगी खाद को कहें बाय-बाय! गाय के गोबर और गोमूत्र से घर पर बनाएं ‘सरल संजीवनी’, होगी बंपर पैदावार

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देशी गाय के गोबर और गोमूत्र से तैयार करें ‘सरल संजीवनी’, होगी बंपर पैदावार

Last Updated:May 11, 2026, 14:08 IST

Bhilwara Agriculture News: महंगे रासायनिक खादों के बढ़ते खर्च और मिट्टी की गिरती सेहत के बीच ‘सरल संजीवनी’ जैविक खाद किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है. देशी गाय के गोबर और गोमूत्र से बनी यह खाद कम मेहनत और शून्य लागत में तैयार हो जाती है. भीलवाड़ा के कृषि विशेषज्ञ डॉ. इंद्र सिंह संचेती के अनुसार, यह मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाती है और सिंचाई के साथ आसानी से उपयोग की जा सकती है. इससे किसानों की लागत घटती है और जैविक खेती को बढ़ावा मिलता है.

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Bhilwara Agriculture News: आज के आधुनिक दौर में किसान कम समय में अधिक पैदावार हासिल करने की होड़ में रासायनिक उर्वरकों पर पूरी तरह निर्भर हो गए हैं. हालाँकि, यह निर्भरता अब किसानों के लिए दोहरी मुसीबत बनती जा रही है. एक तरफ जहाँ डीएपी और यूरिया जैसे खाद महंगे होते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इनके अंधाधुंध इस्तेमाल से खेतों की प्राकृतिक उपजाऊ शक्ति तेजी से घट रही है. रासायनिक तत्वों के अधिक प्रयोग से मिट्टी की संरचना कठोर हो जाती है, जिससे जमीन की नमी सोखने की क्षमता खत्म होने लगती है. इसी गंभीर समस्या का समाधान लेकर आए हैं भीलवाड़ा के कृषि विशेषज्ञ.

रिटायर्ड कृषि अधिकारी और अनुभवी विशेषज्ञ डॉ. इंद्र सिंह संचेती के अनुसार, किसानों के पास अब घर पर ही एक बहुत सस्ता और प्रभावी विकल्प मौजूद है, जिसे ‘सरल संजीवनी’ का नाम दिया गया है. डॉ. संचेती बताते हैं कि रासायनिक खाद अल्पकालिक लाभ तो देते हैं, लेकिन वे मिट्टी के मित्र जीवाणुओं को मार देते हैं. इसके विपरीत, सरल संजीवनी पूरी तरह से जैविक और देसी है. इसे मुख्य रूप से देशी गाय के ताजे गोबर और गोमूत्र से तैयार किया जाता है. वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो देशी गाय के गोबर और मूत्र में ऐसे सूक्ष्म जीवाणु और एंजाइम्स पाए जाते हैं, जो मिट्टी में मौजूद अक्रिय पोषक तत्वों को सक्रिय कर देते हैं. यही कारण है कि इसे खेतों के लिए ‘लाइफ लाइन’ माना जा रहा है.

बनाने की सरल विधि और प्रक्रियासरल संजीवनी को तैयार करना बेहद आसान है और इसमें किसी मशीन की आवश्यकता नहीं होती. सबसे पहले किसान को लगभग 30 किलो ताजा देशी गाय का गोबर लेना चाहिए. इसमें पर्याप्त मात्रा में गोमूत्र मिलाकर एक गाढ़ा और समान घोल तैयार करना होता है. इस मिश्रण को किसी प्लास्टिक के ड्रम, सीमेंट की टंकी या बड़े बर्तन में भरकर किसी छायादार स्थान पर रखना अनिवार्य है. इसे धूप से बचाना इसलिए जरूरी है ताकि लाभकारी जीवाणु मरें नहीं. कुछ दिनों तक ढककर रखने से इसमें प्राकृतिक फर्मेंटेशन यानी किण्वन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. इस दौरान इसमें करोड़ों की संख्या में ऐसे बैक्टीरिया पैदा होते हैं जो फसल की जड़ों को नाइट्रोजन और अन्य जरूरी खनिज उपलब्ध कराने में सहायक होते हैं.

सिंचाई के साथ उपयोग और चमत्कारी लाभजब यह घोल पूरी तरह तैयार हो जाए, तो इसे सीधे खेत में डालने के बजाय सिंचाई के पानी के साथ प्रवाहित करना सबसे बेहतर तरीका है. हर पानी के साथ जब यह ‘संजीवनी’ मिट्टी में पहुँचती है, तो जमीन भुरभुरी होने लगती है और उसकी नमी बनाए रखने की क्षमता बढ़ जाती है. इसके लगातार प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता में स्थायी सुधार आता है और फसल को प्राकृतिक रूप से पोषण मिलता है. भीलवाड़ा क्षेत्र के कई प्रगतिशील किसान अब इस तकनीक को अपनाकर न केवल अपनी खेती की लागत घटा रहे हैं, बल्कि रासायनिक मुक्त शुद्ध पैदावार भी ले रहे हैं. यह तकनीक छोटे और सीमांत किसानों के लिए आर्थिक रूप से सबसे सशक्त माध्यम साबित हो रही है.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें

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