1990 में ऊंटों पर रिसर्च करने भारत आईं, फिर राजस्थान ने ऐसा बांधा कि 30 साल से यहीं हैं जर्मनी की इल्जे रोलेफसन

पाली. हम बात कर रहे हैं डॉ. इल्जे कोएलर रोलेफसन की, जो पेशे से पशु चिकित्सक हैं. साल 1990 में वे ऊंटों पर रिसर्च करने भारत आई थीं, लेकिन राजस्थान के सादड़ी गांव और वहां के ऊंटपालकों का प्यार देखकर यहीं की होकर रह गईं. पिछले करीब 27-28 सालों से डॉ. इल्जे रेगिस्तान में रहकर न सिर्फ ऊंटों की देखभाल कर रही हैं, बल्कि ऊंटपालकों की आजीविका को भी नया जीवन दे रही हैं. डॉ. इल्जे ने ‘कैमल करिश्मा’ नाम से एक खास डेयरी की शुरुआत की, जहां ऊंटनी के सेहतमंद दूध की सप्लाई की जाती है. इतना ही नहीं, उन्होंने ऊंट के ऊन से शॉल-कंबल और गोबर से इको-फ्रेंडली कागज बनाने जैसे कई अनोखे प्रयोग भी किए हैं. जिस ऊंटनी के दूध को पहले लोग बेचते भी नहीं थे, आज डॉ. इल्जे की वजह से वही दूध कई लोगों की कमाई का मुख्य साधन बन चुका है.
जर्मनी की 37 वर्षीय वेटरनरी डॉक्टर इल्जे रोलेफसन जब अरावली की तलहटी में बसे राजपुरा सादड़ी गांव पहुंची थीं, तो उनके पास न तो हिंदी के शब्द थे और न ही मारवाड़ी की समझ. लेकिन आज, तीन दशक बाद, वे न केवल ठेठ मारवाड़ी में रायका समाज के बुजुर्गों से संवाद करती हैं, बल्कि उन्होंने थार के पारंपरिक ऊंटपालकों की गिरती अर्थव्यवस्था को भी नया जीवन दिया है. जर्मनी की लग्जरी लाइफ छोड़कर अरावली के बीहड़ों में करीब 30 साल गुजारने वाली इस महिला की कहानी सिर्फ समाज सेवा की नहीं, बल्कि एक विलुप्त होती संस्कृति और पशुधन को बचाने के वैज्ञानिक संघर्ष की भी है.
इशारों की भाषा से ‘रैबारी मारवाड़ी’ तक का सफर
शुरुआती दिनों में जब ऊंट बीमारियों से मर रहे थे, तब इल्जे के पास दवाएं तो थीं, लेकिन भाषा की दीवार थी. जोधपुर के हनुवंत सिंह राठौड़ के साथ मिलकर उन्होंने सिर्फ बीमारियों का इलाज ही शुरू नहीं किया, बल्कि रायका समाज के पारंपरिक ज्ञान को समझने की कोशिश भी की. इशारों-इशारों में इलाज करते-करते इल्जे ने मारवाड़ी का वह लहजा सीख लिया, जो अब खुद स्थानीय युवाओं में कम देखने को मिलता है.
‘कैमलोनॉमिक्स’ से ऊंट का दूध बना अरावली का ‘व्हाइट गोल्ड’
लोग इल्जे को ‘पागल’ कहते थे कि वह यूरोप का शानदार करियर छोड़कर धूल-मिट्टी में ऊंटों के पीछे क्यों घूम रही हैं. लेकिन इल्जे का विजन अलग था. उन्होंने देखा कि जब तक ऊंटों से आर्थिक लाभ नहीं होगा, तब तक पशुपालक इन्हें पालने के लिए तैयार नहीं होंगे. इसी सोच के साथ उन्होंने ऊंटनी के दूध को आमदनी का जरिया बनाने पर काम शुरू किया. धीरे-धीरे ऊंटनी के दूध से तैयार होने वाले उत्पादों ने पशुपालकों के लिए कमाई का नया रास्ता खोल दिया.
37 साल की थीं जब आई थीं भारतरोलेफसन के मुताबिक, जब वे भारत आई थीं, तब उनकी उम्र 37 साल थी. आज उन्हें यहां आए तीन दशक से ज्यादा हो चुके हैं. वे बताती हैं कि वे ग्रामीण परिवेश पर रिसर्च करने भारत आई थीं, लेकिन गांव में आकर उन्होंने लोगों की तकलीफें देखीं. यहां ज्यादातर लोग ऊंट पालते थे. उन्होंने देखा कि पशुपालक काफी मुश्किलों में थे और बीमारियों के कारण उनके ऊंट मर जाते थे. ऊंट सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के काम आते थे. ऐसे में किसी के ऊंट की बीमारी से मौत हो जाती थी तो उसके लिए यह बहुत बड़ा नुकसान होता था.
हिंदी और राजस्थानी सीखकर बदली गांव की तस्वीरइल्जे बताती हैं कि बाद में जोधपुर के हनुवंत सिंह राठौड़ भी उनकी मदद करने लगे. उन्होंने ट्रांसलेटर का काम किया. धीरे-धीरे इल्जे ने हिंदी और राजस्थानी भाषा सीखी. उन्होंने ग्रामीणों को ऊंटों की बीमारियों और इलाज के बारे में जानकारी देने के साथ ही ऊंट के दूध से बनने वाले उत्पादों के बारे में भी बताया. इस काम से उन्हें मन की खुशी तो मिली ही, साथ ही वे इस गांव से भी जुड़ती चली गईं. गांव के लोगों का प्यार उन्हें इतना मिला कि वे वापस नहीं जा पाईं और यहीं की होकर रह गईं.
राष्ट्रपति भी कर चुके हैं सम्मानित
ऊंट संरक्षण के लिए किए गए कार्यों को लेकर 8 मार्च 2017 को रोलेफसन को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने नारी शक्ति राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया. इसके अलावा नई दिल्ली स्थित जर्मनी के दूतावास में 16 मई 2018 को जर्मनी के राष्ट्रपति ने उन्हें वहां के राष्ट्रीय पुरस्कार ‘ऑर्डर ऑफ द क्रॉस ऑफ मेरिट’ से सम्मानित किया. वे 2004 में स्विट्जरलैंड का रोलेक्स अवॉर्ड, मारवाड़ रत्न समेत कई सम्मान प्राप्त कर चुकी हैं.



