Opinion: CJP और RHA के बाद अब ‘दिमागी नक्सल पार्टी’, BJP के विरोध में खुल रहे इन नए पोलिटकल फ्रंट का किसे मिलेगा लाभ?

कॉक्रोच जनता पार्टी (CJP) का उदय सोशल मीडिया मीडिया प्लेटफॉर्म पर हुआ. नीट परीक्षा को लेकर जंतर-मंतर पर पहले धरना और बाद में दिल्ली में जोरदार प्रदर्शन के आगे केंद्र सरकार झुक गई. भाजपा के भरोसेमंद और संगठन के मजबूत स्तंभ रहे धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रील पोलिटिक्स में उतरना पड़ा. सीजेपी के आंदोलन से उत्साहित समाज के कई तबकों में सोशल मीडिया के जरिए नई पार्टी बनाने की इससे प्रेरणा मिली है. सीजेपी के आंदोलन का पहला सीजन समाप्त होने के साथ ही आरक्षण खत्म करने को लेकर रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन (RHA) ने सोशल मीडिया पर दस्तक दे दी. जेन अल्फा और जेन जेड के आंदोलन का दूसरा सीजन स्कूलों की स्थिति सुधारने को लेकर शुरू हुआ तो अब एक नई आभासी पार्टी- दिमागी नक्सल पार्टी (DNP) ने दस्तक दे दी है.
CJP के उदय की कहानी
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत मिश्रा ने 15 मई 2026 को एक मामले की सुनवाई के दौर कॉक्रोच (तिलचट्टा) और परजीवी (Parasites) शब्दों का इस्तेमाल किया था. अदालतों में न्यायाधीश अक्सर मौखिक टिप्पणियां करते रहते हैं. ऐसी टिप्पणियां रिकॉर्ड में नहीं जातीं. कॉक्रोच वाली मौखिक टिप्पणी के बाद इसे लेकर विवाद शुरू हो गया. नौकरी तलाश रहे अभिजीत दीपके, सौरभ दास और उनके जैसे कुछ और बेरोजगार साथियों ने इसे भुनाने के लिए सोशल मीडिया पर कॉक्रोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम से एक आंदोलन शुरू कर दिया. देखते-देखते इसके फॉलोवर्स लाखों में पहुंच गए. इसी बीच मेडिकल प्रवेश परीक्षा रद्द हुई तो सीजेपी ने से मुद्दा बनाकर जंतर-मंतर पर धरना की परमिशन मांगी. सरकार ने इसकी इजाजत दे दी.
पहले तो सीजेपी नेताओं ने कहा कि राजनीति करना उनका मकसद नहीं. वे ऐसे ही मुद्दों पर आंदोलन करेंगे. उनके आंदोलन का दूसरा सीजन स्कूलों में सुधार के लिए शुरू भी हो गया है. अब सीजेपी के संयोजक अभिजीत दीपके कह रहे कि वे चुनावी राजनीति भी करेंगे.
RHA ने भी दे दी दस्तक
सीजेपी के पहले चरण के आंदोलन की सफलता केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के रूप में सामने आई. आंदोलन के दौरान ही नीट परीक्षा में गड़बड़ी रोकने के लिए सरकार ने कई कदम भी उठाए. कुछ को हटाया गया और कई के खिलाफ कार्रवाई हुई. सीजेपी के आंदोलन की सफलता से उत्साहित सवर्ण तबके के युवकों ने रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन (RHA) की सोशल मीडिया पर दस्तक दी. प्रथम दृष्टया इसकी कामयाबी यह रही कि कुछ ही दिनों में 50 लाख से अधिक लोग इससे जुड़ गए. कालांतर में इसके लिए भी कोई बड़ा आंदोलन खड़ा हो जाए तो आश्चर्य की बात नहीं. हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि RHA भी राजनीतिक पार्टी का शक्ल लेगी या सिर्फ आभासी स्वरूप तक ही यह सीमित रहेगा.
अब DNP का हुआ जन्म
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में कहा कि हथियारबंद नक्सली तो खत्म हो गए, लेकिन दिमागी नक्सल अब भी बचे हुए हैं. इसे भाजपा से खार खाए राजनीतिक दलों और सीजेपी के नेताओं ने अपने ऊपर ले लिया है. पूर्व फाइनेंस मिनिस्टर और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने खुद को दिमागी नक्सल होने की घोषणा की है. दिमागी नक्सल पर छिड़े सियासी दंगल में आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल, जम्मू कश्मीर की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती, टीएमसी (ममता गुट) की सांसद महुआ मोइत्रा और कीर्ति झा आजाद के अलावा राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने भी खुद को दिमागी नक्सल की श्रेणी में खड़ा किया है. बात इतनी ही नहीं, अब तो सोशल मीडिया पर दिमागी नक्सल पार्टी का भी उदय हो गया है. पीएम के बयान के बाद इंस्टाग्राम, एक्स और मेटा पर दिमागी नक्सल पार्टी का रातोंरात उदय हो गया. महज 48 घंटे के भीतर ही इंस्टाग्राम पर इसके 2 लाख से ज्यादा फॉलोवर्स जुड़ गए.
AAP और TVK कामयाब
आंदोलन की उपज आम आदमी पार्टी की सफलता लोग दिल्ली में देख चुके हैं. इसे 2 टर्म दिल्ली में सरकार बनाने का मौका मिल गया. इसी तरह तमिलनाडु में थलपति विजय की नई नवेली टीवीके ने पहले प्रयास में कामयाबी हासिल कर ली. बिहार में जन सुराज पार्टी भी 3 साल के अंदर विधानसभा और विधान परिषद में 1-1 सीट हासिल कर ली है. जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने हाल ही में बहुचर्चित बीजेपी की परंपरागत बांकीपुर सीट छीनी है. अब वे पूरे बिहार में अपना दबदबा बढ़ाने की तैयारी में हैं. इससे सोशल मीडिया की आभारी पार्टियों को बल मिला है. हालांकि अभी तक CJP. RHA और DNP जैसी बनी पार्टियों ने चुनाव आयोग में पंजीकरण की कोई पहल नहीं की है, लेकिन आने वाले समय में ये भी चुनाव मैदान में दिखें तो आश्चर्य नहीं.
पहले से ही हजारों पार्टियां
चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अभी देश में 6 मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल और 67 मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय दल पंजीकृत हैं. इसके अलावा बड़ी संख्या में गैर मान्यता प्राप्त दलों का भी पंजीकरण हुआ है. राष्ट्रीय दल के रूप में भारतीय जनता पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), और नेशनल पीपुल्स पार्टी को मान्यता मिली हुई है. रजिस्टर्ड क्षेत्रीय दलों की संख्या 67 है. गैर-मान्यता प्राप्त पंजीकृत दल 2.5 हजार से अधिक हैं. नई राजनीतिक पार्टियां हर चुनाव में सैकड़ों की संख्या में सामने आती हैं, लेकिन अगले चुनाव तक इनमें उसी तेजी से कमी हो जाती है.
अधिक दलों से लाभ किसे
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सीजेपी, दिमागी नक्सल पार्टी या रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन अपने मकसद को पूरा करने के लिए अगर राजनीति में उतरती हैं तो इसका नफा-नुकसान किसे होगा. कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी तमाम कोशिश के बावजूद बीजेपी को पछाड़ नहीं पा रही है. आम आदमी पार्टी को दिल्ली में जनता ने इस बार नकार दिया. पंजाब में उसकी सरकार है, लेकिन अगले साल होने वाले चुनाव में उसे कांग्रेस और भाजपा से जूझना होगा.
वामपंथी पार्टियों का केरल में अंतिम किला भी इस साल ध्वस्त हो गया. क्षेत्रीय दलों की बात करें तो टीएमसी की दुर्गति का ताजातरीन मामला सामने है. बिहार में राष्ट्रीय जनता दल इतना पीछे छूट चुका है कि अपने बूते कामयाबी की कल्पना भी उसके लिए बेमानी है. सरल और सपाट लहजे में कहें तो भाजपा विरोधी मतों में बंटवारे के लिए नई-पुरानी पार्टियों की भरमार दिखती है. भाजपा अपनी सांगठनिक क्षमता के कारण विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है. उसके चुनावी कौशल के आगे सूरमा पार्टियां भी ध्वस्त हो चुकी हैं. इससे अनुमान लगाना मुश्किल नहीं कि भाजपा विरोधी मतों के बंटवारे से लाभ किसे होगा.



